महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 757, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंषडशीतितमोऽध्यायः
कार्तिकेयकी उत्पत्ति, पालन-पोषण और उनका देवसेनापति-पदपर अभिषेक, उनके द्वारा तारकासुरका वध
युधिष्ठिर उवाच
उक्ताः पितामहेनेह सुवर्णस्य विधानतः ।
विस्तरेण प्रदानस्य ये गुणाः श्रुतिलक्षणाः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! सुवर्णका विधिपूर्वक दान करनेसे जो वेदोक्त फल प्राप्त होते हैं, यहाँ उनका आपने विस्तारपूर्वक वर्णन किया ॥ १ ॥
यत्तु कारणमुत्पत्तेः सुवर्णस्य प्रकीर्तितम् ।
स कथं तारकः प्राप्तो निधनं तद् ब्रवीहि मे ॥ २ ॥
सुवर्णकी उत्पत्तिका जो कारण है, वह भी आपने बताया। अब मुझे यह बताइये कि वह तारकासुर कैसे मारा गया? ॥ २ ॥
उक्तं स देवतानां हि अवध्य इति पार्थिव ।
कथं तस्याभवन्मृत्युर्विस्तरेण प्रकीर्तय ॥ ३ ॥
पृथ्वीनाथ! आपने पहले कहा है कि वह देवताओंके लिये अवध्य था, फिर उसकी मृत्यु कैसे हुई? यह विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ३ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्तः कुरुकुलोद्वह ।
कात्स्न्र्येन तारकवधं परं कौतूहलं हि मे ॥ ४ ॥
कुरुकुलका भार वहन करनेवाले पितामह! मैं आपके मुखसे यह तारक-वधका सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है ॥
भीष्म उवाच
विपन्नकृत्या राजेन्द्र देवता ऋषयस्तथा ।
कृत्तिकाश्चोदयामासुरपत्यभरणाय वै ॥ ५ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजेन्द्र! जब गंगाजीने अग्नि-द्वारा स्थापित किये हुए उस गर्भको त्याग दिया, तब देवताओं और ऋषियोंका बना-बनाया काम बिगड़तेकी स्थितिमें आ गया। उस दशामें उन्होंने उस गर्भके भरण-पोषणके लिये छहों कृत्तिकाओंको प्रेरित किया ॥ ५ ॥
न देवतानां काचिद्धि समर्था जातवेदसः ।