महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
साधयित्वा स्वयं प्राशेद दास्ये जीर्यतु चैव ह । विकर्मणा प्रमीयेत बिसस्तैन्यं करोति या ॥ १३० ॥ जिस स्त्रीने मृणाल चुराया हो उसे रसोई बनाकर अकेली भोजन करनेका, दूसरोंकी गुलामी करती-करती ही बूढ़ी होनेका और पापकर्म करके मौतके मुखमें पड़नेका पाप लगे ॥ १३० ॥
पशुसख उवाच
दास एव प्रजायेतामप्रसूतिरकिंचनः । दैवतेष्वनमस्कारो बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १३१ ॥ पशुसख बोला—जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसे दूसरे जन्ममें भी दासीके ही घरमें पैदा होने, संतानहीन और निर्धन होने तथा देवताओंको नमस्कार न करनेका पाप लगे ॥ १३१ ॥
शुनःसख उवाच
अध्वर्यवे दुहितरं वा ददातु च्छन्दोगे वा चरितब्रह्मचर्ये । आथर्वणं वेदमधीत्य विप्रः स्नायीत वा यो हरते बिसानि ॥ १३२ ॥ शुनःसखने कहा—जिसने मृणालोंको चुराया हो वह ब्रह्मचर्यव्रत पूर्ण करके आये हुए यजुर्वेदी अथवा सामवेदी विद्वान्को कन्यादान दे अथवा वह ब्राह्मण अथर्ववेदका अध्ययन पूरा करके शीघ्र ही स्नातक बन जाय ॥ १३२ ॥
ऋषय ऊचुः
इष्टमेतद् द्विजातीनां योऽयं ते शपथः कृतः । त्वया कृतं बिसस्तैन्यं सर्वेषां नः शुनःसख ॥ १३३ ॥ ऋषियोंने कहा—शुनःसख! तुमने जो शपथ की है, वह तो ब्राह्मणोंको अभीष्ट ही है। अतः जान पड़ता है, हमारे मृणालोंकी चोरी तुमने ही की है ॥ १३३ ॥
शुनःसख उवाच
न्यस्तमद्यं न पश्यद्भिर्यदुक्तं कृतकर्मभिः । सत्यमेतन्न मिथ्यैतद् बिसस्तैन्यं कृतं मया ॥ १३४ ॥ शुनःसखने कहा—मुनिवरो! आपका कहना ठीक है। वास्तवमें आपका भोजन मैंने ही रख लिया है। आपलोग जब तर्पण कर रहे थे, उस समय आपकी दृष्टि इधर नहीं थी; तभी मैंने वह सब लेकर रख लिया था। अतः आपका यह कथन कि तुमने ही मृणाल चुराये हैं, ठीक है। मिथ्या नहीं है। वास्तवमें मैंने ही उन मृणालोंकी चोरी की है ॥ १३४ ॥
मया ह्यन्तर्हितानीह बिसानीमानि पश्यत । परीक्षार्थं भगवतां कृतमेवं मयानघाः ॥ १३५ ॥ मैंने उन मृणालोंको यहाँ छिपा दिया था। देखिये, ये रहे आपके मृणाल। निष्पाप मुनियो! मैंने आपलोगोंकी परीक्षाके लिये ही ऐसा किया था ॥ १३५ ॥ रक्षणार्थं च सर्वेषां भवतामहमागतः । यातुधानी ह्यतिक्रूरा कृत्यैषा वो वधैषिणी ॥ १३६ ॥ मैं आप सब लोगोंकी रक्षाके लिये यहाँ आया था यह यातुधानी अत्यन्त क्रूर स्वभाववाली कृत्या थी और आपलोगोंका वध करना चाहती थी ॥ १३६ ॥ वृषादर्भिप्रयुक्तेषा निहता मे तपोधनाः । दुष्टा हिंस्यादियं पापा युष्मान् प्रत्यग्निसम्भवा ॥ १३७ ॥ तस्मादस्म्यागतो विप्रा वासवं मां निबोधत । अलोभादक्षया लोकाः प्राप्ता वै सार्वकामिकाः ॥ १३८ ॥ उत्तिष्ठध्वमितः क्षिप्रं तानवाप्नुत वै द्विजाः ॥ १३९ ॥ तपोधनो! राजा वृषादर्भिने इसे भेजा था, किंतु यह मेरे द्वारा मारी गयी। ब्राह्मणो! मैंने सोचा कि अग्निसे उत्पन्न यह दुष्ट पापिनी कृत्या कहीं आप-लोगोंकी हिंसा न कर डाले; इसलिये मैं यहाँ आ गया। आपलोग मुझे इन्द्र समझें। आपलोगोंने जो लोभका परित्याग किया है, इससे आपको वे अक्षयलोक प्राप्त हुए हैं, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले हैं। अतः ब्राह्मणो! अब आपलोग यहाँसे उठें और शीघ्र उन लोकोंमें पदार्पण करें ॥ १३७—१३९ ॥
भीष्म उवाच
ततो महर्षयः प्रीतास्तथेत्युक्त्वा पुरंदरम् । सहैव त्रिदशेन्द्रेण सर्वे जग्मुस्त्रिविष्टपम् ॥ १४० ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इन्द्रकी बात सुनकर महर्षियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने देवराजसे ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। फिर वे सब-के-सब देवेन्द्रके साथ ही स्वर्गलोक चले गये ॥ १४० ॥ एवमेते महात्मानो भोगैर्बहुविधैरपि । क्षुधा परमया युक्ताश्छन्द्यमाना महात्मभिः ॥ १४१ ॥ नैव लोभं तदा चक्रुस्ततः स्वर्गमवाप्नुवन् ॥ १४२ ॥ इस प्रकार उन महात्माओंने अत्यन्त भूखे होनेपर और बड़े-बड़े लोगोंके अनेक प्रकारके भोगोंद्वारा लालच देनेपर भी उस समय लोभ नहीं किया। इसीसे उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई ॥ १४१-१४२ ॥ तस्मात् सर्वास्ववस्थासु नरो लोभं विवर्जयेत् ।
