महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजाकी यह आज्ञा पाकर यातुधानीने ‘तथास्तु’ कहकर इसे स्वीकार किया और जहाँ वे महर्षि विचरा करते थे, उस वनमें चली गयी ।। ५७ ।।
भीष्म उवाच
अथात्रिप्रमुखा राजन् वने तस्मिन् महर्षयः ।
व्यचरन् भक्षयन्तो वै मूलानि च फलानि च ।। ५८ ।।
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! उन दिनों वे अत्रि आदि महर्षि उस वनमें फल-मूलका आहार करते हुए घूमा करते थे ।। ५८ ।।
अथापश्यन् सुपीनांसपाणिपादमुखोदरम् ।
परिव्रजन्तं स्थूलांगं परिव्राजं शुना सह ।। ५९ ।।
एक दिन उन महर्षियोंने देखा, एक संन्यासी कुत्तेके साथ वहाँ इधर-उधर विचर रहा है। उसका शरीर बहुत मोटा था। उसके मोटे कंधे, हाथ, पैर, मुख और पेट आदि सभी अंग सुन्दर और सुडौल थे ।। ५९ ।।
अरुन्धती तु तं दृष्ट्वा सर्वांगोपचितं शुभम् ।
भवितारो भवन्तो वै नैवमित्यब्रवीदृषीन् ।। ६० ।।
अरुन्धतीने सारे अंगोंसे हृष्ट-पुष्ट हुए उस सुन्दर संन्यासीको देखकर ऋषियोंसे कहा—‘क्या आपलोग कभी ऐसे नहीं हो सकेंगे?’ ।। ६० ।।
वसिष्ठ उवाच
नैतस्येह यथास्माकमग्निहोत्रमनिर्वृतम् ।
सायं प्रातश्च होतव्यं तेन पीवाञ्छुना सह ।। ६१ ।।
वसिष्ठजीने कहा— हमलोगोंकी तरह इसको इस बातकी चिन्ता नहीं है कि आज हमारा अग्निहोत्र नहीं हुआ और सबेरे तथा शामको अग्निहोत्र करना है; इसीलिये यह कुत्तेके साथ खूब मोटा-ताजा हो गया है ।। ६१ ।।
अत्रिरुवाच
नैतस्येह यथास्माकं क्षुधा वीर्यं समाहतम् ।
कृच्छ्राधीतं प्रणष्टं च तेन पीवाञ्छुना सह ।। ६२ ।।
अत्रि बोले— हमलोगोंकी तरह भूखके मारे उसकी सारी शक्ति नष्ट नहीं हो गयी है तथा बड़े कष्टसे जो वेदोंका अध्ययन किया गया था, वह भी हमारी तरह इसका नष्ट नहीं हुआ है; इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ।। ६२ ।।
विश्वामित्र उवाच
नैतस्येह यथास्माकं शश्वच्छास्त्रं जरद्गवः ।
अलसः क्षुत्परो मूर्खस्तेन पीवाञ्छुना सह ।। ६३ ।।