भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 79

अनुक्रोशो हि साधूनां महद्धर्मस्य लक्षणम् । अनुक्रोशश्च साधूनां सदा प्रीतिं प्रयच्छति ।। २४ ।। ‘श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये दूसरोंपर दया करना ही महान् धर्मका सूचक है। दयाभाव श्रेष्ठ पुरुषोंको सदा ही आनन्द प्रदान करता है ।। २४ ।। त्वमेव दैवतैः सर्वैः पृच्छ्यसे धर्मसंशयात् । अतस्त्वं देवदेवानामाधिपत्ये प्रतिष्ठितः ।। २५ ।। ‘धर्मके विषयमें संशय होनेपर सब देवता आपसे ही अपना संदेह पूछते हैं। इसीलिये आप देवाधिदेवोंके अधिपति पदपर प्रतिष्ठित हैं ।। २५ ।। नार्हसे मां सहस्राक्ष द्रुमं त्याजयितुं चिरात् । समर्थमुपजीव्येमं त्यजेयं कथमद्य वै ।। २६ ।। ‘सहस्राक्ष! आप इस वृक्षको मुझसे छुड़ानेके लिये प्रयत्न न कीजिये। जब यह समर्थ था तब मैंने दीर्घकालसे इसीके आश्रयमें रहकर जीवन धारण किया है और आज जब यह शक्तिहीन हो गया तब इसे छोड़कर चल दूँ—यह कैसे हो सकता है?’ ।। २६ ।। तस्य वाक्येन सौम्येन हर्षितः पाकशासनः । शुकं प्रोवाच धर्मात्मा आनृशंस्येन तोषितः ।। २७ ।। तोतेकी इस कोमल वाणीसे पाकशासन इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई। धर्मात्मा देवेन्द्रने शुककी दयालुतासे संतुष्ट हो उससे कहा— ।। २७ ।। वरं वृणीष्वेति तदा स च वव्रे वरं शुकः । आनृशंस्यपरो नित्यं तस्य वृक्षस्य सम्भवम् ।। २८ ।। ‘शुक! तुम मुझसे कोई वर माँगो।’ तब दयापरायण शुकने यह वर माँगा कि ‘यह वृक्ष पहलेकी ही भाँति हरा-भरा हो जाय’ ।। २८ ।। विदित्वा च दृढां भक्तिं तां शुके शीलसम्पदम् । प्रीतः क्षिप्रमथो वृक्षममृतेनावसिक्तवान् ।। २९ ।। तोतेकी इस सुदृढ़ भक्ति और शील-सम्पत्तिको जानकर इन्द्रको और भी प्रसन्नता हुई। उन्होंने तुरंत ही उस वृक्षको अमृतसे सींच दिया ।। २९ ।।