एष धर्मः परो राजंस्तस्माल्लोभं विवर्जयेत् ॥ १४३ ॥ राजन्! इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह सभी दशाओंमें लोभका त्याग करे, क्योंकि यह सबसे बड़ा धर्म है। अतः लोभको अवश्य त्याग देना चाहिये ॥ १४३ ॥
इदं नरः सुचरितं समवायेषु कीर्तयन् । अर्थभागी च भवति न च दुर्गाण्यवाप्नुते ॥ १४४ ॥ जो मनुष्य जनसमुदायमें इस पवित्र चरित्रका कीर्तन करता है, वह धन एवं मनोवांछित वस्तुका भागी होता है और कभी संकटमें नहीं पड़ता है ॥ १४४ ॥
प्रीयन्ते पितरश्चास्य ऋषयो देवतास्तथा । यशोधर्मार्थभागी च भवति प्रेत्य मानवः ॥ १४५ ॥ उसके ऊपर देवता, ऋषि और पितर सभी प्रसन्न होते हैं। वह मनुष्य इहलोकमें यश, धर्म एवं धनका भागी होता है। और मृत्युके पश्चात् उसे स्वर्गलोक सुलभ होता है ॥ १४५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि बिसस्तैन्योपाख्याने त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मृणालकी चोरीका उपाख्यानविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १४६ १/२ श्लोक हैं)
* पोष्यवर्ग
ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस द
चतुर्नवतितमोऽध्यायः
ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना
भीष्म उवाच
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यद् वृत्तं तीर्थयात्रायां शपथं प्रति तच्छृणु ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इसी विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है। तीर्थयात्राके प्रसंगमें इसी तरहकी शपथको लेकर जो एक घटना घटित हुई थी, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ १ ॥
पुष्करार्थं कृतं स्तैन्यं पुरा भरतसत्तम ।
राजर्षिभिर्महाराज तथैव च द्विजर्षिभिः ॥ २ ॥
भरतवंशशिरोमणे! महाराज! पूर्वकालमें कुछ राजर्षियों और ब्रह्मर्षियोंने भी इसी प्रकार कमलोंके लिये चोरी की थी ॥ २ ॥
ऋषयः समेताः पश्चिमे वै प्रभासे
समागता मन्त्रममन्त्रयन्त ।
चराम सर्वां पृथिवीं पुण्यतीर्थां
तन्नः कामं हन्त गच्छाम सर्वे ॥ ३ ॥
पश्चिम समुद्रके तटपर प्रभास तीर्थमें बहुत-से ऋषि एकत्र हुए थे। उन समागत महर्षियोंने आपसमें यह सलाह की कि हमलोग अनेक पुण्यतीर्थोंसे भरी हुई समूची पृथ्वीकी यात्रा करें। यह हम सभी लोगोंकी अभिलाषा है। अतः सब लोग साथ-ही-साथ यात्रा प्रारम्भ कर दें ॥ ३ ॥
शुक्रोऽङ्गिराश्चैव कविश्च विद्वां-
स्तथा ह्यगस्त्यो नारदपर्वतौ च ।
भृगुर्वसिष्ठः कश्यपो गौतमश्च
विश्वामित्रो जमदग्निश्च राजन् ॥ ४ ॥
ऋषिस्तथा गालवोऽथाष्टकश्च
भरद्वाजोऽरुन्धती वालखिल्याः ।
शिबिर्दिलीपो नहुषोऽम्बरीषो
राजा ययातिर्धुन्धुमारोऽथ पूरुः ॥ ५ ॥
जग्मुः पुरस्कृत्य महानुभावं
शतक्रतुं वृत्रहणं नरेन्द्राः ।
तीर्थानि सर्वाणि परिभ्रमन्तो
माघ्यां ययुः कौशिकीं पुण्यतीर्थाम् ॥ ६ ॥
राजन्! ऐसा निश्चय करके शुक्र, अंगिरा, विद्वान् कवि, अगस्त्य, नारद, पर्वत, भृगु, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि, गालव मुनि, अष्टक, भरद्वाज, अरुन्धती, वालखिल्यगण, शिबि, दिलीप, नहुष, अम्बरीष, राजा ययाति, धुन्धुमार और पूरु—ये सभी राजर्षि तथा ब्रह्मर्षि वज्रधारी महानुभाव वृत्रहन्ता शतक्रतु इन्द्रको आगे करके यात्राके लिये निकले और सभी तीर्थोंमें घूमते हुए माघ मासकी पूर्णिमा तिथिको पुण्यसलिला कौशिकी नदीके तटपर जा पहुँचे ॥ ४—६ ॥
सर्वेषु तीर्थेष्ववधूतपापा
जग्मुस्ततो ब्रह्मसरः सुपुण्यम् ।
देवस्य तीर्थे जलमग्निकल्पा
विगाह्य ते भुक्तबिसप्रसूनाः ॥ ७ ॥
इस प्रकार वहाँके तीर्थोंमें स्नानके द्वारा अपने पाप धो करके ऋषिगण उस स्थानसे परम पवित्र ब्रह्मसर तीर्थमें गये। उन अग्निके समान तेजस्वी ऋषियोंने वहाँके जलमें स्नान करके कमलके फूलोंका आहार किया ॥ ७ ॥
केचिद् बिसान्यखनंस्तत्र राज-
न्नन्ये मृणालान्यखनंस्तत्र विप्राः ।
अथापश्यन् पुष्करं ते ह्रियन्तं
ह्रदादगस्त्येन समुद्धृतं तत् ॥ ८ ॥
राजन्! कुछ ऋषि वहाँ कमल खोदने लगे। कुछ ब्राह्मण मृणाल उखाड़ने लगे। इसी बीचमें अगस्त्यजीने उस पोखरेसे जितना कमल उखाड़कर रखा था, वह सब सहसा गायब हो गया। इस बातको सबने देखा ॥ ८ ॥
तानाह सर्वानृषिमुख्यानगस्त्यः
केनादत्तं पुष्करं मे सुजातम् ।
युष्मान् शंके पुष्करं दीयतां मे
