महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 839, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिसका कपड़ा मलसे दूषित हो गया है ऐसे पुरुषके लिये द्विगुण शौचका विधान है। उसे दोनों पैरों, दोनों जाँघों और दोनों हाथोंकी विशेष शुद्धि अवश्य करनी चाहिये ।। अवधीयमानस्य संदेह उपजायते । यथा यथा विशुद्ध्येत तत् तथा तदुपक्रमेत् ।। शौचका पालन न करनेसे शरीर-शुद्धिके विषयमें संदेह बना रहता है। अतः जिस-जिस प्रकारसे शरीर-शुद्धि हो वैसे-ही-वैसे कार्य करनेकी चेष्टा करे ।। क्षारौशराभ्यां वस्त्रस्य कुर्याच्छौचं मृदा सह ।। लेपगन्धापनयनममेध्यस्य विधीयते । मिट्टीके साथ क्षार और रेह मिलाकर उसके द्वारा वस्त्रकी शुद्धि करनी चाहिये। जिसमें कोई अपवित्र वस्तु लग गयी हो उस वस्त्रसे उस वस्तुका लेप मिट जाय और उसकी दुर्गन्ध दूर हो जाय, ऐसी शुद्धिका सम्पादन आवश्यक होता है ।। देयाश्चतस्रस्तिस्रो वा द्वे वाप्येकां तथाऽऽपदि ।। कालमासाद्य देशं च शौचस्य गुरुलाघवम् । आपत्तिकालमें चार, तीन, दो अथवा एक बार मृत्तिका लगानी चाहिये। देश और कालके अनुसार शौचाचारमें गौरव अथवा लाघव किया जा सकता है ।। विधिनानेन शौचं तु नित्यं कुर्यादतन्द्रितः ।। अविप्रेक्षन्नसम्भ्रान्तः पादौ प्रक्षाल्य तत्परः । इस विधिसे प्रतिदिन आलस्यका परित्याग करके शौच (शुद्धि) का सम्पादन करे तथा शुद्धिका सम्पादन करनेवाला पुरुष दोनों पैरोंको धोकर इधर-उधर दृष्टि न डालता हुआ बिना किसी घबराहटके चला जाय ।। सुप्रक्षालितपादस्तु पाणिमामणिबन्धनात् ।। अधस्तादुपरिष्टाच्च ततः पाणिमुपस्पृशेत् । पहले पैरोंको भलीभाँति धोकर फिर कलाईसे लेकर समूचे हाथको ऊपरसे नीचेतक धो डाले। इसके बाद हाथमें जल लेकर आचमन करे ।। मनोगतास्तु निश्शब्दा निश्शब्दं त्रिरपः पिबेत् ।। द्विर्मुखं परिमृज्याच्च खानि चोपस्पृशेद बुधः । आचमनके समय मौन होकर तीन बार जल पीये। उस जलमें किसी प्रकारकी आवाज न हो तथा आचमनके पश्चात् वह जल हृदयतक पहुँचे। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह अंगूठेके मूलभागसे दो बार मुँह पोंछे। इसके बाद इन्द्रियोंके छिद्रोंका स्पर्श करे ।। ऋग्वेदं तेन प्रीणाति प्रथमं यः पिबेदपः । द्वितीयं च यजुर्वेदं तृतीयं साम एव च ।। वह प्रथम बार जो जल पीता है, उससे ऋग्वेदको तृप्त करता है, द्वितीय बारका जल यजुर्वेदको और तृतीय बारका जल सामवेदको तृप्त करता है ।।