महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
उसका पोषण करने लगीं ॥ १३ ॥ अभवत् कार्तिकेयः स त्रैलोक्ये सचराचरे । स्कन्नत्वात् स्कन्दतां प्राप्तो गुहावासाद् गुहोऽभवत् ॥ १४ ॥ इसीसे चराचर प्राणियोंसहित त्रिलोकीमें वह कार्तिकेयके नामसे प्रसिद्ध हुआ। स्कन्दन (स्खलन) के कारण वह 'स्कन्द' कहलाया और गुहामें वास करनेसे 'गुह' नामसे विख्यात हुआ ॥ १४ ॥ ततो देवास्त्रयस्त्रिंशद् दिशश्च सदिगीश्वराः । रुद्रो धाता च विष्णुश्च यमः पूषार्यमा भगः ॥ १५ ॥ अंशो मित्रश्च साध्याश्च वासवो वसवोऽश्विनौ । आपो वायुर्नभश्चन्द्रो नक्षत्राणि ग्रहा रविः ॥ १६ ॥ पृथग्भूतानि चान्यानि यानि देवार्पणानि वै । आजग्मुस्तेऽद्भुतं द्रष्टुं कुमारं ज्वलनात्मजम् ॥ १७ ॥ तदनन्तर तैंतीस देवता, दसों दिशाएँ, दिक्पाल, रुद्र, धाता, विष्णु, यम, पूषा, अर्यमा, भग, अंश, मित्र, साध्य, वसु, वासव (इन्द्र), अश्विनीकुमार, जल (वरुण), वायु, आकाश, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रहगण, रवि तथा दूसरे-दूसरे विभिन्न प्राणी जो देवताओंके आश्रित थे, सब-के-सब उस अद्भुत अग्निपुत्र 'कुमार' को देखनेके लिये वहाँ आये ॥ ऋषयस्तुष्टुवुश्चैव गन्धर्वाश्च जगुस्तथा । षडाननं कुमारं तु द्विषडक्षं द्विजप्रियम् ॥ १८ ॥ पीनांसं द्वादशभुजं पावकादित्यवर्चसम् । शयानं शरगुल्मस्थं दृष्ट्वा देवाः सहर्षिभिः ॥ १९ ॥ लेभिरे परमं हर्षं मेनिरे चासुरं हतम् । ततो देवाः प्रियाण्यस्य सर्व एव समाहरन् ॥ २० ॥ ऋषियोंने स्तुति की और गन्धर्वोंने उनका यश गाया। ब्राह्मणोंके प्रेमी उस कुमारके छः मुख, बारह नेत्र, बारह भुजाएँ, मोटे कंधे और अग्नि तथा सूर्यके समान कान्ति थी। वे सरकण्डोंके झुरमुटमें सो रहे थे। उन्हें देखकर ऋषियोंसहित देवताओंको बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ और यह विश्वास हो गया कि अब तारकासुर मारा जायगा। तदनन्तर सब देवता उन्हें उनकी प्रिय वस्तुएँ भेंट करने लगे ॥ १८-२० ॥ क्रीडतः क्रीडनीयानि ददुः पक्षिगणाश्च ह । सुपर्णोऽस्य ददौ पुत्रं मयूरं चित्रबर्हिणम् ॥ २१ ॥ पक्षियोंने खेल-कूदमें लगे हुए कुमारको खिलौने दिये, गरुड़ने विचित्र पंखोंसे सुशोभित अपना पुत्र मयूर भेंट किया ॥ २१ ॥ राक्षसाश्च ददुस्तस्मै वराहमहिषावुभौ । कुक्कुटं चाग्निसंकाशं प्रददावरुणः स्वयम् ॥ २२ ॥
राक्षसोंने सूअर और भैंसा—ये दो पशु उन्हें उपहाररूपमें दिये। गरुड़के भाई अरुणने अग्निके समान लाल वर्णवाला एक मुर्गा भेंट किया ॥ २२ ॥ चन्द्रमाः प्रददौ मेषमादित्यो रुचिरां प्रभाम् । गवां माता च गा देवी ददौ शतसहस्रशः ॥ २३ ॥ चन्द्रमाने भेंड़ा दिया, सूर्यने मनोहर कान्ति प्रदान की, गोमाता सुरभि देवीने एक लाख गौएँ प्रदान कीं ॥ छागमग्निर्गुणोपेतमिला पुष्पफलं बहु । सुधन्वा शकटं चैव रथं चामितकूबरम् ॥ २४ ॥ अग्निने गुणवान् बकरा, इलाने बहुतसे फल-फूल, सुधन्वाने छकड़ा और विशाल कूबरसे युक्त रथ दिये ॥ वरुणो वारुणान् दिव्यान् सगजान् प्रददौ शुभान् । सिंहान् सुरेन्द्रो व्याघ्रांश्च द्विपानन्यांश्च पक्षिणः ॥ २५ ॥ श्वापदांश्च बहून् घोरांश्छत्राणि विविधानि च । वरुणने वरुणलोकके अनेक सुन्दर एवं दिव्य हाथी दिये। देवराज इन्द्रने सिंह, व्याघ्र, हाथी, अन्यान्य पक्षी, बहुत-से भयानक हिंसक जीव तथा नाना प्रकारके छत्र भेंट किये ॥ २५ १/२ ॥ राक्षसासुरसंघाश्च अनुजग्मुस्तमीश्वरम् ॥ २६ ॥ वर्धमानं तु तं दृष्ट्वा प्रार्थयामास तारकः । उपायैर्बहुभिर्हन्तुं नाशकच्चापि तं विभुम् ॥ २७ ॥ राक्षसों और असुरोंका समुदाय उन शक्तिशाली कुमारके अनुगामी हो गये। उन्हें बढ़ते देख तारकासुरने युद्धके लिये ललकारा; परंतु अनेक उपाय करके भी वह उन प्रभावशाली कुमारको मारनेमें सफल न हो सका ॥ २६-२७ ॥ सैनापत्येन तं देवाः पूजयित्वा गुहालयम् । शशंसुर्विप्रकारं तं तस्मै तारककारितम् ॥ २८ ॥ देवताओंने गुहावासी कुमारकी पूजा करके उनका सेनापतिके पदपर अभिषेक किया और तारकासुरने देवताओंपर जो अत्याचार किया था, सो कह सुनाया ॥ स विवृद्धो महावीर्यो देवसेनापतिः प्रभुः । जघानामोघया शक्त्या दानवं तारकं गुहः ॥ २९ ॥ महापराक्रमी देवसेनापति प्रभु गुहने वृद्धिको प्राप्त होकर अपनी अमोघ शक्तिसे तारकासुरका वध कर डाला ॥ २९ ॥ तेन तस्मिन् कुमारेण क्रीडता निहतेऽसुरे । सुरेन्द्रः स्थापितो राज्ये देवानां पुनरीश्वरः ॥ ३० ॥
खेल-खेलमें ही उन अग्निकुमारके द्वारा जब तारकासुर मार डाला गया, तब ऐश्वर्यशाली देवेन्द्र पुनः देवताओंके राज्यपर प्रतिष्ठित किये गये ॥ ३० ॥
स सेनापतिरेवाथ बभौ स्कन्दः प्रतापवान् ।
ईशो गोप्ता च देवानां प्रियकृच्छङ्करस्य च ॥ ३१ ॥
प्रतापी स्कन्द सेनापतिके ही पदपर रहकर बड़ी शोभा पाने लगे। वे देवताओंके ईश्वर तथा संरक्षक थे और भगवान् शंकरका सदा ही हित किया करते थे ॥ ३१ ॥
हिरण्यमूर्तिर्भगवान्नेष एव च पावकिः ।
सदा कुमारो देवानां सैनापत्यमवाप्तवान् ॥ ३२ ॥
ये अग्निपुत्र भगवान् स्कन्द सुवर्णमय विग्रह धारण करते हैं। वे नित्य कुमारावस्थामें ही रहकर देवताओंके सेनापतिपदपर प्रतिष्ठित हुए हैं ॥ ३२ ॥
तस्मात् सुवर्णं मंगल्यं रत्नमक्षय्यमुत्तमम् ।
