भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 843, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 843

यदकल्पं भवेद् भिक्षोर्न तत् कार्यं समाचरेत् ।
सभी कार्योंमें जो आवश्यक कृत्य हों, उन्हें करके ही दिखावे। जैसे-जैसे संन्यासीको प्रसन्नता हो, उसी प्रकार उसका कार्य साधन करे। जो कार्य संन्यासीके लिये हितकर न हो, उसे कदापि न करे ।।
यदाश्रमस्याविरुद्धं धर्ममात्राभिसंहितम् ।।
तत् कार्यमविचारेण नित्यमेव शुभार्थिना ।
जो कार्य संन्यास-आश्रमके विरुद्ध न हो तथा जो धर्मके अनुकूल हो, शुभकी इच्छा रखनेवाले शूद्रको वह कार्य सदा बिना विचारे ही करना चाहिये ।।
मनसा कर्मणा वाचा नित्यमेव प्रसादयेत् ।।
स्थातव्यं तिष्ठमानेषु गच्छमानाननुव्रजेत् ।
आसीनेष्वासितव्यं च नित्यमेवानुवर्तिना ।।
मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा ही उन्हें संतुष्ट रखे। जब वे संन्यासी खड़े हों, तब सेवा करनेवाले शूद्रको स्वयं भी खड़ा रहना चाहिये तथा जब वे कहीं जा रहे हों, तब उसे स्वयं भी उनके पीछे-पीछे जाना चाहिये। यदि वे आसनपर बैठे हों तब वह स्वयं भी भूमिपर बैठे। तात्पर्य यह कि सदा ही उनका अनुसरण करता रहे ।।
नैशकार्याणि कृत्वा तु नित्यं चैवानुचोदितः ।
यथाविधिरुपस्पृश्य संन्यस्य जलभाजनम् ।।
भिक्षूणां निलयं गत्वा प्रणम्य विधिपूर्वकम् ।
ब्रह्मपूर्वान् गुरूस्तत्र प्रणम्य नियतेन्द्रियः ।।
तथाऽऽचार्यपुरोगाणामनुकुर्यान्नमस्क्रियाम् ।
स्वधर्मचारिणां चापि सुखं पृष्ट्वाभिवाद्य च ।।
यो भवेत् पूर्वसंसिद्धस्तुल्यधर्मा भवेत् सदा ।
तस्मै प्रणामः कर्तव्यो नेतरेषां कदाचन ।।
रात्रिके कार्य पूरे करके प्रतिदिन उनसे आज्ञा लेकर विधिपूर्वक स्नान करके उनके लिये जलसे भरा हुआ कलश ले आकर रखे। फिर संन्यासियोंके स्थानपर जाकर उन्हें विधिपूर्वक प्रणाम करके इन्द्रियोंको संयममें रखकर ब्राह्मण आदि गुरुजनोंको प्रणाम करे। इसी प्रकार स्वधर्मका अनुष्ठान करनेवाले आचार्य आदिको नमस्कार एवं अभिवादन करे। उनका कुशल-समाचार पूछे। पहलेके जो शूद्र आश्रमके कार्यमें सिद्धहस्त हों, उनका स्वयं भी सदा अनुकरण करे, उनके समान कार्यपरायण हो। अपने समानधर्मा शूद्रको प्रणाम करे, दूसरे शूद्रोंको कदापि नहीं ।।
अनुक्त्वा तेषु चोत्थाय नित्यमेव यतव्रतः ।
सम्मार्जनमथो कृत्वा कृत्वा चाप्युपलेपनम् ।।