भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 798, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 798

**तब मन्त्रियोंने शैव्यके पास जाकर कहा—**महाराज! आपको विदित हो कि उन फलोंको देखते ही ऋषियोंको यह संदेह हुआ कि हमारे साथ छल किया जा रहा है। इसलिये वे फलोंका परित्याग करके दूसरे मार्गसे चले गये हैं ।। ५० ।।
इत्युक्तः स तु भृत्यैस्तैर्वृषादर्भिश्चुकोप ह ।
तेषां वै प्रतिकर्तुं च सर्वेषामगमद् गृहम् ।। ५१ ।।
सेवकोंके ऐसा कहनेपर राजा वृषादर्भिको बड़ा कोप हुआ और वे उन सप्तर्षियोंसे अपने अपमानका बदला लेनेका विचार करके राजधानीको लौट गये ।। ५१ ।।
स गत्वा हवनीयेऽग्नौ तीव्रं नियममास्थितः ।
जुहाव संस्कृतैर्मन्त्रैरेकैकामाहुतिं नृपः ।। ५२ ।।
वहाँ जाकर अत्यन्त कठोर नियमोंका पालन करते हुए वे आहवनीय अग्निमें आभिचारिक मन्त्र पढ़कर एक-एक आहुति डालने लगे ।। ५२ ।।
तस्मादग्नेः समुत्तस्थौ कृत्या लोकभयंकरी ।
तस्या नाम वृषादर्भिर्यातुधानीत्यथाकरोत् ।। ५३ ।।
आहुति समाप्त होनेपर उस अग्निसे एक लोकभयंकर कृत्या प्रकट हुई। राजा वृषादर्भिने उसका नाम यातुधानी रखा ।। ५३ ।।
सा कृत्या कालरात्रीव कृताञ्जलिरुपस्थिता ।
वृषादर्भिं नरपतिं किं करोमीति चाब्रवीत् ।। ५४ ।।
कालरात्रिके समान विकराल रूप धारण करनेवाली वह कृत्या हाथ जोड़कर राजाके पास उपस्थित हुई और बोली—'महाराज! मैं आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ?' ।। ५४ ।।

वृषादर्भिरुवाच

ऋषीणां गच्छ सप्तानामरुन्धत्यास्तथैव च ।
दासीभर्तुश्च दास्याश्च मनसा नाम धारय ।। ५५ ।।
ज्ञात्वा नामानि चैवैषां सर्वनेतान् विनाशय ।
विनष्टेषु तथा स्वैरं गच्छ यत्रेप्सितं तव ।। ५६ ।।
**वृषादर्भिने कहा—**यातुधानी! तुम यहाँसे वनमें जाओ और वहाँ अरुन्धतीसहित सातों ऋषियोंका, उनकी दासीका और उस दासीके पतिका भी नाम पूछकर उसका तात्पर्य अपने मनमें धारण करो। इस प्रकार उन सबके नामोंका अर्थ समझकर उन्हें मार डालो; उसके बाद जहाँ इच्छा हो चली जाना ।। ५५-५६ ।।
सा तथेति प्रतिश्रुत्य यातुधानी स्वरूपिणी ।
जगाम तद् वनं यत्र विचेरुस्ते महर्षयः ।। ५७ ।।