न वै भवन्तो हर्तुमर्हन्ति पद्मम् ॥ ९ ॥
तब अगस्त्यजीने उन समस्त ऋषियोंसे पूछा—‘किसने मेरे सुन्दर कमल ले लिये। मैं आप सब लोगोंपर संदेह करता हूँ। मेरे कमल लौटा दीजिये। आप-जैसे साधु पुरुषोंको कमलोंकी चोरी करना कदापि उचित नहीं है ॥ ९ ॥
शृणोमि कालो हिंसते धर्मवीर्यं
सोऽयं प्राप्तो वर्तते धर्मपीडा ।
पुराधर्मो वर्तते नेह यावत् तावद् गच्छामः सुरलोकं चिराय ।। १० ।। 'सुनता हूँ कि काल धर्मकी शक्तिको नष्ट कर देता है। वही काल इस समय प्राप्त हुआ है। तभी तो धर्मको हानि पहुँचायी जा रही है—अस्तेय-धर्मका हनन हो रहा है। अतः इस जगत्में अधर्मका विस्तार न हो इसके पहले ही हम चिरकालके लिये स्वर्गलोकमें चले जाएँ ।। १० ।।
पुरा वेदान् ब्राह्मणा ग्राममध्ये धुष्टस्वरा वृषलान् श्रावयन्ति । पुरा राजा व्यवहारेण धर्मान् पश्यत्यहं परलोकं व्रजामि ।। ११ ।। 'ब्राह्मणलोग गाँवके बीचमें उच्चस्वरसे वेदपाठ करके शूद्रोंको सुनाने लगें तथा राजा व्यावसायिक दृष्टिसे धर्मको देखने लगें, इसके पहले ही मैं परलोकमें चला जाऊँ ।। ११ ।।
पुरा वरान् प्रत्यवरान् गरीयसो यावन्नरा नावमंस्यन्ति सर्वे । तमोत्तरं यावदिदं न वर्तते तावद् व्रजामि परलोकं चिराय ।। १२ ।। 'जबतक सभी श्रेष्ठ मनुष्य महान् पुरुषोंकी नीचोंके समान अवहेलना नहीं करते हैं तथा जबतक इस संसारमें अज्ञानजनित तमोगुणका बाहुल्य नहीं हो जाता, इसके पहले ही मैं चिरकालके लिये परलोक चला जाऊँ ।। १२ ।।
पुरा प्रपश्यामि परेण मर्त्यान् बलीयसा दुर्बलान् भुज्यमानान् । तस्माद् यास्यामि परलोकं चिराय न ह्युत्सहे द्रष्टुमिह जीवलोकम् ।। १३ ।। 'भविष्यकालमें बलवान् मनुष्य दुर्बलोंको अपने उपभोगमें लायेंगे, इस बातको मैं अभीसे देख रहा हूँ। इसलिये मैं दीर्घकालके लिये परलोकमें चला जाऊँ। यहाँ रहकर इस जीवजगत्की ऐसी दुरवस्था मैं नहीं देख सकता' ।। १३ ।।
तमाहुरार्ता ऋषयो महर्षि न ते वयं पुष्करं चोरयामः । मिथ्याभिशंगो भवता न कार्यः शपाम तीक्ष्णैः शपथैर्महर्षे ।। १४ ।। यह सुनकर सभी महर्षि घबरा उठे और अगस्त्यजीसे बोले—'महर्षे! हमने आपके कमल नहीं चुराये हैं। आपको झूठा कलंक नहीं लगाना चाहिये। हम अपनी सफाई देनेके लिये कठोर-से-कठोर शपथ खा सकते हैं' ।। १४ ।।
ते निश्चितास्तत्र महर्षयस्तु सम्पश्यन्तो धर्ममेतं नरेन्द्राः । ततोऽशपन्त शपथान् पर्ययेण सहैव ते पार्थिव पुत्रपौत्रैः ॥ १५ ॥ पृथ्वीनाथ! तदनन्तर वे महर्षि तथा नरेशगण वहाँ कुछ निश्चय करके इस धर्मपर दृष्टि रखते हुए पुत्रों और पौत्रोंसहित बारी-बारीसे शपथ खाने लगे ॥ १५ ॥
भृगुरुवाच प्रत्याक्रोशेदिहाक्रुष्टस्ताडितः प्रतिताडयेत् । खादेच्च पृष्ठमांसानि यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १६ ॥ भृगु बोले—मुने! जिसने आपके कमलकी चोरी की है, वह गाली सुनकर बदलेमें गाली दे और मार खाकर बदलेमें स्वयं भी मारे तथा दूसरेकी पीठके मांस खाय अर्थात् उपर्युक्त पापोंका भागी हो ॥ १६ ॥
वसिष्ठ उवाच अस्वाध्यायपरो लोके श्वानं च परिकर्षतु । पुरे च भिक्षुर्भवतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १७ ॥ वसिष्ठने कहा—जिसने आपके कमल चुराये हों, वह स्वाध्यायसे विमुख हो जाय। कुत्ता साथ लेकर शिकार खेले और गाँव-गाँव भीख माँगता फिरे ॥ १७ ॥
कश्यप उवाच सर्वत्र सर्वं पणतु न्यासे लोभं करोतु च । कूटसाक्षित्त्वमभ्येतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १८ ॥ कश्यपने कहा—जो आपका कमल चुरा ले गया हो, वह सब जगह सब तरहकी वस्तुओंकी खरीद-बिक्री करे। किसीकी धरोहरको हड़प लेनेका लोभ करे और झूठी गवाही दे, अर्थात् उपर्युक्त पापोंका भागी हो ॥ १८ ॥
गौतम उवाच जीवत्वहंकृतो बुद्ध्या विषमेणासमेन सः । कर्षको मत्सरी चास्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १९ ॥ गौतम बोले—जिसने आपके कमलकी चोरी की हो, वह अहंकारी, बेईमान और अयोग्यका साथ करनेवाला, खेती करनेवाला और ईर्ष्यायुक्त होकर जीवन व्यतीत करे ॥ १९ ॥
अंगिरा उवाच
अशुचिर्ब्रह्मकूतोऽस्तु श्वानं च परिकर्षतु ।
ब्रह्महानिकृतिश्चास्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २० ॥
