भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 844, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 844

संन्यासियों अथवा आश्रमके दूसरे व्यक्तियोंको कहे बिना ही प्रतिदिन नियमपूर्वक उठे और झाडू देकर आश्रमकी भूमिको लीप-पोत दे ।। ततः पुष्पबलिं दद्यात् पुष्पाण्यादाय धर्मतः । निष्क्रम्यावसथात् तूर्णमन्यत् कर्म समाचरेत् ।। तत्पश्चात् धर्मके अनुसार फूलोंका संग्रह करके पूजनीय देवताओंकी उन फूलोंद्वारा पूजा करे। इसके बाद आश्रमसे निकलकर तुरंत ही दूसरे कार्यमें लग जाय ।। यथोपघातो न भवेत् स्वाध्यायेऽऽश्रमिणां तथा । उपघातं तु कुर्वाण एनसा सम्प्रयुज्यते ।। आश्रमवासियोंके स्वाध्यायमें विघ्न न पड़े, इसके लिये सदा सचेष्ट रहे। जो स्वाध्यायमें विघ्न डालता है, वह पापका भागी होता है ।। तथाऽऽत्मा प्रणिधातव्यो यथा ते प्रीतिमाप्नुयुः । परिचारिकोऽहं वर्णानां त्रयाणां धर्मतः स्मृतः ।। किमुताश्रमवृद्धानां यथालब्धोपजीविनाम् ।। अपने-आपको इस प्रकार सावधानीके साथ सेवामें लगाये रखना चाहिये, जिससे वे साधु पुरुष प्रसन्न हों। शूद्रको सदा इस प्रकार विचार करना चाहिये कि 'मैं तो शास्त्रोंमें धर्मतः तीनों वर्णोंका सेवक बताया गया हूँ। फिर जो संन्यास-आश्रममें रहकर जो कुछ मिल जाय, उसीसे निर्वाह करनेवाले बड़े-बूढ़े संन्यासी हैं, उनकी सेवाके विषयमें तो कहना ही क्या है? (उनकी सेवा करना तो मेरा परम धर्म है ही) ।। भिक्षूणां गतरागाणां केवलं ज्ञानदर्शिनाम् । विशेषेण मया कार्या शुश्रूषा नियतात्मना ।। 'जो केवल ज्ञानदर्शी, वीतराग संन्यासी हैं, उनकी सेवा मुझे विशेषरूपसे मनको वशमें रखते हुए करनी चाहिये ।। तेषां प्रसादात् तपसा प्राप्स्यामीष्टां शुभां गतिम् ।। एवमेतद् विनिश्चित्य यदि सेवेत भिक्षुकान् । विधिना यथोपदिष्टेन प्राप्नोति परमां गतिम् ।। 'उनकी कृपा और तपस्यासे मैं मनोवांछित शुभगति प्राप्त कर लूँगा।' ऐसा निश्चय करके यदि शूद्र पूर्वोक्त विधिसे संन्यासियोंका सेवन करे तो परम गतिको प्राप्त होता है ।। न तथा सम्प्रदानेन नोपवासादिभिस्तथा । इष्टां गतिमवाप्नोति यथा शुश्रूषकर्मणा ।। शूद्र सेवाकर्मसे जिस मनोवांछित गतिको प्राप्त कर लेता है, वैसी गति दान तथा उपवास आदिके द्वारा भी नहीं प्राप्त कर सकता ।। यादृशेन तु तोयेन शुद्धिं प्रकुरुते नरः । तादृग् भवति तद्धौतमुदकस्य स्वभावतः ।।