महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 842, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतस्माद् भिक्षुषु शूद्रेण कार्यमात्महितं सदा ॥
इसके विपरीत करनेवाला मानव कल्याणका भागी नहीं होता है, अतः शूद्रको संन्यासियोंकी सेवा करके सदा अपना कल्याण करना चाहिये ॥
इह यत् कुरुते श्रेयस्तत् प्रेत्य समुपाश्नुते ।
तच्चानसूयता कार्यं कर्तव्यं यद्धि मन्यते ॥
असूयता कृतस्येह फलं दुःखदवाप्यते ॥
मनुष्य इस लोकमें जो कल्याणकारी कार्य करता है, उसका फल मृत्युके पश्चात् उसे प्राप्त होता है। जिसे वह अपना कर्तव्य समझता है, उस कार्यको वह दोषदृष्टि न रखते हुए करे। दोषदृष्टि रखते हुए जो कार्य किया जाता है, उसका फल इस जगत्में बड़े दुःखसे प्राप्त होता है ॥
प्रियवादी जितक्रोधो वीततन्द्रिरमत्सरः ।
क्षमावान् शीलसम्पन्नः सत्यधर्मपरायणः ॥
आपद्भावेन कुर्याद्धि शुश्रूषां भिक्षुकाश्रमे ॥
शूद्रको चाहिये कि वह प्रिय वचन बोले, क्रोधको जीते, आलस्य दूर भगा दे, ईर्ष्या-द्वेषसे रहित हो जाय, क्षमाशील, शीलवान् तथा सत्यधर्ममें तत्पर रहे। आपत्तिकालमें वह संन्यासियोंके आश्रममें (जाकर) उनकी सेवा करे ॥
अयं मे परमो धर्मस्त्वनेनेदं सुदुस्तरम् ।
संसारसागरं घोरं तरिष्यामि न संशयः ॥
निर्भयो देहमुत्सृज्य यास्यामि परमां गतिम् ।
नातः परं ममास्त्यन्य एष धर्मः सनातनः ॥
एवं संचिन्त्य मनसा शूद्रो बुद्धिसमाधिना ।
कुर्यादविमना नित्यं शुश्रूषाधर्ममुत्तमम् ॥
'यही मेरा परम धर्म है, इसीके द्वारा मैं इस अत्यन्त दुस्तर घोर संसार-सागरसे पार हो जाऊँगा। इसमें संशय नहीं है। मैं निर्भय होकर इस देहका त्याग करके परमगतिको प्राप्त हो जाऊँगा। इससे बढ़कर मेरे लिये दूसरा कोई कर्तव्य नहीं है। यही सनातन धर्म है।' मन-ही-मन ऐसा विचार करके प्रसन्नचित्त हुआ शूद्र बुद्धिको एकाग्र करके सदा उत्तम शुश्रूषा-धर्मका पालन करे ॥
शुश्रूषानियमेनेह भाव्यं शिष्टाशिना सदा ।
शमान्वितेन दान्तेन कार्याकार्यविदा सदा ॥
शूद्रको चाहिये कि वह नियमपूर्वक सेवामें तत्पर रहे, सदा यज्ञशिष्ट अन्न भोजन करे। मन और इन्द्रियोंको वशमें रखे और सदा कर्तव्याकर्तव्यको जाने ॥
सर्वकार्येषु कृत्यानि कृतान्येव च दर्शयेत् ।
यथा प्रीतो भवेद् भिक्षुस्तथा कार्यं प्रसाधयेत् ॥