भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 78

किमर्थं सेवसे वृक्षं यदा महदिदं वनम् ॥ १७ ॥ ‘शुक! इस वृक्षके पत्ते झड़ गये, फल भी नहीं रहे। यह सूख जानेके कारण पक्षियोंके बसेरे लेने योग्य नहीं रह गया है। जब यह विशाल वन पड़ा हुआ है तब तुम इस ठूंठ वृक्षका सेवन किसलिये करते हो? ।। १७ ।।

अन्येऽपि बहवो वृक्षाः पत्रसंछन्नकोटराः । शुभाः पर्याप्तसंचारा विद्यन्तेऽस्मिन् महावने ॥ १८ ॥ ‘इस विशाल वनमें और भी बहुत-से वृक्ष हैं जिनके खोखले हरे-हरे पत्तोंसे आच्छादित हैं, जो सुन्दर हैं तथा जिनपर पक्षियोंके संचारके लिये योग्य पर्याप्त स्थान हैं ।। १८ ।।

गतायुषमसामर्थ्यं क्षीणसारं हतश्रियम् । विमृश्य प्रज्ञया धीर जहीमं स्थविरं द्रुमम् ॥ १९ ॥ ‘धीर शुक! इस वृक्षकी आयु समाप्त हो गयी, शक्ति नष्ट हो गयी। इसका सार क्षीण हो गया और इसकी शोभा भी छिन गयी। अपनी बुद्धिके द्वारा इन सब बातोंपर विचार करके अब इस बूढ़े वृक्षको त्याग दो’ ।। १९ ।।

भीष्म उवाच

तदुपश्रुत्य धर्मात्मा शुकः शक्रेण भाषितम् । सुदीर्घमतिनिःश्वस्य दीनो वाक्यमुवाच ह ॥ २० ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! इन्द्रकी यह बात सुनकर धर्मात्मा शुकने लंबी साँस खींचकर दीनभावसे यह बात कही— ।। २० ।।

अनतिक्रमणीयानि दैवतानि शचीपते । यत्राभवत् तव प्रश्नस्तन्निबोध सुराधिप ॥ २१ ॥ ‘शचीवल्लभ! दैवका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। देवराज! जिसके विषयमें आपने प्रश्न किया है, उसकी बात सुनिये ।। २१ ।।

अस्मिन्नहं द्रुमे जातः साधुभिश्च गुणैर्युतः । बालभावेन संगुप्तः शत्रुभिश्च न धर्षितः ॥ २२ ॥ ‘मैंने इसी वृक्षपर जन्म लिया और यहीं रहकर अच्छे-अच्छे गुण सीखे हैं। इस वृक्षने अपने बालककी भाँति मुझे सुरक्षित रखा और मेरे ऊपर शत्रुओंका आक्रमण नहीं होने दिया।’ ।। २२ ।।

किमनुक्रोशय वैफल्यमुत्पादयसि मेऽनघ । आनृशंस्याभियुक्तस्य भक्तस्यानन्यगस्य च ॥ २३ ॥ ‘निष्पाप देवेन्द्र! इन्हीं सब कारणोंसे मेरी इस वृक्षके प्रति भक्ति है। मैं दयारूपी धर्मके पालनमें लगा हूँ और यहाँसे अन्यत्र नहीं जाना चाहता। ऐसी दशामें आप कृपा करके मेरी सद्भावनाको व्यर्थ बनानेकी चेष्टा क्यों करते हैं?’ ।। २३ ।।