**अंगिराने कहा—**जो आपका कमल ले गया हो, वह अपवित्र, वेदको मिथ्या बतानेवाला, ब्रह्महत्यारा और अपने पापोंका प्रायश्चित्त न करनेवाला हो। इतना ही नहीं, वह कुत्तोंको साथ लेकर शिकार खेलता फिरे, अर्थात् उपर्युक्त पापोंका भागी हो ॥ २० ॥
धुन्धुमार उवाच
अकृतज्ञस्तु मित्राणां शूद्रायां च प्रजायतु ।
एकः सम्पन्नमश्नातु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २१ ॥
**धुन्धुमारने कहा—**जिसने आपके कमलोंकी चोरी की हो, वह अपने मित्रोंका उपकार न माने। शूद्र जातिकी स्त्रीसे संतान उत्पन्न करे और अकेला ही स्वादिष्ट अन्न भोजन करे। अर्थात् इन पापोंके फलका भागी बने ॥ २१ ॥
पूरुरुवाच
चिकित्सायां प्रचरतु भार्यया चैव पुष्यतु ।
श्वशुरात्तस्य वृत्तिः स्याद् यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २२ ॥
**पूरु बोले—**जों आपका कमल चुरा ले गया हो, वह चिकित्साका व्यवसाय (वैद्य या डॉक्टरका पेशा) करे। स्त्रीकी कमाई खाय और ससुरालके धनपर गुजारा करे ॥ २२ ॥
दिलीप उवाच
उदपानप्लवे ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपतिः ।
तस्य लोकान् स व्रजतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २३ ॥
**दिलीप बोले—**जो आपका कमल चुराकर ले गया हो, वह एक कूँएँपर सबके साथ पानी भरनेवाले गाँवमें रहकर शूद्र जातिकी स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणको मृत्युके पश्चात् जिन दुःखदायी लोकोंमें जाना पड़ता है, उन्हींमें जाय ॥ २३ ॥
शुक्र उवाच
वृथामांसं समश्नातु दिवा गच्छतु मैथुनम् ।
प्रेष्यो भवतु राज्ञश्च यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २४ ॥
**शुक्रने कहा—**जो आपका कमल चुराकर ले गया हो, उसे मांस खानेका, दिनमें मैथुन करनेका और राजाकी नौकरी करनेका पाप लगे ॥ २४ ॥
जमदग्निरुवाच
अनध्यायेष्वधीयीत मित्रं श्राद्धे च भोजयेत् ।
श्राद्धे शूद्रस्य चाश्नीयाद् यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २५ ॥
जमदग्नि बोले— जिसने आपके कमल लिये हों, वह निषिद्ध कालमें अध्ययन करे। मित्रको ही श्राद्धमें जिमावे तथा स्वयं भी शूद्रके श्राद्धमें भोजन करे ॥ २५ ॥
शिबिरुवाच
अनाहिताग्निर्म्रियतां यज्ञे विघ्नं करोतु च । तपस्विभिर्विरुध्येच्च यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २६ ॥ शिबिने कहा— जो आपका कमल चुरा ले गया हो; वह अग्निहोत्र किये बिना ही मर जाय, यज्ञमें विघ्न डाले और तपस्वी जनोंके साथ विरोध करे, अर्थात् इन सब पापोंके फलका भागी हो ॥ २६ ॥
ययातिरुवाच
अनृतौ च व्रती चैव भार्यायां स प्रजायतु । निराकरोतु वेदांश्च यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २७ ॥ ययातिने कहा— जिसने आपके कमलोंकी चोरी की हो, वह व्रतधारी होकर भी ऋतुकालसे अतिरिक्त समयमें स्त्री-समागम करे और वेदोंका खण्डन करे, अर्थात् इन सब पापोंके फलका भागी हो ॥ २७ ॥
नहुष उवाच
अतिथिर्गृहसंस्थोऽस्तु कामवृत्तस्तु दीक्षितः । विद्यां प्रयच्छतु भृतो यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २८ ॥ नहुष बोले— जिसने आपके कमलोंका अपहरण किया हो, वह संन्यासी होकर भी घरमें रहे। यज्ञकी दीक्षा लेकर भी इच्छाचारी हो और वेतन लेकर विद्या पढ़ाये, अर्थात् इन सब पापोंके फलका भागी हो ॥ २८ ॥
अम्बरीष उवाच
नृशंसस्त्यक्तधर्मोऽस्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च । निहन्तु ब्राह्मणं चापि यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २९ ॥ अम्बरीषने कहा— जो आपका कमल ले गया हो, वह क्रूरस्वभावका हो जाय। स्त्रियों, बन्धु-बान्धवों और गौओंके प्रति अपने धर्मका पालन न करे तथा ब्रह्महत्याके पापका भागी हो ॥ २९ ॥
नारद उवाच
गृहज्ञानी बहिःशास्त्रं पठतां विस्वरं पदम् । गरीयसोऽवजानातु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३० ॥
नारदजीने कहा—जिसने आपके कमलोंका अपहरण किया हो, वह देहरूपी घरको ही आत्मा समझे। मर्यादाका उल्लंघन करके शास्त्र पढ़े। स्वरहीन पदका उच्चारण करे और गुरुजनोंका अपमान करता रहे, अर्थात् उपर्युक्त पापोंका भागी बने ॥ ३० ॥
नाभाग उवाच
अनृतं भाषतु सदा सद्भिश्चैव विरुध्यतु ।
शुल्केन तु ददत्कन्यां यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३१ ॥