सहजं कार्तिकेयस्य वह्नेस्तेजः परं मतम् ॥ ३३ ॥
सुवर्ण कार्तिकेयजीके साथ ही उत्पन्न हुआ है और अग्निका उत्कृष्ट तेज माना गया है। इसलिये वह मंगलमय, अक्षय एवं उत्तम रत्न है ॥ ३३ ॥
एवं रामाय कौरव्य वसिष्ठोऽकथयत् पुरा ।
तस्मात् सुवर्णदानाय प्रयतस्व नराधिप ॥ ३४ ॥
कुरुनन्दन! नरेश्वर! इस प्रकार पूर्वकालमें वसिष्ठजीने परशुरामको यह सारा प्रसंग एवं सुवर्णकी उत्पत्ति और माहात्म्य सुनाया था। अतः तुम स्वर्णदानके लिये प्रयत्न करो ॥ ३४ ॥
रामः सुवर्णं दत्त्वा हि विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः ।
त्रिविष्टपे महत् स्थानमवापासुलभं नरैः ॥ ३५ ॥
परशुरामजी सुवर्णका दान करके सब पापोंसे मुक्त हो गये और स्वर्गमें उस महान् स्थानको प्राप्त हुए जो दूसरे मनुष्योंके लिये सर्वथा दुर्लभ है ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि तारकवधोपाख्यानं नाम षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें तारकवधका उपाख्यान नामक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥
चातुर्वर्ण्यस्य धर्मात्मन् धर्माः प्रोक्ता यथा त्वया ।
सप्ताशीतितमोऽध्यायः
विविध तिथियोंमें श्राद्ध करनेका फल
युधिष्ठिर उवाच
चातुर्वर्ण्यस्य धर्मात्मन् धर्माः प्रोक्ता यथा त्वया ।
तथैव मे श्राद्धविधिं कृत्स्नं प्रब्रूहि पार्थिव ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— धर्मात्मन्! पृथ्वीनाथ! आपने जैसे चारों वर्णोंके धर्म बताये हैं, उसी प्रकार अब मेरे लिये श्राद्ध-विधिका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरेणैवमुक्तो भीष्मः शान्तनवस्तदा ।
इमं श्राद्धविधिं कृत्स्नं वक्तुं समुपचक्रमे ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— (जनमेजय!) राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार अनुरोध करनेपर उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मने इस सम्पूर्ण श्राद्धविधिका इस प्रकार वर्णन आरम्भ किया ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
शृणुष्वावहितो राजन् श्राद्धकर्मविधिं शुभम् ।
धन्यं यशस्यं पुत्र्यं पितृयज्ञं परंतप ॥ ३ ॥
भीष्मजी बोले— शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! तुम श्राद्ध-कर्मके शुभ विधिको सावधान, होकर सुनो। यह धन, यश और पुत्रकी प्राप्ति करानेवाला है। इसे पितृयज्ञ कहते हैं ॥ ३ ॥
देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
पिशाचकिन्नराणां च पूज्या वै पितरः सदा ॥ ४ ॥
देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस, पिशाच और किन्नर—इन सबके लिये पितर सदा ही पूज्य हैं ॥ ४ ॥
पितॄन् पूज्यादितः पश्चाद्देवतास्तर्पयन्ति वै ।
तस्मात् तान् सर्वयज्ञेन पुरुषः पूजयेत् सदा ॥ ५ ॥
मनीषी पुरुष पहले पितरोंकी पूजा करके पीछे देवताओंकी पूजा करते हैं। इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह सदा सम्पूर्ण यज्ञोंके द्वारा पितरोंकी पूजा करे ॥ ५ ॥
अन्वाहार्यं महाराज पितॄणां श्राद्धमुच्यते ।
तस्माद् विशेषविधिना विधिः प्रथमकल्पितः ॥ ६ ॥
महाराज! पितरोंके श्राद्धको अन्वाहार्य कहते हैं। अतः विशेष विधिके द्वारा उसका अनुष्ठान पहले करना चाहिये ।। ६ ।। सर्वेष्वहःसु प्रीयन्ते कृते श्राद्धे पितामहाः । प्रवक्ष्यामि तु ते सर्वांस्तिथ्यातिथ्यगुणागुणान् ।। ७ ।। सभी दिनोंमें श्राद्ध करनेसे पितर प्रसन्न रहते हैं। अब मैं तिथि और अतिथिके सब गुणागुणका वर्णन करूँगा ।। ७ ।। येष्वहःसु कृतैः श्राद्धैर्यत् फलं प्राप्यतेऽनघ । तत् सर्वं कीर्तयिष्यामि यथावत् तन्निबोध मे ।। ८ ।। निष्पाप नरेश! जिन दिनोंमें श्राद्ध करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह सब मैं यथार्थरूपसे बताऊँगा, ध्यान देकर सुनो ।। ८ ।। पितॄनर्च्य प्रतिपदि प्राप्नुयात् सुगृहे स्त्रियः । अभिरूपप्रजायिन्यो दर्शनीया बहुप्रजाः ।। ९ ।। प्रतिपदा तिथिको पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्य अपने उत्तम गृहमें मनके अनुरूप सुन्दर एवं बहुसंख्यक संतानोंको जन्म देनेवाली दर्शनीय भार्या प्राप्त करता है ।। स्त्रियो द्वितीयां जायन्ते तृतीयायां तु वाजिनः । चतुर्थ्यां क्षुद्रपशवो भवन्ति बहवो गृहे ।। १० ।। द्वितीयाको श्राद्ध करनेसे कन्याओंका जन्म होता है। तृतीयाके श्राद्धसे घोड़ोंकी प्राप्ति होती है, चतुर्थीको पितरोंका श्राद्ध किया जाय तो घरमें बहुत-से छोटे-छोटे पशुओंकी संख्या बढ़ती है ।। १० ।। पञ्चम्यां बहवः पुत्रा जायन्ते कुर्वतां नृप । कुर्वाणास्तु नराः षष्ठ्यां भवन्ति द्युतिभागिनः ।। ११ ।। नरेश्वर! पंचमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषोंके बहुत-से पुत्र होते हैं। षष्ठीको श्राद्ध करनेवाले मनुष्य कान्तिके भागी होते हैं ।। ११ ।। कृषिभागी भवेच्छ्राद्धं कुर्वाणः सप्तमीं नृप । अष्टम्यां तु प्रकुर्वाणो वाणिज्ये लाभमाप्नुयात् ।। १२ ।। राजन्! सप्तमीको श्राद्ध करनेवाला मनुष्य कृषिकर्ममें लाभ उठाता है और अष्टमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषको व्यापारमें लाभ होता है ।। १२ ।। नवम्यां कुर्वतः श्राद्धं भवत्येकशफं बहु । विवर्धन्ते तु दशमीं गावः श्राद्धान् विकुर्वतः ।। १३ ।। नवमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषके यहाँ एक खुरवाले घोड़े आदि पशुओंकी बहुतायत होती है और दशमीको श्राद्ध करनेवाले मनुष्यके घरमें गौओंको वृद्धि होती है ।। कुप्यभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वन्नेकादशीं नृप । ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते तस्य वेश्मनि ।। १४ ।।
