महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभरद्वाज उवाच
उत्पन्नस्य रुरोः शृंगं वर्धमानस्य वर्धते ।
प्रार्थना पुरुषस्येव तस्य मात्रा न विद्यते ॥ ४१ ॥
**भरद्वाज बोले—**जैसे उत्पन्न हुए मृगका सींग उसके बढ़नेके साथ-साथ बढ़ता रहता है, उसी प्रकार मनुष्यकी तृष्णा सदा बढ़ती ही रहती है, उसकी कोई सीमा नहीं है ॥
गौतम उवाच
न तल्लोके द्रव्यमस्ति यल्लोकं प्रतिपूरयेत् ।
समुद्रकल्पः पुरुषो न कदाचन पूर्यते ॥ ४२ ॥
**गौतमने कहा—**संसारमें ऐसा कोई द्रव्य नहीं है, जो मनुष्यकी आशाका पेट भर सके। पुरुषकी आशा समुद्रके समान है, वह कभी भरती ही नहीं ॥ ४२ ॥
विश्वामित्र उवाच
कामं कामयमानस्य यदा कामः समृध्यते ।
अथैनमपरः कामस्तृष्णाविध्यति बाणवत् ॥ ४३ ॥
**विश्वामित्र बोले—**किसी वस्तुकी कामना करनेवाले मनुष्यकी एक इच्छा जब पूरी होती है, तब दूसरी नयी उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार तृष्णा तीरकी तरह मनुष्यके मनपर चोट करती ही रहती है ॥ ४३ ॥
(अत्रिरुवाच
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्धते ॥)
**अत्रि बोले—**भोगोंकी कामना उनके उपभोगसे कभी नहीं शान्त होती है। अपितु घीकी आहुति पड़नेपर प्रज्वलित होनेवाली आगकी भाँति वह और भी बढ़ती ही जाती है ॥
जमदग्निरुवाच
प्रतिग्रहे संयमो वै तपो धारयते ध्रुवम् ।
तद् धनं ब्राह्मणस्येह लुभ्यमानस्य विस्रवेत् ॥ ४४ ॥
**जमदग्निने कहा—**प्रतिग्रह न लेनेसे ही ब्राह्मण अपनी तपस्याको सुरक्षित रख सकता है। तपस्या ही ब्राह्मणका धन है। जो लौकिक धनके लिये लोभ करता है, उसका तपरूपी धन नष्ट हो जाता है ॥ ४४ ॥
अरुन्धत्युवाच
धर्मार्थं संचयो यो वै द्रव्याणां पक्षसम्मतः ।