नाभाग बोले—जिसने आपके कमल चुराये हों, उसे सदा झूठ बोलनेका, संतोंके साथ विरोध करनेका और कीमत लेकर कन्या बेचनेका पाप लगे ॥ ३१ ॥
कविरुवाच
पद्भ्यां स गां ताडयतु सूर्यं च प्रतिमेहतु ।
शरणागतं संत्यजतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३२ ॥
कविने कहा—जिसने आपका कमल लिया हो, उसे गौको लात मारनेका, सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करनेका और शरणागतको त्याग देनेका पाप लगे ॥ ३२ ॥
विश्वामित्र उवाच
करोतु भृतकोऽवर्षां राज्ञश्चास्तु पुरोहितः ।
ऋत्विगस्तु ह्ययाज्यस्य यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३३ ॥
विश्वामित्र बोले—जो आपका कमल चुरा ले गया हो, वह वैश्यका भृत्य होकर उसीके खेतमें वर्षा होनेमें बाधा उपस्थित करे। राजाका पुरोहित हो और यज्ञके अनधिकारीका यज्ञ करानेके लिये ऋत्विक् बने, अर्थात् इन पापोंके फलका भागी हो ॥ ३३ ॥
पर्वत उवाच
ग्रामे चाधिकृतः सोऽस्तु खरयानेन गच्छतु ।
शुनः कर्षतु वृत्त्यर्थे यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३४ ॥
पर्वतने कहा—जो आपका कमल ले गया हो, वह गाँवका मुखिया हो जाय, गधेकी सवारीपर चले तथा पेट भरनेके लिये कुत्तोंको साथ लेकर शिकार खेले ॥
भरद्वाज उवाच
सर्वपापसमादानं नृशंसे चानृते च यत् ।
तत् तस्यास्तु सदा पापं यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३५ ॥
भरद्वाजने कहा—जिसने आपके कमलोंकी चोरी की हो, उस पापीको निर्दयी और असत्यवादी मनुष्योंमें रहनेवाला सारा-का-सारा पाप सदा ही प्राप्त होता रहे ॥ ३५ ॥
अष्टक उवाच
स राजास्त्वकृतप्रज्ञः कामवृत्तश्च पापकृत् । अधर्मेणाभिशास्तूर्वीं यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३६ ॥ अष्टक बोले— जो आपका कमल ले गया हो, वह राजा मन्दबुद्धि, स्वेच्छाचारी और पापात्मा होकर अधर्मपूर्वक इस पृथ्वीका शासन करे ॥ ३६ ॥
गालव उवाच
पापिष्ठेभ्यो ह्यनर्हार्हः स नरोऽस्तु स्वपापकृत् । दत्त्वा दानं कीर्तयतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३७ ॥ गालव बोले— जो आपका कमल चुरा ले गया हो, वह महापापियोंसे भी बढ़कर अनादरणीय हो, स्वजनोंका भी अपकार करे तथा दान देकर अपने ही मुखसे उसका बखान करे ॥ ३७ ॥
अरुन्धत्युवाच
श्वश्रूवापवादं मदतु भर्तुर्भवतु दुर्मनाः । एका स्वादु समश्नातु या ते हरति पुष्करम् ॥ ३८ ॥ अरुन्धती बोलीं— जिस स्त्रीने आपका कमल लिया हो, वह अपने सासकी निन्दा करे, पतिके लिये अपने मनमें दुर्भावना रखे और अकेली ही स्वादिष्ट भोजन किया करे, अर्थात् इन सब पापोंकी फलभागिनी बने ॥ ३८ ॥
वालखिल्या ऊचुः
एकपादेन वृत्त्यर्थं ग्रामद्वारे स तिष्ठतु । धर्मज्ञस्त्यक्तधर्मास्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३९ ॥ बालखिल्य बोले— जो आपका कमल ले गया हो, वह अपनी जीविकाके लिये गाँवके दरवाजेपर एक पैरसे खड़ा रहे और धर्मको जानते हुए भी उसका परित्याग करे ॥ ३९ ॥
शुनःसख उवाच
अग्निहोत्रमनादृत्य स सुखं स्वपतु द्विजः । परिव्राट् कामवृत्तोऽस्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ४० ॥ शुनःसख बोले— जो आपका कमल ले गया हो, वह द्विज होकर भी सबेरे और शामको अग्निहोत्रकी अवहेलना करके सुखसे सोये तथा संन्यासी होकर भी मनमाना बर्ताव करे, अर्थात् उपर्युक्त पापोंके फलका भागी हो ॥ ४० ॥
सुरभ्युवाच
बालजेन निदानेन कांस्यं भवतु दोहनम् । दुह्येत परवत्सेन या ते हरति पुष्करम् ॥ ४१ ॥
सुरभि बोली—जो गाय आपका कमल ले गयी हो, उसके पैर बालोंकी रस्सीसे बाँधे जायँ, उसके दूधके लिये ताँबे मिले हुए धातुका दोहनपात्र हो और वह दूसरे गायके बछड़ेसे दुही जाय ॥ ४१ ॥
भीष्म उवाच
ततस्तु तैः शपथैः शप्यमानै- र्नानाविधैर्बहुभिः कौरवेन्द्र । सहस्राक्षो देवराट् सम्प्रहृष्टः समीक्ष्य तं कोपनं विप्रमुख्यम् ॥ ४२ ॥
भीष्मजी कहते हैं—कौरवेन्द्र! इस प्रकार जब सब लोग नाना प्रकारकी अनेकानेक शपथ कर चुके, तब सहस्र नेत्रधारी देवराज इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए और उन विप्रवर अगस्त्यको कुपित हुआ देख उनके सामने प्रकट हो गये ॥ ४२ ॥
अथाब्रवीन्मघवा प्रत्ययं स्वं समाभाष्य तमृषिं जातरोषम् । ब्रह्मर्षिदेवर्षिनृपर्षिमध्ये यं तं निबोधेह ममाद्य राजन् ॥ ४३ ॥
