महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 813, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमया ह्यन्तर्हितानीह बिसानीमानि पश्यत । परीक्षार्थं भगवतां कृतमेवं मयानघाः ॥ १३५ ॥ मैंने उन मृणालोंको यहाँ छिपा दिया था। देखिये, ये रहे आपके मृणाल। निष्पाप मुनियो! मैंने आपलोगोंकी परीक्षाके लिये ही ऐसा किया था ॥ १३५ ॥ रक्षणार्थं च सर्वेषां भवतामहमागतः । यातुधानी ह्यतिक्रूरा कृत्यैषा वो वधैषिणी ॥ १३६ ॥ मैं आप सब लोगोंकी रक्षाके लिये यहाँ आया था यह यातुधानी अत्यन्त क्रूर स्वभाववाली कृत्या थी और आपलोगोंका वध करना चाहती थी ॥ १३६ ॥ वृषादर्भिप्रयुक्तेषा निहता मे तपोधनाः । दुष्टा हिंस्यादियं पापा युष्मान् प्रत्यग्निसम्भवा ॥ १३७ ॥ तस्मादस्म्यागतो विप्रा वासवं मां निबोधत । अलोभादक्षया लोकाः प्राप्ता वै सार्वकामिकाः ॥ १३८ ॥ उत्तिष्ठध्वमितः क्षिप्रं तानवाप्नुत वै द्विजाः ॥ १३९ ॥ तपोधनो! राजा वृषादर्भिने इसे भेजा था, किंतु यह मेरे द्वारा मारी गयी। ब्राह्मणो! मैंने सोचा कि अग्निसे उत्पन्न यह दुष्ट पापिनी कृत्या कहीं आप-लोगोंकी हिंसा न कर डाले; इसलिये मैं यहाँ आ गया। आपलोग मुझे इन्द्र समझें। आपलोगोंने जो लोभका परित्याग किया है, इससे आपको वे अक्षयलोक प्राप्त हुए हैं, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले हैं। अतः ब्राह्मणो! अब आपलोग यहाँसे उठें और शीघ्र उन लोकोंमें पदार्पण करें ॥ १३७—१३९ ॥
भीष्म उवाच
ततो महर्षयः प्रीतास्तथेत्युक्त्वा पुरंदरम् । सहैव त्रिदशेन्द्रेण सर्वे जग्मुस्त्रिविष्टपम् ॥ १४० ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इन्द्रकी बात सुनकर महर्षियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने देवराजसे ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। फिर वे सब-के-सब देवेन्द्रके साथ ही स्वर्गलोक चले गये ॥ १४० ॥ एवमेते महात्मानो भोगैर्बहुविधैरपि । क्षुधा परमया युक्ताश्छन्द्यमाना महात्मभिः ॥ १४१ ॥ नैव लोभं तदा चक्रुस्ततः स्वर्गमवाप्नुवन् ॥ १४२ ॥ इस प्रकार उन महात्माओंने अत्यन्त भूखे होनेपर और बड़े-बड़े लोगोंके अनेक प्रकारके भोगोंद्वारा लालच देनेपर भी उस समय लोभ नहीं किया। इसीसे उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई ॥ १४१-१४२ ॥ तस्मात् सर्वास्ववस्थासु नरो लोभं विवर्जयेत् ।