महाराज! एकादशीको श्राद्ध करनेवाला मानव सोने-चाँदीको छोड़कर शेष सभी प्रकारके धनका भागी होता है। उसके घरमें ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पुत्र जन्म लेते हैं ॥ १४ ॥ द्वादश्यामीहमानस्य नित्यमेव प्रदृश्यते । रजतं बहुवित्तं च सुवर्णं च मनोरमम् ॥ १५ ॥ द्वादशीको श्राद्धके लिये प्रयत्न करनेवाले पुरुषको सदा ही मनोरम सुवर्ण, चाँदी तथा बहुत-से धनकी प्राप्ति होती देखी जाती है ॥ १५ ॥ ज्ञातीनां तु भवेच्छ्रेष्ठः कुर्वन् श्राद्धं त्रयोदशीम् । अवश्यं तु युवानोऽस्य प्रमीयन्ते नरा गृहे ॥ १६ ॥ युद्धभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वन् श्राद्धं चतुर्दशीम् । अमावास्यां तु निर्वापात् सर्वकामानवाप्नुयात् ॥ १७ ॥ त्रयोदशीको श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने कुटुम्बी-जनोंमें श्रेष्ठ होता है; परंतु जो चतुर्दशीको श्राद्ध करता है, उसके घरमें नवयुवकोंकी मृत्यु अवश्य होती है तथा श्राद्ध करनेवाला मनुष्य स्वयं भी युद्धका भागी होता है (इसलिये चतुर्दशीको श्राद्ध नहीं करना चाहिये)। अमावास्याको श्राद्ध करनेसे वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ १६-१७ ॥ कृष्णपक्षे दशम्यादौ वर्जयित्वा चतुर्दशीम् । श्राद्धकर्मणि तिथ्यस्तु प्रशस्ता न तथेतराः ॥ १८ ॥ कृष्ण-पक्षमें केवल चतुर्दशीको छोड़कर दशमीसे लेकर अमावास्यातककी सभी तिथियाँ श्राद्धकर्ममें जैसे प्रशस्त मानी गयी हैं, वैसे दूसरी प्रतिपदासे नवमीतक नहीं ॥ १८ ॥ यथा चैवापरः पक्षः पूर्वपक्षाद् विशिष्यते । तथा श्राद्धस्य पूर्वाह्नादपराह्नो विशिष्यते ॥ १९ ॥ जैसे पूर्व (शुक्ल) पक्षकी अपेक्षा अपर (कृष्ण) पक्ष श्राद्धके लिये श्रेष्ठ माना है, उसी प्रकार पूर्वाह्नकी अपेक्षा अपराह्न उत्तम माना जाता है ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥
श्राद्धमें पितरोंके तृप्तिविषयका वर्णन
अष्टाशीतितमोऽध्यायः
श्राद्धमें पितरोंके तृप्तिविषयका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
किंस्विद् दत्तं पितृभ्यो वै भवत्यक्षयमीश्वर । किं हविश्चिररात्राय किमानन्त्याय कल्पते ॥ १ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! पितरोंके लिये दी हुई कौन-सी वस्तु अक्षय होती है? किस वस्तुके दानसे पितर अधिक दिनतक और किसके दानसे अनन्त कालतक तृप्त रहते हैं? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
हवींषि श्राद्धकल्पे तु यानि श्राद्धविदो विदुः । तानि मे शृणु काम्यानि फलं चैव युधिष्ठिर ॥ २ ॥ भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! श्राद्धवेत्ताओंने श्राद्ध-कल्पमें जो हविष्य नियत किये हैं, वे सब-के-सब काम्य हैं। मैं उनका तथा उनके फलका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥
तिलैर्व्रीहियवैर्माषैरद्भिर्मूलफलैस्तथा । दत्तेन मासं प्रीयन्ते श्राद्धेन पितरो नृप ॥ ३ ॥ नरेश्वर! तिल, व्रीहि, जौ, उड़द, जल और फल-मूलके द्वारा श्राद्ध करनेसे पितरोंको एक मासतक तृप्ति बनी रहती है ॥ ३ ॥
वर्धमानतिलं श्राद्धमक्षयं मनुरब्रवीत् । सर्वेष्वेव तु भोज्येषु तिलाः प्राधान्यतः स्मृताः ॥ ४ ॥ मनुजीका कथन है कि जिस श्राद्धमें तिलकी मात्रा अधिक रहती है, वह श्राद्ध अक्षय होता है। श्राद्ध-सम्बन्धी सम्पूर्ण भोज्य-पदार्थोंमें तिलोंका प्रधानरूपसे उपयोग बताया गया है ॥ ४ ॥
गव्येन दत्तं श्राद्धे तु संवत्सरमिहोच्यते । यथा गव्यं तथा युक्तं पायसं सर्पिषा सह ॥ ५ ॥ यदि श्राद्धमें गायका दही दान किया जाय तो उससे पितरोंको एक वर्षतक तृप्ति होती बतायी गयी है। गायके दहीका जैसा फल बताया गया है, वैसा ही घृतमिश्रित खीरका भी समझना चाहिये ॥ ५ ॥
गाथाश्चाप्यत्र गायन्ति पितृगीता युधिष्ठिर । सनत्कुमारो भगवान् पुरा मय्यभ्यभाषत ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर! इस विषयमें पितरोंद्वारा गायी हुई गाथाका भी विज्ञ पुरुष गान करते हैं। पूर्वकालमें भगवान् सनत्कुमारने मुझे यह गाथा बतायी थी ।। ६ ।।
अपि नः स्वकुले जायाद् यो नो दद्यात्त्रयोदशीम् ।
मवासु सर्पिःसंयुक्तं पायसं दक्षिणायने ।। ७ ।।
पितर कहते हैं—'क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा पुरुष उत्पन्न होगा, जो दक्षिणायनमें आश्विन मासके कृष्णपक्षमें मघा और त्रयोदशी तिथिका योग होनेपर हमारे लिये घृतमिश्रित खीरका दान करेगा? ।। ७ ।।
आजेन वापि लौहेन मघास्वेव यतव्रतः ।
हस्तिच्छायासु विधिवत् कर्णव्यजनवीजितम् ।। ८ ।।