राजन्! ब्रह्मर्षियों, देवर्षियों तथा राजर्षियोंके बीचमें कुपित हुए महर्षि अगस्त्यको सम्बोधित करके देवराज इन्द्रने जो अपना अभिप्राय व्यक्त किया, उसे आज तुम मेरे मुखसे यहाँ सुनो ॥ ४३ ॥
शक्र उवाच
अध्वर्यवे दुहितरं ददातु छन्दोगे वा चरितब्रह्मचर्ये । अथर्वणं वेदमधीत्य विप्रः स्नायीत यः पुष्करमाददाति ॥ ४४ ॥
इन्द्र बोले—ब्रह्मन्! जो आपका कमल ले गया हो, वह ब्रह्मचर्य व्रतको पूर्ण करके आये हुए यजुर्वेदी अथवा सामवेदी विद्वान्को कन्यादान दे। अथवा वह ब्राह्मण अथर्ववेदका अध्ययन पूरा करके शीघ्र ही स्नातक बन जाय ॥ ४४ ॥
सर्वान् वेदानधीयीत पुण्यशीलोऽस्तु धार्मिकः । ब्रह्मणः सदनं यातु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ४५ ॥
जिसने आपके कमलोंका अपहरण किया हो, वह सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करे। पुण्यात्मा और धार्मिक हो, तथा मृत्युके पश्चात् वह ब्रह्माजीके लोकमें जाय ॥
अगस्त्य उवाच
आशीर्वादस्त्वया प्रोक्तः शपथो बलसूदन ।
दीयतां पुष्करं मह्यमेष धर्मः सनातनः ॥ ४६ ॥
अगस्त्यने कहा— बलसूदन! आपने जो शपथ की है, वह तो आशीर्वादस्वरूप है। अतः आपने ही मेरे कमल लिये हैं, कृपया उन्हें मुझे दे दीजिये। यही सनातन धर्म है ॥ ४६ ॥
इन्द्र उवाच
न मया भगवँल्लोभाद्धृतं पुष्करमद्य वै ।
धर्मांस्तु श्रोतुकामेन हृतं न क्रोद्धुमर्हसि ॥ ४७ ॥
इन्द्र बोले— भगवन्! मैंने लोभवश कमलोंको नहीं लिया था। आपलोगोंके मुखसे धर्मकी बातें सुनना चाहता था, इसीलिये इन कमलोंका अपहरण कर लिया था। अतः मुझपर क्रोध न कीजियेगा ॥ ४७ ॥
धर्मश्रुतिसमुत्कर्षो धर्मसेतुरनामयः ।
आर्षो वै शाश्वतो नित्यमव्ययोऽयं मया श्रुतः ॥ ४८ ॥
आज मैंने आपलोगोंके मुखसे उस आर्ष सनातन धर्मका श्रवण किया है जो नित्य अविकारी, अनामय और संसार-सागरसे पार उतारनेके लिये पुलके समान है। इससे धार्मिक श्रुतियोंका उत्कर्ष सिद्ध होता है ॥ ४८ ॥ तदिदं गृह्यतां विद्वन् पुष्करं द्विजसत्तम । अतिक्रमं मे भगवन् क्षन्तुमर्हस्यनिन्दित ॥ ४९ ॥ द्विजश्रेष्ठ! विद्वन्! अब आप अपने ये कमल लीजिये। भगवन्! अनिन्दनीय महर्षे! मेरा अपराध क्षमा कीजिये ॥ ४९ ॥ इत्युक्तः स महेन्द्रेण तपस्वी कोपनो भृशम् । जग्राह पुष्करं धीमान् प्रसन्नश्चाभवन्मुनिः ॥ ५० ॥ महेन्द्रके ऐसा कहनेपर वे क्रोधी तपस्वी बुद्धिमान् अगस्त्य मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने इन्द्रके हाथसे अपने कमल ले लिये ॥ ५० ॥ प्रययुस्ते ततो भूयस्तीर्थानि वनगोचराः । पुण्येषु तीर्थेषु तथा गात्राण्याप्लावयन्त ते ॥ ५१ ॥ तदनन्तर उन सब लोगोंने वनके मार्गोंसे होते हुए पुनः तीर्थयात्रा आरम्भ की और पुण्यतीर्थोंमें जा-जाकर गोते लगाकर स्नान किया ॥ ५१ ॥ आख्यानं य इदं युक्तः पठेत् पर्वणि पर्वणि । न मूर्ख जनयेत् पुत्रं न भवेच्च निराकृतिः ॥ ५२ ॥ जो प्रत्येक पर्वके अवसरपर एकाग्रचित्त हो इस पवित्र आख्यानका पाठ करता है, वह कभी मूर्ख पुत्रको नहीं जन्म देता है, तथा स्वयं भी किसी अंगसे हीन या असफलमनोरथ नहीं होता है ॥ ५२ ॥ न तमापत् स्पृशेत् काचिद् विज्वरो नजरावहः । विरजाः श्रेयसा युक्तः प्रेत्य स्वर्गमवाप्नुयात् ॥ ५३ ॥ उसके ऊपर कोई आपत्ति नहीं आती। वह चिन्तारहित होता है। उसके ऊपर जरावस्थाका आक्रमण नहीं होता। वह रागशून्य होकर कल्याणका भागी होता है तथा मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ५३ ॥ यश्च शास्त्रमधीयीत ऋषिभिः परिपालितम् । स गच्छेद् ब्रह्मणो लोकमव्ययं च नरोत्तम ॥ ५४ ॥ नरश्रेष्ठ! जो ऋषियोंद्वारा सुरक्षित इस शास्त्रका अध्ययन करता है, वह अविनाशी ब्रह्मधामको प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शपथविधिर्नाम चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शपथविधिनामक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 827)
पञ्चनवतितमोऽध्यायः
छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप
युधिष्ठिर उवाच
यदिदं श्राद्धकृत्येषु दीयते भरतर्षभ ।
