महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसका धैर्य महान् था। उसकी चेष्टा अलौकिक दिखायी देती थी। दुःख और सुखमें समान भाव रखनेवाले उस उदार तोतेको देखकर पाकशासन इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ९ ॥ ततश्चिन्तामुपगतः शक्रः कथमयं द्विजः । तिर्यग्योनावसम्भाव्यमानृशंस्यमवस्थितः ॥ १० ॥ इन्द्र यह सोचने लगे कि यह पक्षी कैसे ऐसी अलौकिक दयाको अपनाये बैठा है, जो पक्षीकी योनिमें प्रायः असम्भव है ॥ १० ॥ अथवा नात्र चित्रं हि अभवद् वासवस्य तु । प्राणिनामपि सर्वेषां सर्वं सर्वत्र दृश्यते ॥ ११ ॥ अथवा इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि सब जगह सब प्राणियोंमें सब तरहकी बातें देखनेमें आती हैं—ऐसी भावना मनमें लानेपर इन्द्रका मन शान्त हुआ ॥ ११ ॥ ततो ब्राह्मणवेषेण मानुषं रूपमास्थितः । अवतीर्य महीं शक्रस्तं पक्षिणमुवाच ह ॥ १२ ॥ तदनन्तर वे ब्राह्मणके वेशमें मनुष्यका रूप धारण करके पृथ्वीपर उतरे और उस शुक पक्षीसे बोले— ॥ १२ ॥ शुक भो पक्षिणां श्रेष्ठ दाक्षेयी सुप्रजा त्वया । पृच्छे त्वां शुकमेनं त्वं कस्मान्न त्यजसि द्रुमम् ॥ १३ ॥ ‘पक्षियोंमें श्रेष्ठ शुक! तुम्हें पाकर दक्षकी दौहित्री शुकी उत्तम संतानवाली हुई है। मैं तुमसे पूछता हूँ कि अब इस वृक्षको क्यों नहीं छोड़ देते हो?’ ॥ १३ ॥ अथ पृष्टः शुकः प्राह मूर्ध्ना समभिवाद्य तम् । स्वागतं देवराज त्वं विज्ञातस्तपसा मया ॥ १४ ॥ उनके इस प्रकार पूछनेपर शुकने मस्तक नवाकर उन्हें प्रणाम किया और कहा—‘देवराज! आपका स्वागत है। मैंने तपस्याके बलसे आपको पहचान लिया है’ ॥ ततो दशशताक्षेण साधु साध्विति भाषितम् । अहो विज्ञानमित्येवं मनसा पूजितस्ततः ॥ १५ ॥ यह सुनकर सहस्रनेत्रधारी इन्द्रने मन-ही-मन कहा—‘वाह! वाह! क्या अद्भुत विज्ञान है!’ ऐसा कहकर उन्होंने मनसे ही उसका आदर किया ॥ १५ ॥ तमेवं शुभकर्माणं शुकं परमधार्मिकम् । विजानन्नपि तां प्रीतिं पप्रच्छ बलसूदनः ॥ १६ ॥ ‘वृक्षके प्रति इस तोतेका कितना प्रेम है’ इस बातको जानते हुए भी बलसूदन इन्द्रने शुभकर्म करनेवाले उस परम धर्मात्मा शुकसे पूछा— ॥ १६ ॥ निष्पत्रमफलं शुष्कमशरण्यं पतत्रिणाम् ।