'अथवा वह नियमपूर्वक व्रतका पालन करके मघा नक्षत्रमें ही हाथीके शरीरकी छायामें बैठकर उसके कानरूपी व्यजनसे हवा लेता हुआ अन्न-विशेष-चावलका बना हुआ पायस या लौहशाकसे विधिपूर्वक हमारा श्राद्ध करेगा? ।। ८ ।।
एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ।
यत्रासौ प्रथितो लोकेष्वक्षय्यकरणो वटः ।। ९ ।।
'बहुत-से पुत्र पानेकी अभिलाषा रखनी चाहिये, उनमेंसे यदि एक भी उस गया-तीर्थकी यात्रा करे, जहाँ लोकविख्यात अक्षयवट विद्यमान है, जो श्राद्धके फलको अक्षय बनानेवाला है ।। ९ ।।
आपो मूलं फलं मांसमन्नं वापि पितृक्षये ।
यत् किंचिन्मधुसम्मिश्रं तदानन्त्याय कल्पते ।। १० ।।
'पितरोंकी क्षय-तिथिको जल, मूल, फल, उसका गूदा और अन्न आदि जो कुछ भी मधुमिश्रित करके दिया जाता है, वह उन्हें अनन्तकालतक तृप्ति देनेवाला है' ।। १० ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पेऽष्टाशीतितमोऽध्यायः ।। ८८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८८ ।।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! यमने राजा शशबिन्दुको भिन्न-भिन्न नक्षत्रोंमें किये जानेवाले जो काम्य श्राद्ध बताये हैं; उनका वर्णन मुझसे सुनो ॥ १ ॥
एकोननवतितमोऽध्यायः
विभिन्न नक्षत्रोंमें श्राद्ध करनेका फल
भीष्म उवाच
यमस्तु यानि श्राद्धानि प्रोवाच शशबिन्दवे ।
तानि मे शृणु काम्यानि नक्षत्रेषु पृथक् पृथक् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! यमने राजा शशबिन्दुको भिन्न-भिन्न नक्षत्रोंमें किये जानेवाले जो काम्य श्राद्ध बताये हैं; उनका वर्णन मुझसे सुनो ॥ १ ॥
श्राद्धं यः कृत्तिकायोगे कुर्वीत सततं नरः ।
अग्नीनाधाय सापत्यो यजेत विगतज्वरः ॥ २ ॥
जो मनुष्य सदा कृत्तिका नक्षत्रके योगमें अग्निकी स्थापना करके पुत्रसहित श्राद्ध या पितरोंका यजन करता है, वह रोग और चिन्तासे रहित हो जाता है ॥ २ ॥
अपत्यकामो रोहिण्यां तेजस्कामो मृगोत्तमे ।
क्रूरकर्मा ददच्छ्राद्धमार्द्रायां मानवो भवेत् ॥ ३ ॥
संतानकी इच्छावाला पुरुष रोहिणीमें और तेजकी कामनावाला पुरुष मृगशिरा नक्षत्रमें श्राद्ध करे। आर्द्रा नक्षत्रमें श्राद्धका दान देनेवाला मनुष्य क्रूरकर्मा होता है (इसलिये आर्द्रा नक्षत्रमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये) ॥ ३ ॥
धनकामो भवेन्मर्त्यः कुर्वन् श्राद्धं पुनर्वसौ ।
पुष्टिकामोऽथ पुष्येण श्राद्धमीहेत मानवः ॥ ४ ॥
धनकी इच्छावाले पुरुषको पुनर्वसु नक्षत्रमें श्राद्ध करना चाहिये। पुष्टिकी कामनावाला पुरुष पुष्यनक्षत्रमें श्राद्ध करे ॥ ४ ॥
आश्लेषायां ददच्छ्राद्धं धीरान् पुत्रान् प्रजायते ।
ज्ञातीनां तु भवेच्छ्रेष्ठो मघासु श्राद्धमावपन् ॥ ५ ॥
आश्लेषामें श्राद्ध करनेवाला पुरुष धीर पुत्रोंको जन्म देता है। मघामें श्राद्ध एवं पिण्डदान करनेवाला मनुष्य अपने कुटुम्बी जनोंमें श्रेष्ठ होता है ॥ ५ ॥
फल्गुनीषु ददच्छ्राद्धं सुभगः श्राद्धदो भवेत् ।
अपत्यभागुत्तरासु हस्तेन फलभाग् भवेत् ॥ ६ ॥
पूर्वाफाल्गुनीमें श्राद्धका दान देनेवाला मानव सौभाग्यशाली होता है। उत्तराफाल्गुनीमें श्राद्ध करनेवाला संतानवान् और हस्तनक्षत्रमें श्राद्ध करनेवाला अभीष्ट फलका भागी होता है ॥ ६ ॥
चित्रायां तु ददच्छ्राद्धं लभेद रूपवतः सुतान् ।
स्वातियोगे पितॄनर्च्य वाणिज्यमुपजीवति ॥ ७ ॥
चित्रामें श्राद्धका दान करनेवाले पुरुषको रूपवान् पुत्र प्राप्त होते हैं। स्वातीके योगमें पितरोंकी पूजा करनेवाला वाणिज्यसे जीवन-निर्वाह करता है ॥ ७ ॥
बहुपुत्रो विशाखासु पुत्रमीहन् भवेन्नरः ।
अनुराधासु कुर्वाणो राजचक्रं प्रवर्तयेत् ॥ ८ ॥
विशाखामें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य यदि पुत्र चाहता हो तो बहुसंख्यक पुत्रोंसे सम्पन्न होता है। अनुराधामें श्राद्ध करनेवाला पुरुष दूसरे जन्ममें राजमण्डलका शासक होता है ॥ ८ ॥
आधिपत्यं व्रजेन्मर्त्यो ज्येष्ठायामपवर्जयन् ।
नरः कुरुकुलश्रेष्ठ ऋद्धो दमपुरःसरः ॥ ९ ॥
कुरुकुलश्रेष्ठ! ज्येष्ठा नक्षत्रमें इन्द्रियसंयमपूर्वक पिण्डदान करनेवाला मनुष्य समृद्धिशाली होता है और प्रभुत्व प्राप्त करता है ॥ ९ ॥
मूले त्वारोग्यमृच्छेत यशोऽऽषाढासु चोत्तमम् ।
उत्तरासु त्वषाढासु वीतशोकश्चरेन्महीम् ॥ १० ॥
मूलमें श्राद्ध करनेसे आरोग्यकी प्राप्ति होती है और पूर्वाषाढ़ामें उत्तम यशकी। उत्तराषाढ़ामें पितृयज्ञ करनेवाला पुरुष शोकशन्य होकर पृथ्वीपर विचरण करता है ॥ १० ॥
श्राद्धं त्वभिजिता कुर्वन् भिषक्सिद्धिमवाप्नुयात् ।
श्रवणेषु ददच्छ्राद्धं प्रेत्य गच्छेत् स सद्गतिम् ॥ ११ ॥
अभिजित् नक्षत्रमें श्राद्ध करनेवाला वैद्यविषयक सिद्धि पाता है। श्रवण नक्षत्रमें श्राद्धका दान देनेवाला मानव मृत्युके पश्चात् सद्गतिको प्राप्त होता है ॥ ११ ॥
राज्यभागी धनिष्ठायां भवेत् नियतं नरः ।
नक्षत्रे वारुणे कुर्वन् भिषक्सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ १२ ॥
धनिष्ठामें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य नियमपूर्वक राज्यका भागी होता है। वारुण नक्षत्र-शतभिषामें श्राद्ध करनेवाला पुरुष वैद्यविषयक सिद्धिको पाता है ॥ १२ ॥
