भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 814, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 814

एष धर्मः परो राजंस्तस्माल्लोभं विवर्जयेत् ॥ १४३ ॥ राजन्! इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह सभी दशाओंमें लोभका त्याग करे, क्योंकि यह सबसे बड़ा धर्म है। अतः लोभको अवश्य त्याग देना चाहिये ॥ १४३ ॥

इदं नरः सुचरितं समवायेषु कीर्तयन् । अर्थभागी च भवति न च दुर्गाण्यवाप्नुते ॥ १४४ ॥ जो मनुष्य जनसमुदायमें इस पवित्र चरित्रका कीर्तन करता है, वह धन एवं मनोवांछित वस्तुका भागी होता है और कभी संकटमें नहीं पड़ता है ॥ १४४ ॥

प्रीयन्ते पितरश्चास्य ऋषयो देवतास्तथा । यशोधर्मार्थभागी च भवति प्रेत्य मानवः ॥ १४५ ॥ उसके ऊपर देवता, ऋषि और पितर सभी प्रसन्न होते हैं। वह मनुष्य इहलोकमें यश, धर्म एवं धनका भागी होता है। और मृत्युके पश्चात् उसे स्वर्गलोक सुलभ होता है ॥ १४५ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि बिसस्तैन्योपाख्याने त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मृणालकी चोरीका उपाख्यानविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १४६ १/२ श्लोक हैं)


* पोष्यवर्ग