भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 759, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 759

उसका पोषण करने लगीं ॥ १३ ॥ अभवत् कार्तिकेयः स त्रैलोक्ये सचराचरे । स्कन्नत्वात् स्कन्दतां प्राप्तो गुहावासाद् गुहोऽभवत् ॥ १४ ॥ इसीसे चराचर प्राणियोंसहित त्रिलोकीमें वह कार्तिकेयके नामसे प्रसिद्ध हुआ। स्कन्दन (स्खलन) के कारण वह 'स्कन्द' कहलाया और गुहामें वास करनेसे 'गुह' नामसे विख्यात हुआ ॥ १४ ॥ ततो देवास्त्रयस्त्रिंशद् दिशश्च सदिगीश्वराः । रुद्रो धाता च विष्णुश्च यमः पूषार्यमा भगः ॥ १५ ॥ अंशो मित्रश्च साध्याश्च वासवो वसवोऽश्विनौ । आपो वायुर्नभश्चन्द्रो नक्षत्राणि ग्रहा रविः ॥ १६ ॥ पृथग्भूतानि चान्यानि यानि देवार्पणानि वै । आजग्मुस्तेऽद्भुतं द्रष्टुं कुमारं ज्वलनात्मजम् ॥ १७ ॥ तदनन्तर तैंतीस देवता, दसों दिशाएँ, दिक्पाल, रुद्र, धाता, विष्णु, यम, पूषा, अर्यमा, भग, अंश, मित्र, साध्य, वसु, वासव (इन्द्र), अश्विनीकुमार, जल (वरुण), वायु, आकाश, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रहगण, रवि तथा दूसरे-दूसरे विभिन्न प्राणी जो देवताओंके आश्रित थे, सब-के-सब उस अद्भुत अग्निपुत्र 'कुमार' को देखनेके लिये वहाँ आये ॥ ऋषयस्तुष्टुवुश्चैव गन्धर्वाश्च जगुस्तथा । षडाननं कुमारं तु द्विषडक्षं द्विजप्रियम् ॥ १८ ॥ पीनांसं द्वादशभुजं पावकादित्यवर्चसम् । शयानं शरगुल्मस्थं दृष्ट्वा देवाः सहर्षिभिः ॥ १९ ॥ लेभिरे परमं हर्षं मेनिरे चासुरं हतम् । ततो देवाः प्रियाण्यस्य सर्व एव समाहरन् ॥ २० ॥ ऋषियोंने स्तुति की और गन्धर्वोंने उनका यश गाया। ब्राह्मणोंके प्रेमी उस कुमारके छः मुख, बारह नेत्र, बारह भुजाएँ, मोटे कंधे और अग्नि तथा सूर्यके समान कान्ति थी। वे सरकण्डोंके झुरमुटमें सो रहे थे। उन्हें देखकर ऋषियोंसहित देवताओंको बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ और यह विश्वास हो गया कि अब तारकासुर मारा जायगा। तदनन्तर सब देवता उन्हें उनकी प्रिय वस्तुएँ भेंट करने लगे ॥ १८-२० ॥ क्रीडतः क्रीडनीयानि ददुः पक्षिगणाश्च ह । सुपर्णोऽस्य ददौ पुत्रं मयूरं चित्रबर्हिणम् ॥ २१ ॥ पक्षियोंने खेल-कूदमें लगे हुए कुमारको खिलौने दिये, गरुड़ने विचित्र पंखोंसे सुशोभित अपना पुत्र मयूर भेंट किया ॥ २१ ॥ राक्षसाश्च ददुस्तस्मै वराहमहिषावुभौ । कुक्कुटं चाग्निसंकाशं प्रददावरुणः स्वयम् ॥ २२ ॥