महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 820, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजमदग्नि बोले— जिसने आपके कमल लिये हों, वह निषिद्ध कालमें अध्ययन करे। मित्रको ही श्राद्धमें जिमावे तथा स्वयं भी शूद्रके श्राद्धमें भोजन करे ॥ २५ ॥
शिबिरुवाच
अनाहिताग्निर्म्रियतां यज्ञे विघ्नं करोतु च । तपस्विभिर्विरुध्येच्च यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २६ ॥ शिबिने कहा— जो आपका कमल चुरा ले गया हो; वह अग्निहोत्र किये बिना ही मर जाय, यज्ञमें विघ्न डाले और तपस्वी जनोंके साथ विरोध करे, अर्थात् इन सब पापोंके फलका भागी हो ॥ २६ ॥
ययातिरुवाच
अनृतौ च व्रती चैव भार्यायां स प्रजायतु । निराकरोतु वेदांश्च यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २७ ॥ ययातिने कहा— जिसने आपके कमलोंकी चोरी की हो, वह व्रतधारी होकर भी ऋतुकालसे अतिरिक्त समयमें स्त्री-समागम करे और वेदोंका खण्डन करे, अर्थात् इन सब पापोंके फलका भागी हो ॥ २७ ॥
नहुष उवाच
अतिथिर्गृहसंस्थोऽस्तु कामवृत्तस्तु दीक्षितः । विद्यां प्रयच्छतु भृतो यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २८ ॥ नहुष बोले— जिसने आपके कमलोंका अपहरण किया हो, वह संन्यासी होकर भी घरमें रहे। यज्ञकी दीक्षा लेकर भी इच्छाचारी हो और वेतन लेकर विद्या पढ़ाये, अर्थात् इन सब पापोंके फलका भागी हो ॥ २८ ॥
अम्बरीष उवाच
नृशंसस्त्यक्तधर्मोऽस्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च । निहन्तु ब्राह्मणं चापि यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २९ ॥ अम्बरीषने कहा— जो आपका कमल ले गया हो, वह क्रूरस्वभावका हो जाय। स्त्रियों, बन्धु-बान्धवों और गौओंके प्रति अपने धर्मका पालन न करे तथा ब्रह्महत्याके पापका भागी हो ॥ २९ ॥
नारद उवाच
गृहज्ञानी बहिःशास्त्रं पठतां विस्वरं पदम् । गरीयसोऽवजानातु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३० ॥