महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुराधर्मो वर्तते नेह यावत् तावद् गच्छामः सुरलोकं चिराय ।। १० ।। 'सुनता हूँ कि काल धर्मकी शक्तिको नष्ट कर देता है। वही काल इस समय प्राप्त हुआ है। तभी तो धर्मको हानि पहुँचायी जा रही है—अस्तेय-धर्मका हनन हो रहा है। अतः इस जगत्में अधर्मका विस्तार न हो इसके पहले ही हम चिरकालके लिये स्वर्गलोकमें चले जाएँ ।। १० ।।
पुरा वेदान् ब्राह्मणा ग्राममध्ये धुष्टस्वरा वृषलान् श्रावयन्ति । पुरा राजा व्यवहारेण धर्मान् पश्यत्यहं परलोकं व्रजामि ।। ११ ।। 'ब्राह्मणलोग गाँवके बीचमें उच्चस्वरसे वेदपाठ करके शूद्रोंको सुनाने लगें तथा राजा व्यावसायिक दृष्टिसे धर्मको देखने लगें, इसके पहले ही मैं परलोकमें चला जाऊँ ।। ११ ।।
पुरा वरान् प्रत्यवरान् गरीयसो यावन्नरा नावमंस्यन्ति सर्वे । तमोत्तरं यावदिदं न वर्तते तावद् व्रजामि परलोकं चिराय ।। १२ ।। 'जबतक सभी श्रेष्ठ मनुष्य महान् पुरुषोंकी नीचोंके समान अवहेलना नहीं करते हैं तथा जबतक इस संसारमें अज्ञानजनित तमोगुणका बाहुल्य नहीं हो जाता, इसके पहले ही मैं चिरकालके लिये परलोक चला जाऊँ ।। १२ ।।
पुरा प्रपश्यामि परेण मर्त्यान् बलीयसा दुर्बलान् भुज्यमानान् । तस्माद् यास्यामि परलोकं चिराय न ह्युत्सहे द्रष्टुमिह जीवलोकम् ।। १३ ।। 'भविष्यकालमें बलवान् मनुष्य दुर्बलोंको अपने उपभोगमें लायेंगे, इस बातको मैं अभीसे देख रहा हूँ। इसलिये मैं दीर्घकालके लिये परलोकमें चला जाऊँ। यहाँ रहकर इस जीवजगत्की ऐसी दुरवस्था मैं नहीं देख सकता' ।। १३ ।।
तमाहुरार्ता ऋषयो महर्षि न ते वयं पुष्करं चोरयामः । मिथ्याभिशंगो भवता न कार्यः शपाम तीक्ष्णैः शपथैर्महर्षे ।। १४ ।। यह सुनकर सभी महर्षि घबरा उठे और अगस्त्यजीसे बोले—'महर्षे! हमने आपके कमल नहीं चुराये हैं। आपको झूठा कलंक नहीं लगाना चाहिये। हम अपनी सफाई देनेके लिये कठोर-से-कठोर शपथ खा सकते हैं' ।। १४ ।।