महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 787, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर प्रपितामहको पिण्ड देना चाहिये। यह श्राद्धकी विधि बतायी गयी है। श्राद्धमें एकाग्रचित्त हो प्रत्येक पिण्ड देते समय गायत्री-मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये ।। १४ ।।
सोमायेति च वक्तव्यं तथा पितृमतेति च ।
रजस्वला च या नारी व्यंगिता कर्णयोश्च या ।
निवापे नोपतिष्ठेत संग्राह्या नान्यवंशजा ।। १५ ।।
पिण्ड-दानके आरम्भमें पहले अग्नि और सोमके लिये जो दो भाग दिये जाते हैं, उनके मन्त्र क्रमशः इस प्रकार हैं—‘अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा’, ‘सोमाय पितृमते स्वाहा।’ जो स्त्री रजस्वला हो अथवा जिसके दोनों कान बहरे हों, उसको श्राद्धमें नहीं ठहरना चाहिये। दूसरे वंशकी स्त्रीको भी श्राद्धकर्ममें नहीं लेना चाहिये ।।
जलं प्रतरमाणश्च कीर्तयेत पितामहान् ।
नदीमासाद्य कुर्वीत पितॄणां पिण्डतर्पणम् ।। १६ ।।
जलको तैरते समय पितामहों (के नामों) का कीर्तन करे। किसी नदीके तटपर जानेके बाद वहाँ पितरोंके लिये पिण्डदान और तर्पण करना चाहिये ।। १६ ।।
पूर्वं स्ववंशजानां तु कृत्वाद्विस्तर्पणं पुनः ।
सुहृत्सम्बन्धिवर्गाणां ततो दद्याज्जलाञ्जलिम् ।। १७ ।।
पहले अपने वंशमें उत्पन्न पितरोंका जलके द्वारा तर्पण करके तत्पश्चात् सुहृद् और सम्बन्धियोंके समुदायको जलांजलि देनी चाहिये ।। १७ ।।
कल्माषगोयुगेनाथ युक्तेन तरतो जलम् ।
पितरोऽभिलषन्ते वै नावं चाप्यधिरोहिताः ।। १८ ।।
जो चितकबरे रंगके बैलोंसे जुती गाड़ीपर बैठकर नदीके जलको पार कर रहा हो, उसके पितर इस समय मानो नावपर बैठकर उससे जलांजलि पानेकी इच्छा रखते हैं ।।
सदा नावि जलं तज्ज्ञाः प्रयच्छन्ति समाहिताः ।
मासार्धे कृष्णपक्षस्य कुर्यान्निर्वपणाणि वै ।। १९ ।।
पुष्टिरायुस्तथा वीर्यं श्रीश्चैव पितृभक्तितः ।
अतः जो इस बातको जानते हैं, वे एकाग्रचित्त हो नावपर बैठनेपर सदा ही पितरोंके लिये जल दिया करते हैं। महीनेका आधा समय बीत जानेपर कृष्णपक्षकी अमावास्या तिथिको अवश्य श्राद्ध करना चाहिये। पितरोंकी भक्तिसे मनुष्यको पुष्टि, आयु, वीर्य और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है ।। १९ १/२ ।।
पितामहः पुलस्त्यश्च वसिष्ठः पुलहस्तथा ।। २० ।।
अंगिराश्च क्रतुश्चैव कश्यपश्च महानृषिः ।
एते कुरुकुलश्रेष्ठ महायोगेश्वराः स्मृताः ।। २१ ।।
एते च पितरो राजन्नेष श्राद्धविधिः परः ।