पूर्वप्रोष्ठपदाः कुर्वन् बहून् विन्दत्यजाविकान् ।
उत्तरासु प्रकुर्वाणो विन्दते गाः सहस्रशः ॥ १३ ॥
पूर्वभाद्रपदामें श्राद्ध करनेवाला बहुत-से भेड़-बकरोंका लाभ लेता है और उत्तराभाद्रपदामें श्राद्ध करनेवाला सहस्रों गौएँ पाता है ॥ १३ ॥
बहुकुप्यकृतं वित्तं विन्दते रेवतीं श्रितः ।
अश्विनीष्वश्वान् विन्देत भरणीष्वायुरुत्तमम् ॥ १४ ॥
श्राद्धमें रेवतीका आश्रय लेनेवाला (अर्थात् रेवतीमें श्राद्ध करनेवाला) पुरुष सोने-चाँदीके सिवा अन्य नाना प्रकारके धन पाता है। अश्विनीमें श्राद्ध करनेसे घोड़ोंकी और भरणीमें श्राद्धका अनुष्ठान करनेसे उत्तम आयुकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥
इमं श्राद्धविधिं श्रुत्वा शशबिन्दुस्तथाकरोत् । अक्लेशेनाजयच्चापि महीं सोऽनुशशास ह ॥ १५ ॥
इस श्राद्धविधिको श्रवण करके राजा शशबिन्दुने वही किया। उन्होंने बिना किसी क्लेशके ही पृथ्वीको जीता और उसका शासनसूत्र अपने हाथमें ले लिया ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥
श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भो
नवतितमोऽध्यायः
श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भोजन करानेकी श्रेष्ठताका कथन
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशेभ्यः प्रदातव्यं भवेच्छ्राद्धं पितामह ।
द्विजेभ्यः कुरुशार्दूल तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! कैसे ब्राह्मणको श्राद्धका दान (अर्थात् निमन्त्रण) देना चाहिये? कुरुश्रेष्ठ! आप इसका मेरे लिये स्पष्ट वर्णन करें ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
ब्राह्मणान् न परीक्षेत क्षत्रियो दानधर्मवित् ।
दैवे कर्मणि पित्र्ये तु न्यायमाहुः परीक्षणम् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! दान-धर्मके ज्ञाता क्षत्रियको देवसम्बन्धी कर्म (यज्ञ-यागादि) में ब्राह्मणकी परीक्षा नहीं करनी चाहिये, किंतु पितृकर्म (श्राद्ध) में उनकी परीक्षा न्यायसंगत मानी गयी है ॥ २ ॥
देवताः पूजयन्तीह दैवेनैवेह तेजसा ।
उपेत्य तस्माद् देवेभ्यः सर्वेभ्यो दापयेन्नरः ॥ ३ ॥
देवता अपने दैव तेजसे ही इस जगत्में ब्राह्मणोंका पूजन (समादर) करते हैं; अतः देवताओंके उद्देश्यसे सभी ब्राह्मणोंके पास जाकर उन्हें दान देना चाहिये ॥ ३ ॥
श्राद्धे त्वथ महाराज परीक्षेद ब्राह्मणान् बुधः ।
कुलशीलवयोरूपैर्विद्ययाभिजनेन च ॥ ४ ॥
किंतु महाराज! श्राद्धके समय विद्वान् पुरुष कुल, शील (उत्तम आचरण), अवस्था, रूप, विद्या और पूर्वजोंके निवासस्थान आदिके द्वारा ब्राह्मणकी अवश्य परीक्षा करे ॥ ४ ॥
तेषामन्ये पंक्तिदूषास्तथान्ये पंक्तिपावनाः ।
अपांक्तेयास्तु ये राजन् कीर्तयिष्यामि तान् शृणु ॥ ५ ॥
ब्राह्मणोंमें कुछ तो पंक्तिदूषक होते हैं और कुछ पंक्तिपावन। राजन्! पहले पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंका वर्णन करूँगा, सुनो ॥ ५ ॥
कितवो भ्रूणहा यक्ष्मी पशुपालो निराकृतिः ।
ग्रामप्रेष्यो वार्धुषिको गायनः सर्वविक्रयी ॥ ६ ॥
अगारदाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रयी ।
सामुद्रिको राजभृत्यस्तैलिकः कूटकारकः ॥ ७ ॥
पित्रा विवदमानश्च यस्य चोपपतिर्गृहे ।
अभिशस्तस्तथा स्तेनः शिल्पं यश्चोपजीवति ॥ ८ ॥
पर्वकारश्च सूची च मित्रध्रुक् पारदारिकः ।
अव्रतानामुपाध्यायः काण्डपृष्ठस्तथैव च ॥ ९ ॥
श्वभिश्च यः परिक्रामेद् यः शुना दष्ट एव च ।
परिवित्तिश्च यश्च स्याद् दुश्चर्मा गुरुतल्पगः ॥ १० ॥
कुशीलवो देवलको नक्षत्रैश्चैव जीवति ।
ईदृशैर्ब्राह्मणैर्भुक्तमपांक्तेयैर्युधिष्ठिर ॥ ११ ॥
रक्षांसि गच्छते हव्यमित्याहुर्ब्रह्मवादिनः ।
जुआरी, गर्भहत्यारा, राजयक्ष्माका रोगी, पशुपालन करनेवाला, अपढ़, गाँवभरका हरकारा, सूदखोर, गवैया, सब तरहकी चीज बेचनेवाला, दूसरोंका घर फूँकनेवाला, विष देनेवाला, माताद्वारा पतिके जीते-जी दूसरे पतिसे उत्पन्न किये हुए पुत्रके घर भोजन करनेवाला, सोमरस बेचनेवाला, सामुद्रिक विद्या (हस्तरेखा) से जीविका चलानेवाला, राजाका नौकर, तेल बेचनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, पितासे झगड़ा करनेवाला, जिसके घरमें जार पुरुषका प्रवेश हो वह, कलंकित, चोर, शिल्पजीवी, बहुरूपिया, चुगलखोर, मित्रद्रोही, परस्त्रीलम्पट, व्रतरहित, मनुष्योंका अध्यापक, हथियार बनाकर जीविका चलानेवाला, कुत्ते साथ लेकर घूमनेवाला, जिसे कुत्तेने काटा हो वह, जिसके छोटे भाईका विवाह हो गया हो ऐसा अविवाहित बड़ा भाई, चर्मरोगी, गुरुपत्नीगामी, नटका काम करनेवाला, देवमन्दिरमें पूजासे जीविका चलानेवाला और नक्षत्रोंका फल बताकर जीनेवाला—ये सभी ब्राह्मण पंक्तिसे बाहर रखने योग्य हैं! युधिष्ठिर! ऐसे पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंका खाया हुआ हविष्य राक्षसोंको मिलता है, ऐसा ब्रह्मवादी पुरुषोंका कथन है ॥ ६—११ १/२ ॥
श्राद्धं भुक्त्वा त्वधीयीत वृषलीतल्पगश्च यः ॥ १२ ॥
पुरीषे तस्य ते मासं पितरस्तस्य शेरते ।
जो ब्राह्मण श्राद्धका भोजन करके फिर उस दिन वेद पढ़ता है तथा जो वृषली स्त्रीसे समागम करता है, उसके पितर उस दिनसे लेकर एक मासतक उसीकी विष्ठामें शयन करते हैं ॥ १२ १/२ ॥
