भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 775, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 775

पालन करनेवाले, कुलमें श्रेष्ठ और वैदिक आचारका अनुष्ठान करनेवाले हैं। जो मनको संयममें रखकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इतिहास सुनाते हैं, जो महाभाष्य और व्याकरणके विद्वान् हैं तथा जो पुराण और धर्मशास्त्रोंका न्यायपूर्वक अध्ययन करके उनकी आज्ञाके अनुसार विधिवत् आचरण करनेवाले हैं, जिन्होंने नियमित समयतक गुरुकुलमें निवास करके वेदाध्ययन किया है, जो परीक्षाके सहस्रों अवसरोंपर सत्यवादी सिद्ध हुए हैं तथा जो चारों वेदोंके पढ़ने-पढ़ानेमें अग्रगण्य हैं, ऐसे ब्राह्मण पंक्ति को जितनी दूर देखते हैं उतनी दूरमें बैठे हुए ब्राह्मणोंको पवित्र कर देते हैं ॥ ३३—३६ ॥

ततो हि पावनात्पंक्त्याः पंक्तिपावन उच्यते ।
क्रोशादर्धतृतीयाच्च पावयेदेक एव हि ॥ ३७ ॥
ब्रह्मदेयानुसंतान इति ब्रह्मविदो विदुः ।
पंक्तिको पवित्र करनेके कारण ही उन्हें पंक्ति-पावन कहा जाता है। ब्रह्मवादी पुरुषोंकी यह मान्यता है कि वेदकी शिक्षा देनेवाले एवं ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंके वंशमें उत्पन्न हुआ ब्राह्मण अकेला ही साढ़े तीन कोसतकका स्थान पवित्र कर सकता है ॥ ३७ १/२ ॥

अनृत्विगनुपाध्यायः स चेदग्रासनं व्रजेत् ॥ ३८ ॥
ऋत्विग्भिरभ्यनुज्ञातः पंक्त्या हरति दुष्कृतम् ।
जो ऋत्विक् या अध्यापक न हो, वह भी यदि ऋत्विजोंकी आज्ञा लेकर श्राद्धमें अग्रासन ग्रहण करता है तो पंक्तिके दोषको हर लेता है अर्थात् दूर कर देता है ॥

अथ चेद् वेदवित् सर्वैः पंक्तिदोषैर्विवर्जितः ॥ ३९ ॥
न च स्यात् पतितो राजन् पंक्तिपावन एव सः ।
राजन्! यदि कोई वेदज्ञ ब्राह्मण सब प्रकारके पंक्तिदोषोंसे रहित है और पतित नहीं हुआ है तो वह पंक्तिपावन ही है ॥ ३९ १/२ ॥

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन परीक्ष्यामन्त्रयेद् द्विजान् ॥ ४० ॥
स्वकर्मनिरतानन्यान् कुले जातान् बहुश्रुतान् ।
इसलिये सब प्रकारकी चेष्टाओंसे ब्राह्मणोंकी परीक्षा करके ही उन्हें श्राद्धमें निमन्त्रित करना चाहिये। वे स्वकर्ममें तत्पर रहनेवाले, कुलीन और बहुश्रुत होने चाहिये ॥ ४० १/२ ॥

यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च ॥ ४१ ॥
न प्रीणन्ति पितॄन् देवान् स्वर्गं च न स गच्छति ।
जिसके श्राद्धोंके भोजनमें मित्रोंकी प्रधानता रहती है, उसके वे श्राद्ध एवं हविष्य पितरों और देवताओंको तृप्त नहीं करते हैं तथा वह श्राद्धकर्ता पुरुष स्वर्गमें नहीं जाता है ॥ ४१ १/२ ॥

यश्च श्राद्धे कुरुते संगतानि
न देवयानेन पथा स याति ।
स वै मुक्तः पिप्पलं बन्धनाद् वा