महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 818, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंते निश्चितास्तत्र महर्षयस्तु सम्पश्यन्तो धर्ममेतं नरेन्द्राः । ततोऽशपन्त शपथान् पर्ययेण सहैव ते पार्थिव पुत्रपौत्रैः ॥ १५ ॥ पृथ्वीनाथ! तदनन्तर वे महर्षि तथा नरेशगण वहाँ कुछ निश्चय करके इस धर्मपर दृष्टि रखते हुए पुत्रों और पौत्रोंसहित बारी-बारीसे शपथ खाने लगे ॥ १५ ॥
भृगुरुवाच प्रत्याक्रोशेदिहाक्रुष्टस्ताडितः प्रतिताडयेत् । खादेच्च पृष्ठमांसानि यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १६ ॥ भृगु बोले—मुने! जिसने आपके कमलकी चोरी की है, वह गाली सुनकर बदलेमें गाली दे और मार खाकर बदलेमें स्वयं भी मारे तथा दूसरेकी पीठके मांस खाय अर्थात् उपर्युक्त पापोंका भागी हो ॥ १६ ॥
वसिष्ठ उवाच अस्वाध्यायपरो लोके श्वानं च परिकर्षतु । पुरे च भिक्षुर्भवतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १७ ॥ वसिष्ठने कहा—जिसने आपके कमल चुराये हों, वह स्वाध्यायसे विमुख हो जाय। कुत्ता साथ लेकर शिकार खेले और गाँव-गाँव भीख माँगता फिरे ॥ १७ ॥
कश्यप उवाच सर्वत्र सर्वं पणतु न्यासे लोभं करोतु च । कूटसाक्षित्त्वमभ्येतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १८ ॥ कश्यपने कहा—जो आपका कमल चुरा ले गया हो, वह सब जगह सब तरहकी वस्तुओंकी खरीद-बिक्री करे। किसीकी धरोहरको हड़प लेनेका लोभ करे और झूठी गवाही दे, अर्थात् उपर्युक्त पापोंका भागी हो ॥ १८ ॥
गौतम उवाच जीवत्वहंकृतो बुद्ध्या विषमेणासमेन सः । कर्षको मत्सरी चास्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १९ ॥ गौतम बोले—जिसने आपके कमलकी चोरी की हो, वह अहंकारी, बेईमान और अयोग्यका साथ करनेवाला, खेती करनेवाला और ईर्ष्यायुक्त होकर जीवन व्यतीत करे ॥ १९ ॥
अंगिरा उवाच