महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 822, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंस राजास्त्वकृतप्रज्ञः कामवृत्तश्च पापकृत् । अधर्मेणाभिशास्तूर्वीं यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३६ ॥ अष्टक बोले— जो आपका कमल ले गया हो, वह राजा मन्दबुद्धि, स्वेच्छाचारी और पापात्मा होकर अधर्मपूर्वक इस पृथ्वीका शासन करे ॥ ३६ ॥
गालव उवाच
पापिष्ठेभ्यो ह्यनर्हार्हः स नरोऽस्तु स्वपापकृत् । दत्त्वा दानं कीर्तयतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३७ ॥ गालव बोले— जो आपका कमल चुरा ले गया हो, वह महापापियोंसे भी बढ़कर अनादरणीय हो, स्वजनोंका भी अपकार करे तथा दान देकर अपने ही मुखसे उसका बखान करे ॥ ३७ ॥
अरुन्धत्युवाच
श्वश्रूवापवादं मदतु भर्तुर्भवतु दुर्मनाः । एका स्वादु समश्नातु या ते हरति पुष्करम् ॥ ३८ ॥ अरुन्धती बोलीं— जिस स्त्रीने आपका कमल लिया हो, वह अपने सासकी निन्दा करे, पतिके लिये अपने मनमें दुर्भावना रखे और अकेली ही स्वादिष्ट भोजन किया करे, अर्थात् इन सब पापोंकी फलभागिनी बने ॥ ३८ ॥
वालखिल्या ऊचुः
एकपादेन वृत्त्यर्थं ग्रामद्वारे स तिष्ठतु । धर्मज्ञस्त्यक्तधर्मास्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३९ ॥ बालखिल्य बोले— जो आपका कमल ले गया हो, वह अपनी जीविकाके लिये गाँवके दरवाजेपर एक पैरसे खड़ा रहे और धर्मको जानते हुए भी उसका परित्याग करे ॥ ३९ ॥
शुनःसख उवाच
अग्निहोत्रमनादृत्य स सुखं स्वपतु द्विजः । परिव्राट् कामवृत्तोऽस्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ४० ॥ शुनःसख बोले— जो आपका कमल ले गया हो, वह द्विज होकर भी सबेरे और शामको अग्निहोत्रकी अवहेलना करके सुखसे सोये तथा संन्यासी होकर भी मनमाना बर्ताव करे, अर्थात् उपर्युक्त पापोंके फलका भागी हो ॥ ४० ॥
सुरभ्युवाच
बालजेन निदानेन कांस्यं भवतु दोहनम् । दुह्येत परवत्सेन या ते हरति पुष्करम् ॥ ४१ ॥