महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 819, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअशुचिर्ब्रह्मकूतोऽस्तु श्वानं च परिकर्षतु ।
ब्रह्महानिकृतिश्चास्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २० ॥
**अंगिराने कहा—**जो आपका कमल ले गया हो, वह अपवित्र, वेदको मिथ्या बतानेवाला, ब्रह्महत्यारा और अपने पापोंका प्रायश्चित्त न करनेवाला हो। इतना ही नहीं, वह कुत्तोंको साथ लेकर शिकार खेलता फिरे, अर्थात् उपर्युक्त पापोंका भागी हो ॥ २० ॥
धुन्धुमार उवाच
अकृतज्ञस्तु मित्राणां शूद्रायां च प्रजायतु ।
एकः सम्पन्नमश्नातु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २१ ॥
**धुन्धुमारने कहा—**जिसने आपके कमलोंकी चोरी की हो, वह अपने मित्रोंका उपकार न माने। शूद्र जातिकी स्त्रीसे संतान उत्पन्न करे और अकेला ही स्वादिष्ट अन्न भोजन करे। अर्थात् इन पापोंके फलका भागी बने ॥ २१ ॥
पूरुरुवाच
चिकित्सायां प्रचरतु भार्यया चैव पुष्यतु ।
श्वशुरात्तस्य वृत्तिः स्याद् यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २२ ॥
**पूरु बोले—**जों आपका कमल चुरा ले गया हो, वह चिकित्साका व्यवसाय (वैद्य या डॉक्टरका पेशा) करे। स्त्रीकी कमाई खाय और ससुरालके धनपर गुजारा करे ॥ २२ ॥
दिलीप उवाच
उदपानप्लवे ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपतिः ।
तस्य लोकान् स व्रजतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २३ ॥
**दिलीप बोले—**जो आपका कमल चुराकर ले गया हो, वह एक कूँएँपर सबके साथ पानी भरनेवाले गाँवमें रहकर शूद्र जातिकी स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणको मृत्युके पश्चात् जिन दुःखदायी लोकोंमें जाना पड़ता है, उन्हींमें जाय ॥ २३ ॥
शुक्र उवाच
वृथामांसं समश्नातु दिवा गच्छतु मैथुनम् ।
प्रेष्यो भवतु राज्ञश्च यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २४ ॥
**शुक्रने कहा—**जो आपका कमल चुराकर ले गया हो, उसे मांस खानेका, दिनमें मैथुन करनेका और राजाकी नौकरी करनेका पाप लगे ॥ २४ ॥
जमदग्निरुवाच
अनध्यायेष्वधीयीत मित्रं श्राद्धे च भोजयेत् ।
श्राद्धे शूद्रस्य चाश्नीयाद् यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २५ ॥