छत्रं चोपानहौ चैव केनैतत् सम्प्रवर्तितम् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भरतश्रेष्ठ! श्राद्धकर्मोंमें जिनका दान दिया जाता है, उन छत्र और उपानहोंके दानकी प्रथा किसने चलायी है? ॥ १ ॥
कथं चैतत् समुत्पन्नं किमर्थं चैव दीयते ।
न केवलं श्राद्धकृत्ये पुण्यकेष्वपि दीयते ॥ २ ॥
इनकी उत्पत्ति कैसे हुई और किसलिये इनका दान किया जाता है? केवल श्राद्धकर्ममें ही नहीं, अनेक पुण्यके अवसरोंपर भी इनका दान होता है ॥ २ ॥
बहुष्वपि निमित्तेषु पुण्यमाश्रित्य दीयते ।
एतद् विस्तरशो राजन् श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ३ ॥
बहुत-से निमित्त उपस्थित होनेपर पुण्यके उद्देश्यसे इन वस्तुओंके दानकी प्रथा देखी जाती है। अतः राजन्! मैं इस विषयको विस्तारके साथ यथावत् रूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
शृणु राजन्नवहितश्छत्रोपानहविस्तरम् ।
यथैतत् प्रथितं लोके यथा चैतत् प्रवर्तितम् ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! छाते और जूतेकी उत्पत्तिकी वार्ता मैं विस्तारके साथ बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो। संसारमें किस प्रकार इनके दानका आरम्भ हुआ और कैसे उस दानका प्रचार हुआ, यह सब श्रवण करो ॥ ४ ॥
यथा चाक्षय्यतां प्राप्तं पुण्यतां च यथा गतम् ।
सर्वमेतदशेषेण प्रवक्ष्यामि नराधिप ॥ ५ ॥
नरेश्वर! इन दोनों वस्तुओंका दान किस तरह अक्षय होता है, तथा ये किस प्रकार पुण्यकी प्राप्ति करानेवाली मानी गयी हैं। इन सब बातोंका मैं पूर्णरूपसे वर्णन
करूँगा॥ ५ ॥ जमदग्नेश्च संवादं सूर्यस्य च महात्मनः। पुरा स भगवान् साक्षाद्धनुषाक्रीडयत् प्रभो॥ ६ ॥ संधाय संधाय शरांश्चिक्षेप किल भार्गवः। तान् क्षिप्तान् रेणुका सर्वांस्तस्येषून्दीप्ततेजसः॥ ७ ॥ आनीय सा तदा तस्मै प्रादादसकृदच्युत। प्रभो! इस विषयमें महर्षि जमदग्नि और महात्मा भगवान् सूर्यके संवादका वर्णन किया जाता है। पूर्वकालकी बात है, एक दिन भृगुनन्दन भगवान् जमदग्निजी धनुष चलानेकी क्रीड़ा कर रहे थे। धर्मसे च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! वे बारंबार धनुषपर बाण रखकर उन्हें चलाते और उन चलाये हुए सम्पूर्ण तेजस्वी बाणोंको उनकी पत्नी रेणुका ला-लाकर दिया करती थीं॥ ६-७ १/२ ॥
अथ तेन स शब्देन ज्यायाश्चैव शरस्य च॥ ८ ॥ प्रहृष्टः सम्प्रचिक्षेप सा च प्रत्याजहार तान्। धनुषकी प्रत्यंचाकी टंकारध्वनि और बाणके छूटनेकी सनसनाहटसे जमदग्नि मुनि बहुत प्रसन्न होते थे। अतः वे बार-बार बाण चलाते और रेणुका उन्हें दूरसे उठा-उठाकर लाया करती थीं॥ ८ १/२ ॥
ततो मध्याह्नमारूढे ज्येष्ठामूले दिवाकरे॥ ९ ॥ स सायकान् द्विजो मुक्त्वा रेणुकामिदमब्रवीत्। गच्छानय विशालाक्षि शरानेतान् धनुश्च्युतान्॥ १० ॥ यावदेतान् पुनः सुभ्रु क्षिपामीति जनाधिप। जनेश्वर! इस प्रकार बाण चलानेकी क्रीड़ा करते-करते ज्येष्ठ मासके सूर्य दिनके मध्यभागमें आ पहुँचे। विप्रवर जमदग्निने पुनः बाण छोड़कर रेणुकासे कहा—'सुभ्रु! विशाललोचने! जाओ, मेरे धनुषसे छूटे हुए इन बाणोंको ले आओ, जिससे मैं पुनः इन सबको धनुषपर रखकर छोड़ूँ'॥ ९-१० १/२ ॥
सा गच्छन्त्यन्तरा छायां वृक्षमाश्रित्य भामिनी॥ ११ ॥ तस्थौ तस्या हि सन्तप्तं शिरः पादौ तथैव च। मानिनी रेणुका वृक्षोंके बीचसे होकर उनकी छायाका आश्रय ले जाती हुई बीच-बीचमें ठहर जाती थी; क्योंकि उसके सिर और पैर तप गये थे॥ ११ १/२ ॥
स्थिता सा तु मुहूर्तं वै भर्तुः शापभयाच्छुभा॥ १२ ॥ ययावानयितुं भूयः सायकानसितेक्षणा। कजरारे नेत्रोंवाली वह कल्याणमयी देवी एक जगह दो ही घड़ी ठहरकर पतिके शापके भयसे पुनः उन बाणोंको लानेके लिये चल दी॥ १२ १/२ ॥
प्रत्याजगाम च शरांस्तानादाय यशस्विनी ॥ १३ ॥
सा वै खिन्ना सुचार्वङ्गी पद्भ्यां दुःखं नियच्छती ।
उपाजगाम भर्तारं भयाद् भर्तुः प्रवेपती ॥ १४ ॥
उन बाणोंको लेकर सुन्दर अंगोंवाली यशस्विनी रेणुका जब लौटी; उस समय वह बहुत खिन्न हो गयी थी। पैरोंके जलनेसे जो दुःख होता था, उसको किसी तरह सहती और पतिके भयसे थर-थर काँपती हुई उनके पास आयी ॥ १३-१४ ॥
स तामृषिस्तदा क्रुद्धो वाक्यमाह शुभाननाम् ।
रेणुके किं चिरेण त्वमागतेति पुनः पुनः ॥ १५ ॥
उस समय महर्षि कुपित होकर सुन्दर मुखवाली अपनी पत्नीसे बारंबार पूछने लगे—‘रेणुके! तुम्हारे आनेमें इतनी देर क्यों हुई?’ ॥ १५ ॥