सोमविक्रयिणे विष्ठा भिषजे पूयशोणितम् ॥ १३ ॥
नष्टं देवलके दत्तमप्रतिष्ठं च वार्धुषे ।
यत्तु वाणिजके दत्तं नेह नामुत्र तद् भवेत् ॥ १४ ॥
सोमरस बेचनेवालेको जो श्राद्धका अन्न दिया जाता है, वह पितरोंके लिये विष्ठाके तुल्य है। श्राद्धमें वैद्यको जिमाया हुआ अन्न पीब और रक्तके समान पितरोंको अग्राह्य हो जाता है। देवमन्दिरमें पूजा करके जीविका चलानेवालेको दिया हुआ श्राद्धका दान नष्ट हो जाता है—उसका कोई फल नहीं मिलता। सूदखोरको दिया हुआ अन्न अस्थिर होता है। वाणिज्यवृत्ति करनेवालेको श्राद्धमें दिये हुए अन्नका दान न इहलोकमें लाभदायक होता है और न परलोकमें ।। १३-१४ ।।
भस्मनीव हुतं हव्यं तथा पौनर्भवे द्विजे ।
ये तु धर्मव्यपेतेषु चारित्रापगतेषु च ।
हव्यं कव्यं प्रयच्छन्ति तेषां तत् प्रेत्य नश्यति ।। १५ ।।
एक पतिको छोड़कर दूसरा पति करनेवाली स्त्रीके पुत्रको दिया हुआ श्राद्धमें अन्नका दान राखमें डाले हुए हविष्यके समान व्यर्थ हो जाता है। जो लोग धर्मरहित और चरित्रहीन द्विजको हव्य-कव्यका दान करते हैं, उनका वह दान परलोकमें नष्ट हो जाता है ।। १५ ।।
ज्ञानपूर्वं तु ये तेभ्यः प्रयच्छन्त्यल्पबुद्धयः ।
पुरीषं भुञ्जते तेषां पितरः प्रेत्य निश्चयः ।। १६ ।।
जो मूर्ख मनुष्य जान-बूझकर वैसे पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंको श्राद्धमें अन्नका दान करते हैं, उनके पितर परलोकमें निश्चय ही उनकी विष्ठा खाते हैं ।। १६ ।।
एतानिमान् विजानीयादपांक्तेयान् द्विजाधमान् ।
शूद्राणामुपदेशं च ये कुर्वन्त्यल्पचेतसः ।। १७ ।।
इन अधम ब्राह्मणोंको पंक्तिसे बाहर रखने-योग्य जानना चाहिये। जो मूढ़ ब्राह्मण शूद्रोंको वेदका उपदेश करते हैं, वे भी अपांक्तेय (अर्थात् पंक्ति-बाहर) ही हैं ।। १७ ।।
षष्टिं काणः शतं षण्ढः श्वित्री यावत्प्रपश्यति ।
पंक्त्यां समुपविष्टायां तावद् दूषयते नृप ।। १८ ।।
राजन्! काना मनुष्य पंक्तिमें बैठे हुए साठ मनुष्योंको दूषित कर देता है। जो नपुंसक है, वह सौ मनुष्योंको अपवित्र बना देता है तथा जो सफेद कोढ़का रोगी है, वह बैठे हुए पंक्तिमें जितने लोगोंको देखता है, उन सबको दूषित कर देता है ।। १८ ।।
यद् वेष्टितशिरा भुंक्ते यद् भुंक्ते दक्षिणामुखः ।
सोपानत्कश्च यद् भुंक्ते सर्वं विद्यात् तदासुरम् ।। १९ ।।
जो सिरपर पगड़ी और टोपी रखकर भोजन करता है, जो दक्षिणकी ओर मुख करके खाता है तथा जूते पहने भोजन करता है, उनका वह सारा भोजन आसुर समझना चाहिये ।। १९ ।।
असूयता च यद् दत्तं यच्च श्रद्धाविवर्जितम् ।
सर्वं तदसुरेन्द्राय ब्रह्मा भागमकल्पयत् ।। २० ।।
जो दोषदृष्टि रखते हुए दान करता है और जो बिना श्राद्धके देता है, उस सारे दानको ब्रह्माजीने असुरराज बलिका भाग निश्चित किया है ॥ २० ॥ श्वानश्च पंक्तिदूषाश्च नावेक्षेरन् कथंचन । तस्मात् परिसृते दद्यात् तिलांश्चान्ववकीरयेत् ॥ २१ ॥ कुत्तों और पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंकी किसी तरह दृष्टि न पड़े, इसके लिये सब ओरसे घिरे हुए स्थानमें श्राद्धका दान करे और वहाँ सब ओर तिल छींटे ॥ २१ ॥ तिलैर्विरहितं श्राद्धं कृतं क्रोधवशेन च । यातुधानाः पिशाचाश्च विप्रलुम्पन्ति तद्धविः ॥ २२ ॥ जो श्राद्ध तिलोंसे रहित होता है, अथवा जो क्रोधपूर्वक किया जाता है, उसके हविष्यको यातुधान (राक्षस) और पिशाच लुप्त कर देते हैं ॥ २२ ॥ अपांक्तो यावतः पांक्तान् भुञ्जानाननुपश्यति । तावत्फलाद् भ्रंशयति दातारं तस्य बालिशम् ॥ २३ ॥ पंक्तिदूषक पुरुष पंक्तिमें भोजन करनेवाले जितने ब्राह्मणोंको देख लेता है, वह मूर्ख दाताको उतने ब्राह्मणोंके दानजनित फलसे वंचित कर देता है ॥ २३ ॥ इमे तु भरतश्रेष्ठ विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः । ये त्वतस्तान् प्रवक्ष्यामि परीक्षस्वेह तान् द्विजान् ॥ २४ ॥ भरतश्रेष्ठ! अब जिनका वर्णन किया जा रहा है, इन सबको पंक्तिपावन जानना चाहिये। इनका वर्णन इसलिये करूँगा कि तुम ब्राह्मणोंकी श्राद्धमें परीक्षा कर सको ॥ विद्यावेदव्रतस्नाता ब्राह्मणाः सर्व एव हि । सदाचारपराश्चैव विज्ञेयाः सर्वपावनाः ॥ २५ ॥ विद्या और वेदव्रतमें स्नातक हुए समस्त ब्राह्मण यदि सदाचारमें तत्पर रहनेवाले हों तो उन्हें सर्वपावन जानना चाहिये ॥ २५ ॥ पांक्तेयांस्तु प्रवक्ष्यामि ज्ञेयास्ते पंक्तिपावनाः । त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णः षडंगवित् ॥ २६ ॥ अब मैं पांक्तेय ब्राह्मणोंका वर्णन करूँगा। उन्हींको पंक्तिपावन जानना चाहिये। जो त्रिणाचिकेत नामक मन्त्रोंका जप करनेवाला, गार्हपत्य आदि पाँच अग्नियोंका सेवन करनेवाला, त्रिसुपर्ण नामक (त्रिसुपर्णमित्यादि) मन्त्रोंका पाठ करनेवाला है तथा ‘ब्रह्ममेतु माम्’ इत्यादि तैत्तिरीय-प्रसिद्ध शिक्षा आदि छहों अंगोंका ज्ञान रखनेवाला है ये सब पंक्तिपावन हैं ॥ २६ ॥ ब्रह्मदेयानुसंतानश्छन्दोगो ज्येष्ठसामगः । मातापित्रोर्यश्च वश्यः श्रोत्रियों दशपूरुषः ॥ २७ ॥ जो परम्परासे वेद या पराविद्याका ज्ञाता अथवा उपदेशक है, जो वेदके छन्दोग शाखाका विद्वान् है, जो ज्येष्ठ साममन्त्रका गायक, माता-पिताके वशमें रहनेवाला और दस
