भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 841, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 841

क्षत्रा आरम्भयज्ञास्तु हविर्यज्ञा विशः स्मृताः ।
शूद्राः परिचारयज्ञा जपयज्ञास्तु ब्राह्मणाः ।।
क्षत्रिय आस्मभ (उत्साह) रूप यज्ञ करनेवाले होते हैं। वैश्योंके यज्ञमें हविष्य (हवनीय पदार्थ) की प्रधानता होती है, शूद्रोंका यज्ञ सेवा ही है, तथा ब्राह्मण जपरूपी यज्ञ करनेवाले होते हैं ।।

शुश्रूषाजीविनः शूद्रा वैश्या विपणजीविनः ।
अनिष्टनिग्रहाः क्षत्रा विप्राः स्वाध्यायजीविनः ।।
शूद्र सेवासे जीवननिर्वाह करनेवाले होते हैं, वैश्य व्यापारजीवी हैं, दुष्टोंका दमन करना क्षत्रियोंकी जीवनवृत्ति है और ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायसे जीवन-निर्वाह करते हैं ।।

तपसा शोभते विप्रो राजन्यः पालनादिभिः ।
आतिथ्येन तथा वैश्यः शूद्रो दास्येन शोभते ।।
क्योंकि ब्राह्मण तपस्यासे, क्षत्रिय पालन आदिसे, वैश्य अतिथि-सत्कारसे और शूद्र सेवावृत्तिसे शोभा पाते हैं ।।

यतात्मना तु शूद्रेण शुश्रूषा नित्यमेव तु ।
कर्तव्या त्रिषु वर्णेषु प्रायेणाश्रमवासिषु ।।
अपने मनको वशमें रखनेवाले शूद्रको सदा ही तीनों वर्णोंकी विशेषतः आश्रमवासियोंकी सेवा करनी चाहिये ।।

अशक्तेन त्रिवर्णस्य सेव्या ह्याश्रमवासिनः ।
यथाशक्ति यथाप्रज्ञं यथाधर्मं यथाश्रुतम् ।।
विशेषेणैव कर्तव्या शुश्रूषा भिक्षुकाश्रमे ।।
त्रिवर्णकी सेवामें अशक्त हुए शूद्रको अपनी शक्ति, बुद्धि, धर्म तथा शास्त्रज्ञानके अनुसार आश्रमवासियोंकी सेवा करनी चाहिये। विशेषतः संन्यास-आश्रममें रहनेवाले भिक्षुकी सेवा उसके लिये परम कर्तव्य है ।।

आश्रमाणां तु सर्वेषां चतुर्णां भिक्षुकाश्मम् ।
प्रधानमिति मन्यन्ते शिष्टाः शास्त्रविनिश्चये ।।
शास्त्रोंके सिद्धान्त-ज्ञानमें निपुण शिष्ट पुरुष चारों आश्रमोंमें संन्यासको ही प्रधान मानते हैं ।।

यच्चोपदिश्यते शिष्टैः श्रुतिस्मृतिविधानतः ।
तथाऽऽस्थेयमशक्तेन स धर्म इति निश्चितः ।।
शिष्ट पुरुष वेदों और स्मृतियोंके विधानके अनुसार जिस कर्तव्यका उपदेश करें असमर्थ पुरुषको उसीका अनुष्ठान करना चाहिये। उसके लिये वही धर्म निश्चित किया गया है ।।

अतोऽन्यथा तु कुर्वाणः श्रेयो नाप्नोति मानवः ।