रेणुकोवाच
शिरस्तावत् प्रदीप्तं मे पादौ चैव तपोधन ।
सूर्यतेजोनिरुद्धाहं वृक्षच्छायां समाश्रिता ॥ १६ ॥
रेणुका बोली—तपोधन! मेरा सिर तप गया, दोनों पैर जलने लगे और सूर्यके प्रचण्ड तेजने मुझे आगे बढ़नेसे रोक दिया। इसलिये थोड़ी देरतक वृक्षकी छायामें खड़ी होकर विश्राम लेने लगी थी ॥ १६ ॥
एतस्मात् कारणाद् ब्रह्मंश्चिरयैतत् कृतं मया ।
एतच्छ्रुत्वा मम विभो मा क्रुधस्त्वं तपोधन ॥ १७ ॥
ब्रह्मन्! इसी कारणसे मैंने आपका यह कार्य कुछ विलम्बसे पूरा किया है। तपोधन! प्रभो! मेरे इस बातपर ध्यान देकर आप क्रोध न करें ॥ १७ ॥
जमदग्निरुवाच
अद्यैनं दीप्तकिरणं रेणुके तव दुःखदम् ।
शरैर्निपातयिष्यामि सूर्यमस्त्राग्नितेजसा ॥ १८ ॥
जमदग्निने कहा—रेणुके! जिसने तुझे कष्ट पहुँचाया है, उस उद्दीप्त किरणोंवाले सूर्यको आज मैं अपने बाणोंसे, अपनी अस्त्राग्निके तेजसे गिरा दूँगा ॥ १८ ॥
भीष्म उवाच
स विस्फार्य धनुर्दिव्यं गृहीत्वा च शरान् बहून् ।
अतिष्ठत् सूर्यमभितो या तो याति ततो मुखः ॥ १९ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ऐसा कहकर महर्षि जमदग्निने अपने दिव्य धनुषकी प्रत्यंचा खींची और बहुत-से बाण हाथमें लेकर सूर्यकी ओर मुँह करके वे खड़े हो गये। जिस दिशाकी ओर सूर्य जा रहे थे, उसी ओर उन्होंने भी अपना मुँह कर लिया था ॥
अथ तं प्रेक्ष्य सन्नद्धं सूर्योऽभ्येत्य तथाब्रवीत् ।
द्विजरूपेण कौन्तेय किं ते सूर्योऽपराध्यते ॥ २० ॥
कुन्तीनन्दन! उन्हें युद्धके लिये तैयार देख सूर्यदेव ब्राह्मणका रूप धारण करके उनके पास आये और बोले—'ब्रह्मन्! सूर्यने आपका क्या अपराध किया है? ॥
आदत्ते रश्मिभिः सूर्यो दिवि तिष्ठंस्ततस्ततः ।
रसं हृतं वै वर्षासु प्रवर्षति दिवाकरः ॥ २१ ॥
'सूर्यदेव तो आकाशमें स्थित होकर अपनी किरणों-द्वारा वसुधाका रस खींचते हैं और बरसातमें पुनः उसे बरसा देते हैं ॥ २१ ॥
ततोऽन्नं जायते विप्र मनुष्याणां सुखावहम् ।
अन्नं प्राणा इति यथा वेदेषु परिपठ्यते ॥ २२ ॥
'विप्रवर! उसी वर्षासे अन्न उत्पन्न होता है, जो मनुष्योंके लिये सुखदायक है। अन्न ही प्राण है, यह बात वेदमें भी बतायी गयी है ॥ २२ ॥
अथाभ्रेषु निगूढश्च रश्मिभिः परिवारितः ।
सप्तद्वीपानिमान् ब्रह्मन् वर्षेणाभिप्रवर्षति ॥ २३ ॥
'ब्रह्मन्! अपने किरणसमूहसे घिरे हुए भगवान् सूर्य बादलोंमें छिपकर सातों द्वीपोंकी पृथ्वीको वर्षाके जलसे आप्लावित करते हैं ॥ २३ ॥
ततस्तदौषधीनां च वीरुधां पुष्पपत्रजम् ।
सर्वं वर्षाभिनिर्वृत्तमन्नं सम्भवति प्रभो ॥ २४ ॥
'उसीसे नाना प्रकारकी ओषधियाँ, लताएँ, पत्र-पुष्प, घास-पात आदि उत्पन्न होते हैं। प्रभो! प्रायः सभी प्रकारके अन्न वर्षाके जलसे उत्पन्न होते हैं ॥ २४ ॥
जातकर्माणि सर्वाणि व्रतोपनयनानि च ।
गोदानानि विवाहाश्च तथा यज्ञसमृद्धयः ॥ २५ ॥
शास्त्राणि दानानि तथा संयोगा वित्तसंचयाः ।
अन्नतः सम्प्रवर्तन्ते तथा त्वं वेत्थ भार्गव ॥ २६ ॥
'जातकर्म, व्रत, उपनयन, विवाह, गोदान, यज्ञ सम्पत्ति, शास्त्रीय दान, संयोग और धनसंग्रह आदि सारे कार्य अन्नसे ही सम्पादित होते हैं। भृगुनन्दन! इस बातको आप भी अच्छी तरह जानते हैं ॥ २५-२६ ॥
रमणीयानि यावन्ति यावदारम्भकाणि च ।
सर्वमन्नात् प्रभवति विदितं कीर्तयामि ते ॥ २७ ॥
'जितने सुन्दर पदार्थ हैं, अथवा जो भी उत्पादक पदार्थ हैं, वे सब अन्नसे ही प्रकट होते हैं। यह सब मैं ऐसी बात बता रहा हूँ जो आपको पहलेसे ही विदित हैं ॥ २७ ॥
सर्वं हि वेत्थ विप्र त्वं यदेतत् कीर्तितं मया ।
प्रसादये त्वां विप्रर्षे किं ते सूर्य निपात्य वै ॥ २८ ॥
'विप्रवर! ब्रह्मर्षे! मैंने जो कुछ भी कहा है, वह सब आप भी जानते हैं। भला, सूर्यको गिरानेसे आपको क्या लाभ होगा? अतः मैं प्रार्थनापूर्वक आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ (कृपया सूर्यको नष्ट करनेका संकल्प छोड़ दीजिये)' ।। २८ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि छत्रोपानहोत्पत्तिर्नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः ।। ९५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें छत्र और उपानहकी उत्पत्तिनामक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९५ ।।