पीढ़ियोंसे श्रोत्रिय (वेदपाठी) है, वह भी पंक्तिपावन है ॥ २७ ॥ ऋतुकालाभिगामी च धर्मपत्नीषु यः सदा । वेदविद्याव्रतस्नातो विप्रः पंक्तिं पुनात्युत ॥ २८ ॥ जो अपनी धर्मपत्नियोंके साथ सदा ऋतुकालमें ही समागम करता है, वेद और विद्याके व्रतमें स्नातक हो चुका है, वह ब्राह्मण-पंक्तिको पवित्र कर देता है ॥ २८ ॥ अथर्वशिरसोऽध्येता ब्रह्मचारी यतव्रतः । सत्यवादी धर्मशीलः स्वकर्मनिरतश्च सः ॥ २९ ॥ जो अथर्ववेदके ज्ञाता, ब्रह्मचारी, नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, सत्यवादी, धर्मशील और अपने कर्तव्य-कर्ममें तत्पर हैं, वे पुरुष पंक्तिपावन हैं ॥ २९ ॥ ये च पुण्येषु तीर्थेषु अभिषेककृतश्रमाः । मखेषु च समन्त्रेषु भवन्त्यवभृथप्लुताः ॥ ३० ॥ अक्रोधना ह्यचपलाः क्षान्ता दान्ता जितेन्द्रियाः । सर्वभूतहिता ये च श्राद्धेष्वेतान् निमन्त्रयेत् ॥ ३१ ॥ जिन्होंने पुण्य तीर्थोंमें गोता लगानेके लिये श्रम—प्रयत्न किया है, वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक अनेकों यज्ञोंका अनुष्ठान करके अवभृथ-स्नान किया है; जो क्रोधरहित, चपलातारहित, क्षमाशील, मनको वशमें रखनेवाले, जितेन्द्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितैषी हैं, उन्हीं ब्राह्मणोंको श्राद्धमें निमन्त्रित करना चाहिये ॥ एतेषु दत्तमक्षय्यमेते वै पंक्तिपावनाः । इमे परे महाभागा विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः ॥ ३२ ॥ क्योंकि ये पंक्तिपावन हैं; अतः इन्हें दिया हुआ दान अक्षय होता है। इनके सिवा दूसरे भी महान् भाग्यशाली पंक्तिपावन ब्राह्मण हैं, उन्हें इस प्रकार जानना चाहिये ॥ ३२ ॥ यतयो मोक्षधर्मज्ञा योगाः सुचरितव्रताः । (पाञ्चरात्रविदो मुख्यास्तथा भागवताः परे । वैखानसाः कुलश्रेष्ठा वैदिकाचारचारिणः ॥) ये चेतिहासं प्रयताः श्रावयन्ति द्विजोत्तमान् ॥ ३३ ॥ ये च भाष्यविदः केचिद् ये च व्याकरणे रताः । अधीयते पुराणं ये धर्मशास्त्राण्यथापि च ॥ ३४ ॥ अधीत्य च यथान्यायं विधिवत् तस्य कारिणः । उपपन्नो गुरुकुले सत्यवादी सहस्रशः ॥ ३५ ॥ अग्र्याः सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च । यावदेते प्रपश्यन्ति पंक्त्यास्तावत्पुनन्त्युत ॥ ३६ ॥ जो मोक्ष-धर्मका ज्ञान रखनेवाले संयमी और उत्तम प्रकारसे व्रतका आचरण करनेवाले योगी हैं, पांचरात्र आगमके जाननेवाले श्रेष्ठ पुरुष हैं, परम भागवत हैं, वानप्रस्थ-धर्मका
पालन करनेवाले, कुलमें श्रेष्ठ और वैदिक आचारका अनुष्ठान करनेवाले हैं। जो मनको संयममें रखकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इतिहास सुनाते हैं, जो महाभाष्य और व्याकरणके विद्वान् हैं तथा जो पुराण और धर्मशास्त्रोंका न्यायपूर्वक अध्ययन करके उनकी आज्ञाके अनुसार विधिवत् आचरण करनेवाले हैं, जिन्होंने नियमित समयतक गुरुकुलमें निवास करके वेदाध्ययन किया है, जो परीक्षाके सहस्रों अवसरोंपर सत्यवादी सिद्ध हुए हैं तथा जो चारों वेदोंके पढ़ने-पढ़ानेमें अग्रगण्य हैं, ऐसे ब्राह्मण पंक्ति को जितनी दूर देखते हैं उतनी दूरमें बैठे हुए ब्राह्मणोंको पवित्र कर देते हैं ॥ ३३—३६ ॥
ततो हि पावनात्पंक्त्याः पंक्तिपावन उच्यते ।
क्रोशादर्धतृतीयाच्च पावयेदेक एव हि ॥ ३७ ॥
ब्रह्मदेयानुसंतान इति ब्रह्मविदो विदुः ।
पंक्तिको पवित्र करनेके कारण ही उन्हें पंक्ति-पावन कहा जाता है। ब्रह्मवादी पुरुषोंकी यह मान्यता है कि वेदकी शिक्षा देनेवाले एवं ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंके वंशमें उत्पन्न हुआ ब्राह्मण अकेला ही साढ़े तीन कोसतकका स्थान पवित्र कर सकता है ॥ ३७ १/२ ॥
अनृत्विगनुपाध्यायः स चेदग्रासनं व्रजेत् ॥ ३८ ॥
ऋत्विग्भिरभ्यनुज्ञातः पंक्त्या हरति दुष्कृतम् ।
जो ऋत्विक् या अध्यापक न हो, वह भी यदि ऋत्विजोंकी आज्ञा लेकर श्राद्धमें अग्रासन ग्रहण करता है तो पंक्तिके दोषको हर लेता है अर्थात् दूर कर देता है ॥
अथ चेद् वेदवित् सर्वैः पंक्तिदोषैर्विवर्जितः ॥ ३९ ॥
न च स्यात् पतितो राजन् पंक्तिपावन एव सः ।
राजन्! यदि कोई वेदज्ञ ब्राह्मण सब प्रकारके पंक्तिदोषोंसे रहित है और पतित नहीं हुआ है तो वह पंक्तिपावन ही है ॥ ३९ १/२ ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन परीक्ष्यामन्त्रयेद् द्विजान् ॥ ४० ॥
स्वकर्मनिरतानन्यान् कुले जातान् बहुश्रुतान् ।
इसलिये सब प्रकारकी चेष्टाओंसे ब्राह्मणोंकी परीक्षा करके ही उन्हें श्राद्धमें निमन्त्रित करना चाहिये। वे स्वकर्ममें तत्पर रहनेवाले, कुलीन और बहुश्रुत होने चाहिये ॥ ४० १/२ ॥
यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च ॥ ४१ ॥
न प्रीणन्ति पितॄन् देवान् स्वर्गं च न स गच्छति ।
जिसके श्राद्धोंके भोजनमें मित्रोंकी प्रधानता रहती है, उसके वे श्राद्ध एवं हविष्य पितरों और देवताओंको तृप्त नहीं करते हैं तथा वह श्राद्धकर्ता पुरुष स्वर्गमें नहीं जाता है ॥ ४१ १/२ ॥
यश्च श्राद्धे कुरुते संगतानि
न देवयानेन पथा स याति ।
स वै मुक्तः पिप्पलं बन्धनाद् वा
