भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 840, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 840

मृज्यते प्रथमं तेन अथर्वा प्रीतिमाप्नुयात् ।।
द्वितीयेनेतिहासं च पुराणस्मृतिदेवताः ।
पहली बार जो मुखका मार्जन किया जाता है, उससे अथर्ववेद तृप्त होता है और द्वितीय बारके मार्जनसे इतिहास-पुराण एवं स्मृतियोंके अधिष्ठाता देवता सन्तुष्ट होते हैं ।।

यच्चक्षुषि समाधत्ते तेनादित्यं तु प्रीणयेत् ।।
प्रीणाति वायुं घ्राणं च दिशश्चाप्यथ श्रोत्रयोः ।
मुखमार्जनके पश्चात् द्विज जो अंगुलियोंसे नेत्रोंका स्पर्श करता है, उसके द्वारा वह सूर्यदेवको तृप्त करता है। नासिकाके स्पर्शसे वायुको और दोनों कानोंके स्पर्शसे वह दिशाओंको संतुष्ट करता है ।।

ब्रह्माणं तेन प्रीणाति यन्मूर्धनि समालभेत् ।।
समुत्क्षिपति चापोर्ध्वमाकाशं तेन प्रीणयेत् ।
आचमन करनेवाला पुरुष अपने मस्तकपर जो हाथ रखता है, उसके द्वारा वह ब्रह्माजीको तृप्त करता है और ऊपरकी ओर जो जल फेंकता है, उसके द्वारा वह आकाशके अधिष्ठाता देवताको संतुष्ट करता है ।।

प्रीणाति विष्णुः पद्भ्यां तु सलिलं वै समादधत् ।।
प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि अन्तर्जानुरुपस्पृशेत् ।
सर्वत्र विधिरित्येष भोजनादिषु नित्यशः ।।
वह अपने दोनों पैरोंपर जो जल डालता है, इससे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। आचमन करनेवाला पुरुष पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके अपने हाथको घुटनेके भीतर रखकर जलका स्पर्श करे। भोजन आदि सभी अवसरोंपर सदा आचमन करनेकी यही विधि है ।।

अन्नेषु दन्तलग्नेषु उच्छिष्टः पुनराचमेत् ।
विधिरेष समुद्दिष्टः शौचे चाभ्युक्षणं स्मृतम् ।।
यदि दाँतोंमें अन्न लगा हो तो अपनेको जूठा मानकर पुनः आचमन करे, यह शौचाचारकी विधि बतायी गयी। किसी वस्तुकी शुद्धिके लिये उसपर जल छिड़कना भी कर्तव्य माना गया है ।।

शूद्रस्यैष विधिर्दृष्टो गृहान्निष्क्रमतः सतः ।
नित्यं चालुप्तशौचेन वर्तितव्यं कृतात्मना ।।
यशस्कामेन भिक्षुभ्यः शूद्रेणात्महितार्थिना ।।
(साधु-सेवाके उद्देश्यसे) घरसे निकलते समय शूद्रके लिये भी यह शौचाचारकी विधि देखी गयी है। जिसने मनको वशमें किया है तथा जो अपने हितकी इच्छा रखता है, ऐसे सुयशकामी शूद्रको चाहिये कि वह सदा शौचाचारसे सम्पन्न होकर ही संन्यासियोंके निकट जाय और उनकी सेवा आदिका कार्य करे ।।