महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो श्रद्धापूर्वक दी गयी और श्रद्धासे ही ग्रहण की गयी हो, उसी ओषधिके सेवनसे धर्म होता है और रोगोंसे छुटकारा भी मिलता है ।।
आदेहपतनादेवं शुश्रूषेद् विधिपूर्वकम् ।
न त्वेव धर्ममुत्सृज्य कुर्यात् तेषां प्रतिक्रियाम् ।।
शूद्रको चाहिये कि जबतक यह शरीर छूट न जाय तबतक इसी प्रकार विधिपूर्वक सेवा करता रहे। धर्मका उल्लंघन करके उन साधु-संन्यासियोंके प्रति विपरीत आचरण न करे ।।
स्वभावतो हि द्वन्द्वानि विप्रयान्त्युपयान्ति च ।
स्वभावतः सर्वभावा भवन्ति न भवन्ति च ।।
सागरस्योर्मिसदृशा विज्ञातव्या गुणात्मकाः ।
शीत-उष्ण आदि सारे द्वन्द्व स्वभावसे ही आते-जाते रहते हैं, समस्त पदार्थ स्वभावसे ही उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं। सारे त्रिगुणमय पदार्थ समुद्रकी लहरोंके समान उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं ।।
विद्यादेवं हि यो धीमांस्तत्त्ववित् तत्त्वदर्शनः ।।
न स लिप्येत पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ।
जो बुद्धिमान् एवं तत्त्वज्ञ पुरुष ऐसा जानता है, वह जलसे निर्लिप्त रहनेवाले पद्मपत्रके समान पापसे लिप्त नहीं होता ।।
एवं प्रयतितव्यं हि शुश्रूषार्थमतन्द्रितैः ।।
सर्वाभिरुपसेवाभिस्तुष्यन्ति यतयो यथा ।
इस प्रकार शूद्रोंको आलस्यशून्य होकर संन्यासियोंकी सेवाके लिये प्रयत्नशील रहना चाहिये। वह सब प्रकारकी छोटी-बड़ी सेवाओंद्वारा ऐसी चेष्टा करे, जिससे वे संन्यासी सदा संतुष्ट रहें ।।
नापराध्येत भिक्षोस्तु न चैवमवधीरयेत् ।।
उत्तरं च न संदद्यात् क्रुद्धं चैव प्रसादयेत् ।
भिक्षुका अपराध कभी न करे, उसकी अवहेलना भी न करे, उसकी कड़ी बातका कभी उत्तर न दे और यदि वह कुपित हो तो उसे प्रसन्न करनेकी चेष्टा करे ।।
श्रेय एवाभिधातव्यं कर्तव्यं च प्रहृष्टवत् ।।
तूष्णीम्भावेन वै तत्र न क्रुद्धमभिसंवदेत् ।
सदा कल्याणकारी बात ही बोले और प्रसन्नतापूर्वक कल्याणकारी कर्म ही करे। संन्यासी कुपित हो तो उसके सामने चुप ही रहे, बातचीत न करे ।।
लब्धालब्धेन जीवेत तथैव परिपोषयेत् ।
संन्यासीको चाहिये कि भाग्यसे कोई वस्तु मिले या न मिले, जो कुछ प्राप्त हो उसीसे जीवन-निर्वाह एवं शरीरका पोषण करे ।।
कोपिनं तु न याचेत ज्ञानविद्वेषकारितः ।।