महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 855, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[सरोवर खोदाने और वृक्ष लगानेका माहात्म्य]
युधिष्ठिर उवाच
संस्कृतानां तटाकानां यत् फल कुरुपुंगव ।
तदहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तोऽद्य भरतर्षभ ॥
युधिष्ठिरने कहा— कुरुपुंगव! भरतश्रेष्ठ! सरोवरोंके बनानेका जो फल है, उसे आज मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥
भीष्म उवाच
सुप्रदर्शो धनपतिश्चित्रधातुविभूषितः ।
त्रिषु लोकेषु सर्वत्र पूजितो यस्तटाकवान् ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! जो तालाब बनवाता है वह पुरुष विचित्र धातुओंसे विभूषित धनाध्यक्ष कुबेरके समान दर्शनीय है। वह तीनों लोकोंमें सर्वत्र पूजित होता है ॥
इह चामुत्र सदनं पुत्रीयं वित्तवर्धनम् ।
कीर्तिसंजननं श्रेष्ठं तटाकानां निवेशनम् ॥
तालाबका संस्थापन श्रेष्ठ एवं कीर्तिजनक है। वह इस लोक और परलोकमें भी उत्तम निवासस्थान है। वह पुत्रका घर तथा धनकी वृद्धि करनेवाला है ॥
धर्मस्यार्थस्य कामस्य फलमाहुर्मनीषिणः ।
तटाकं सुकृतं देशे क्षेत्रे देशसमाश्रयम् ॥
मनीषी पुरुषोंने सरोवरोंको धर्म, अर्थ और काम तीनोंका फल देनेवाला बताया है। तालाब देशमें मूर्तिमान् पुण्यस्वरूप है और क्षेत्रमें देशका भारी आश्रय है ॥
चतुर्विधानां भूतानां तटाकमुपलक्षये ।
तटाकानि च सर्वाणि दिशन्ति श्रियमुत्तमाम् ॥
मैं तालाबको चारों (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) प्रकारके प्राणियोंके लिये उपयोगी देखता हूँ। जगत्में जितने भी सरोवर हैं, वे सभी उत्तम सम्पत्ति प्रदान करते हैं ॥
देवा मनुष्या गन्धर्वाः पितरोरगराक्षसाः ।
स्थावराणि च भूतानि संश्रयन्ति जलाशयम् ॥
देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पितर, नाग, राक्षस तथा स्थावर भूत—ये सभी जलाशयका आश्रय लेते हैं ॥
तस्मात्तांस्ते प्रवक्ष्यामि तटाके ये गुणाः स्मृताः ।
या च तत्र फलप्राप्ती ऋषिभिः समुदाहृता ॥
अतः सरोवर खोदवानेमें जो गुण हैं, उन सबका मैं तुमसे वर्णन करूँगा तथा ऋषियोंने तालाब खोदानेसे जिन फलोंकी प्राप्ति बतायी है, उनका भी परिचय दे रहा हूँ ॥
वर्षमात्रं तटाके तु सलिलं यत्र तिष्ठति ।