स्वर्गाल्लोकाच्च्यवते श्राद्धमित्रः ।। ४२ ।।
जो मनुष्य श्राद्धमें भोजन देकर उससे मित्रता जोड़ता है, वह मृत्युके बाद देवमार्गसे नहीं जाने पाता। जैसे पीपलका फल डंठलसे टूटकर नीचे गिर जाता है, वैसे ही श्राद्धको मित्रताका साधन बनानेवाला पुरुष स्वर्गलोकसे भ्रष्ट हो जाता है ।। ४२ ।।
तस्मान्मित्रं श्राद्धकृन्नाद्रियेत
दद्यान्मित्रेभ्यः संग्रहार्थं धनानि ।
यन्मन्यते नैव शत्रुं न मित्रं
तं मध्यस्थं भोजयेद्धव्यकव्ये ।। ४३ ।।
इसलिये श्राद्धकर्ताको चाहिये कि वह श्राद्धमें मित्रको निमन्त्रण न दे। मित्रोंको संतुष्ट करनेके लिये धन देना उचित है। श्राद्धमें भोजन तो उसे ही कराना चाहिये जो शत्रु या मित्र न होकर मध्यस्थ हो ।। ४३ ।।
यथोषरे बीजमुप्तं न रोहे-
न्न चावप्ता प्राप्नुयाद् बीजभागम् ।
एवं श्राद्धं भुक्तमनर्हमाणै-
र्न चेह नामुत्र फलं ददाति ।। ४४ ।।
जैसे ऊसरमें बोया हुआ बीज न तो जमता है और न बोनेवालेको उसका कोई फल मिलता है, उसी प्रकार अयोग्य ब्राह्मणोंको भोजन कराया हुआ श्राद्धका अन्न न इस लोकमें लाभ पहुँचाता है, न परलोकमें ही कोई फल देता है ।। ४४ ।।
ब्राह्मणो ह्यनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति ।
तस्मै श्राद्धं न दातव्यं न हि भस्मनि हूयते ।। ४५ ।।
जैसे घास-फूसकी आग शीघ्र ही शान्त हो जाती है, उसी प्रकार स्वाध्यायहीन ब्राह्मण तेजहीन हो जाता है, अतः उसे श्राद्धका दान नहीं देना चाहिये, क्योंकि राखमें कोई भी हवन नहीं करता ।। ४५ ।।
सम्भोजनी नाम पिशाचदक्षिणा
सा नैव देवान् न पितॄनुपैति ।
इहैव सा भ्राम्यति हीनपुण्या
शालान्तरे गौरिव नष्टवत्सा ।। ४६ ।।
जो लोग एक-दूसरेके यहाँ श्राद्धमें भोजन करके परस्पर दक्षिणा देते और लेते हैं, उनकी वह दान-दक्षिणा पिशाच-दक्षिणा कहलाती है। वह न देवताओंको मिलती है, न पितरोंको। जिसका बछड़ा मर गया है ऐसी पुण्यहीना गौ जैसे दुखी होकर गोशालामें ही चक्कर लगाती रहती है, उसी प्रकार आपसमें दी और ली हुई दक्षिणा इसी लोकमें रह जाती है, वह पितरोंतक नहीं पहुँचने पाती ।। ४६ ।।
यथाग्नौ शान्ते घृतमाजुहोति
तन्नैव देवान् न पितॄनुपैति । तथा दत्तं नर्तने गायने च यां चानृते दक्षिणामावृणोति ॥ ४७ ॥ उभौ हिनस्ति न भुनक्ति चैषा या चानृते दक्षिणा दीयते वै । आघातिनी गर्हितैषा पतन्ती तेषां प्रेतान् पातयेद् देवयानात् ॥ ४८ ॥ जैसे आग बुझ जानेपर जो घृतका हवन किया जाता है, उसे न देवता पाते हैं, न पितर; उसी प्रकार नाचनेवाले, गवैये और झूठ बोलनेवाले अपात्र ब्राह्मणको दिया हुआ दान निष्फल होता है। अपात्र पुरुषको दी हुई दक्षिणा न दाताको तृप्त करती है न दान लेनेवालेको; प्रत्युत दोनोंका ही नाश करती है। यही नहीं, वह विनाशकारिणी निन्दित दक्षिणा दाताके पितरोंको देवयान-मार्गसे नीचे गिरा देती है ॥ ४७-४८ ॥
ऋषीणां समये नित्यं ये चरन्ति युधिष्ठिर । निश्चिताः सर्वधर्मज्ञास्तान् देवा ब्राह्मणान् विदुः ॥ ४९ ॥ युधिष्ठिर! जो सदा ऋषियोंके बताये हुए धर्ममार्गपर चलते हैं, जिनकी बुद्धि एक निश्चयपर पहुँची हुई है तथा जो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता हैं, उन्हींको देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं ॥ ४९ ॥
स्वाध्यायनिष्ठा ऋषयो ज्ञाननिष्ठास्तथैव च । तपोनिष्ठाश्च बोद्धव्याः कर्मनिष्ठाश्च भारत ॥ ५० ॥ भारत! ऋषि-मुनियोंमें किन्हींको स्वाध्यायनिष्ठ, किन्हींको ज्ञाननिष्ठ, किन्हींको तपोनिष्ठ और किन्हींको कर्मनिष्ठ जानना चाहिये ॥ ५० ॥
कव्यानि ज्ञाननिष्ठेभ्यः प्रतिष्ठाप्यानि भारत । तत्र ये ब्राह्मणान् केचिन्न निन्दन्ति हि ते नराः ॥ ५१ ॥ भरतनन्दन! उनमें ज्ञाननिष्ठ महर्षियोंको ही श्राद्धका अन्न जिमाना चाहिये। जो लोग ब्राह्मणोंकी निन्दा नहीं करते, वे ही श्रेष्ठ मनुष्य हैं ॥ ५१ ॥
ये तु निन्दन्ति जल्पेषु न ताञ्छ्राद्धेषु भोजयेत् । ब्राह्मणा निन्दिता राजन् हन्युस्त्रैपुरुषं कुलम् ॥ ५२ ॥ वैखानसानां वचनमृषीणां श्रूयते नृप । दूरादेव परीक्षेत ब्राह्मणान् वेदपारगान् ॥ ५३ ॥ राजन्! जो बातचीतमें ब्राह्मणोंकी निन्दा करते हैं, उन्हें श्राद्धमें भोजन नहीं कराना चाहिये। नरेश्वर! वानप्रस्थ ऋषियोंका यह वचन सुना जाता है कि 'ब्राह्मणोंकी निन्दा होनेपर वे निन्दा करनेवालेकी तीन पीढ़ियोंका नाश कर डालते हैं।' वेदवेत्ता ब्राह्मणोंकी दूरसे ही परीक्षा करनी चाहिये ॥ ५२-५३ ॥
प्रियो वा यदि वा द्वेष्यस्तेषां तु श्राद्धमावपेत् ।
यः सहस्रं सहस्राणां भोजयेदनृतान् नरः ।
एकस्तान्मन्त्रवित् प्रीतः सर्वानर्हति भारत ।। ५४ ।।
भारत! वेदज्ञ पुरुष अपना प्रिय हो या अप्रिय—इसका विचार न करके उसे श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये। जो दस लाख अपात्र ब्राह्मणको भोजन कराता है, उसके यहाँ उन सबके बदले एक ही सदा संतुष्ट रहनेवाला वेदज्ञ ब्राह्मण भोजन करनेका अधिकारी है, अर्थात् लाखों मूर्खोंकी अपेक्षा एक सत्पात्र ब्राह्मणको भोजन कराना उत्तम है ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे नवतितमोऽध्यायः ।। ९० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं)