भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 786, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 786

मेरुशृङ्गे समासीनं पितामहमुपागमन् ॥ ७ ॥
भरतनन्दन! सोमके कहनेसे वे पितरोंसहित देवता मेरुपर्वतके शिखरपर विराजमान ब्रह्माजीके पास गये ॥ ७ ॥

पितर ऊचुः
निवापान्नेन भगवन् भृशं पीड्यामहे वयम् ।
प्रसादं कुरु नो देव श्रेयो नः संविधीयताम् ॥ ८ ॥
पितरोंने कहा—भगवन्! निरन्तर श्राद्धका अन्न खानेसे हम अजीर्णतावश अत्यन्त कष्ट पा रहे हैं। देव! हमलोगोंपर कृपा कीजिये और हमें कल्याणके भागी बनाइये ॥ ८ ॥
इति तेषां वचः श्रुत्वा स्वयम्भूरिदमब्रवीत् ।
एष मे पार्श्वतो वह्निर्युष्मच्छ्रेयोऽभिधास्यति ॥ ९ ॥
पितरोंकी यह बात सुनकर स्वयम्भू ब्रह्माजीने इस प्रकार कहा—'देवगण! मेरे निकट ये अग्निदेव विराजमान हैं। ये ही तुम्हारे कल्याणकी बात बतायेंगे' ॥ ९ ॥

अग्निरुवाच
सहितास्तात भोक्ष्यामो निवापे समुपस्थिते ।
जरयिष्यथ चाप्यन्नं मया सार्धं न संशयः ॥ १० ॥
अग्नि बोले—देवताओ और पितरो! अबसे श्राद्धका अवसर उपस्थित होनेपर हमलोग साथ ही भोजन किया करेंगे। मेरे साथ रहनेसे आपलोग उस अन्नको पचा सकेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १० ॥
एतच्छ्रुत्वा तु पितरस्ततस्ते विज्वराऽभवन् ।
एतस्मात् कारणाच्चाग्नेः प्राक् तावद् दीयते नृप ॥ ११ ॥
नरेश्वर! अग्निकी यह बात सुनकर वे पितर निश्चिन्त हो गये; इसीलिये श्राद्धमें पहले अग्निको ही भाग अर्पित किया जाता है ॥ ११ ॥
निवप्ते चाग्निपूर्वं वै निवापे पुरुषर्षभ ।
न ब्रह्मराक्षसास्तं वै निवापं धर्षयन्त्युत ॥ १२ ॥
पुरुषप्रवर! अग्निमें हवन करनेके बाद जो पितरोंके निमित्त पिण्डदान दिया जाता है, उसे ब्रह्मराक्षस दूषित नहीं करते ॥ १२ ॥
रक्षांसि चापवर्तन्ते स्थिते देवे हुताशने ।
पूर्वं पिण्डं पितुर्दद्यात् ततो दद्यात् पितामहे ॥ १३ ॥
अग्निदेवके विराजमान रहनेपर राक्षस वहाँसे भाग जाते हैं। सबसे पहले पिताको पिण्ड देना चाहिये, फिर पितामहको ॥ १३ ॥
प्रपितामहाय च तत एष श्राद्धविधिः स्मृतः ।
ब्रूयाच्छाद्धे च सावित्रीं पिण्डे पिण्डे समाहितः ॥ १४ ॥