भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 773, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 773

जो दोषदृष्टि रखते हुए दान करता है और जो बिना श्राद्धके देता है, उस सारे दानको ब्रह्माजीने असुरराज बलिका भाग निश्चित किया है ॥ २० ॥ श्वानश्च पंक्तिदूषाश्च नावेक्षेरन् कथंचन । तस्मात् परिसृते दद्यात् तिलांश्चान्ववकीरयेत् ॥ २१ ॥ कुत्तों और पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंकी किसी तरह दृष्टि न पड़े, इसके लिये सब ओरसे घिरे हुए स्थानमें श्राद्धका दान करे और वहाँ सब ओर तिल छींटे ॥ २१ ॥ तिलैर्विरहितं श्राद्धं कृतं क्रोधवशेन च । यातुधानाः पिशाचाश्च विप्रलुम्पन्ति तद्धविः ॥ २२ ॥ जो श्राद्ध तिलोंसे रहित होता है, अथवा जो क्रोधपूर्वक किया जाता है, उसके हविष्यको यातुधान (राक्षस) और पिशाच लुप्त कर देते हैं ॥ २२ ॥ अपांक्तो यावतः पांक्तान् भुञ्जानाननुपश्यति । तावत्फलाद् भ्रंशयति दातारं तस्य बालिशम् ॥ २३ ॥ पंक्तिदूषक पुरुष पंक्तिमें भोजन करनेवाले जितने ब्राह्मणोंको देख लेता है, वह मूर्ख दाताको उतने ब्राह्मणोंके दानजनित फलसे वंचित कर देता है ॥ २३ ॥ इमे तु भरतश्रेष्ठ विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः । ये त्वतस्तान् प्रवक्ष्यामि परीक्षस्वेह तान् द्विजान् ॥ २४ ॥ भरतश्रेष्ठ! अब जिनका वर्णन किया जा रहा है, इन सबको पंक्तिपावन जानना चाहिये। इनका वर्णन इसलिये करूँगा कि तुम ब्राह्मणोंकी श्राद्धमें परीक्षा कर सको ॥ विद्यावेदव्रतस्नाता ब्राह्मणाः सर्व एव हि । सदाचारपराश्चैव विज्ञेयाः सर्वपावनाः ॥ २५ ॥ विद्या और वेदव्रतमें स्नातक हुए समस्त ब्राह्मण यदि सदाचारमें तत्पर रहनेवाले हों तो उन्हें सर्वपावन जानना चाहिये ॥ २५ ॥ पांक्तेयांस्तु प्रवक्ष्यामि ज्ञेयास्ते पंक्तिपावनाः । त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णः षडंगवित् ॥ २६ ॥ अब मैं पांक्तेय ब्राह्मणोंका वर्णन करूँगा। उन्हींको पंक्तिपावन जानना चाहिये। जो त्रिणाचिकेत नामक मन्त्रोंका जप करनेवाला, गार्हपत्य आदि पाँच अग्नियोंका सेवन करनेवाला, त्रिसुपर्ण नामक (त्रिसुपर्णमित्यादि) मन्त्रोंका पाठ करनेवाला है तथा ‘ब्रह्ममेतु माम्’ इत्यादि तैत्तिरीय-प्रसिद्ध शिक्षा आदि छहों अंगोंका ज्ञान रखनेवाला है ये सब पंक्तिपावन हैं ॥ २६ ॥ ब्रह्मदेयानुसंतानश्छन्दोगो ज्येष्ठसामगः । मातापित्रोर्यश्च वश्यः श्रोत्रियों दशपूरुषः ॥ २७ ॥ जो परम्परासे वेद या पराविद्याका ज्ञाता अथवा उपदेशक है, जो वेदके छन्दोग शाखाका विद्वान् है, जो ज्येष्ठ साममन्त्रका गायक, माता-पिताके वशमें रहनेवाला और दस