भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 797, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 797

तपःसंचय एवेह विशिष्टो द्रव्यसंचयात् ॥ ४५ ॥ **अरुन्धती बोलीं—**संसारमें एक पक्षके लोगोंकी राय है कि धर्मके लिये धनका संग्रह करना चाहिये; किंतु मेरी रायमें धन-संग्रहकी अपेक्षा तपस्याका संचय ही श्रेष्ठ है ॥ ४५ ॥

गण्डोवाच

उग्रादितो भयाद् यस्माद् बिभ्यतीमे ममेश्वराः । बलीयांसो दुर्बलवद् बिभेम्यहमतः परम् ॥ ४६ ॥ **गण्डाने कहा—**मेरे ये मालिक लोग अत्यन्त शक्तिशाली होते हुए भी जब इस भयंकर प्रतिग्रहके भयसे इतना डरते हैं, तब मेरी क्या सामर्थ्य है? मुझे तो दुर्बल प्राणियोंकी भाँति इससे बहुत बड़ा भय लग रहा है ॥

पशुसख उवाच

यद् वै धर्मे परं नास्ति ब्राह्मणास्तद्धनं विदुः । विनयार्थं सुविद्वांसमुपासेयं यथातथम् ॥ ४७ ॥ **पशुसखने कहा—**धर्मका पालन करनेपर जिस धनकी प्राप्ति होती है, उससे बढ़कर कोई धन नहीं है। उस धनको ब्राह्मण ही जानते हैं; अतः मैं भी उसी धर्ममय धनकी प्राप्तिका उपाय सीखनेके लिये विद्वान् ब्राह्मणोंकी सेवामें लगा हूँ ॥ ४७ ॥

ऋषय ऊचुः

कुशलं सह दानेन तस्मै यस्य प्रजा इमाः । फलान्युपधियुक्तानि य एवं नः प्रयच्छति ॥ ४८ ॥ **ऋषियोंने कहा—**जिसकी प्रजा ये कपटयुक्त फल देनेके लिये ले आयी है तथा जो इस प्रकार फलके व्याजसे हमें सुवर्णदान कर रहा है, वह राजा अपने दानके साथ ही कुशलसे रहे ॥ ४८ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्त्वा हेमगर्भाणि हित्वा तानि फलानि वै । ऋषयो जग्मुरन्यत्र सर्व एव धृतव्रताः ॥ ४९ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! यह कहकर उन सुवर्णयुक्त फलोंका परित्याग करके वे समस्त व्रतधारी महर्षि वहाँसे अन्यत्र चले गये ॥ ४९ ॥

मन्त्रिण ऊचुः

उपधिं शंकमानास्ते हित्वा तानि फलानि वै । ततोऽन्येनैव गच्छन्ति विदितं तेऽस्तु पार्थिव ॥ ५० ॥