भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 76

स तीक्ष्णविषदिग्धेन शरेणातिबलात् क्षतः । उत्सृज्य फलपत्राणि पादपः शोषमागतः ।। ६ ।। तीखे विषसे पुष्ट हुए उस बाणसे बड़े जोरका आघात लगनेके कारण उस वृक्षमें जहर फैल गया। उसके फल और पत्ते झड़ गये और धीरे-धीरे वह सूखने लगा ।। ६ ।।

तस्मिन् वृक्षे तथाभूते कोटरेषु चिरोषितः । न जहाति शुको वासं तस्य भक्त्या वनस्पतेः ।। ७ ।। उस वृक्षके खोंखलेमें बहुत दिनोंसे एक तोता निवास करता था। उसका उस वृक्षके प्रति बड़ा प्रेम हो गया था, इसलिये वह उसके सूखनेपर भी वहाँका निवास छोड़ नहीं रहा था ।। ७ ।।

निष्प्रचारो निराहारो ग्लानः शिथिलवागपि । कृतज्ञः सह वृक्षेण धर्मात्मा सोऽप्यशुष्यत ।। ८ ।। वह धर्मात्मा एवं कृतज्ञ तोता कहीं आता-जाता नहीं था। चारा चुगना भी छोड़ चुका था। वह इतना शिथिल हो गया था कि उससे बोलातक नहीं जाता था। इस प्रकार उस वृक्षके साथ वह स्वयं भी सूखता चला जा रहा था ।। ८ ।।

तमुदारं महासत्त्वमतिमानुषचेष्टितम् । समदुःखसुखं दृष्ट्वा विस्मितः पाकशासनः ।। ९ ।।

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