महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 812, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाधयित्वा स्वयं प्राशेद दास्ये जीर्यतु चैव ह । विकर्मणा प्रमीयेत बिसस्तैन्यं करोति या ॥ १३० ॥ जिस स्त्रीने मृणाल चुराया हो उसे रसोई बनाकर अकेली भोजन करनेका, दूसरोंकी गुलामी करती-करती ही बूढ़ी होनेका और पापकर्म करके मौतके मुखमें पड़नेका पाप लगे ॥ १३० ॥
पशुसख उवाच
दास एव प्रजायेतामप्रसूतिरकिंचनः । दैवतेष्वनमस्कारो बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १३१ ॥ पशुसख बोला—जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसे दूसरे जन्ममें भी दासीके ही घरमें पैदा होने, संतानहीन और निर्धन होने तथा देवताओंको नमस्कार न करनेका पाप लगे ॥ १३१ ॥
शुनःसख उवाच
अध्वर्यवे दुहितरं वा ददातु च्छन्दोगे वा चरितब्रह्मचर्ये । आथर्वणं वेदमधीत्य विप्रः स्नायीत वा यो हरते बिसानि ॥ १३२ ॥ शुनःसखने कहा—जिसने मृणालोंको चुराया हो वह ब्रह्मचर्यव्रत पूर्ण करके आये हुए यजुर्वेदी अथवा सामवेदी विद्वान्को कन्यादान दे अथवा वह ब्राह्मण अथर्ववेदका अध्ययन पूरा करके शीघ्र ही स्नातक बन जाय ॥ १३२ ॥
ऋषय ऊचुः
इष्टमेतद् द्विजातीनां योऽयं ते शपथः कृतः । त्वया कृतं बिसस्तैन्यं सर्वेषां नः शुनःसख ॥ १३३ ॥ ऋषियोंने कहा—शुनःसख! तुमने जो शपथ की है, वह तो ब्राह्मणोंको अभीष्ट ही है। अतः जान पड़ता है, हमारे मृणालोंकी चोरी तुमने ही की है ॥ १३३ ॥
शुनःसख उवाच
न्यस्तमद्यं न पश्यद्भिर्यदुक्तं कृतकर्मभिः । सत्यमेतन्न मिथ्यैतद् बिसस्तैन्यं कृतं मया ॥ १३४ ॥ शुनःसखने कहा—मुनिवरो! आपका कहना ठीक है। वास्तवमें आपका भोजन मैंने ही रख लिया है। आपलोग जब तर्पण कर रहे थे, उस समय आपकी दृष्टि इधर नहीं थी; तभी मैंने वह सब लेकर रख लिया था। अतः आपका यह कथन कि तुमने ही मृणाल चुराये हैं, ठीक है। मिथ्या नहीं है। वास्तवमें मैंने ही उन मृणालोंकी चोरी की है ॥ १३४ ॥