भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 854, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 854

चलितां ये निगृह्णन्ति तान् नित्यं पूजयाम्यहम् ।। धन, विद्या और ऐश्वर्य जिनकी बुद्धिको विचलित नहीं कर सकते तथा जो चंचल हुई बुद्धिको भी विवेकसे काबूमें कर लेते हैं, उनकी मैं नित्य पूजा करता हूँ ।। इष्टैर्दारैरुपैतानां शुचीनामाग्निहोत्रिणाम् । चतुष्पादकुटुम्बानां मातले प्रणमाम्यहम् ।। मातले! जो प्रिय पत्नीसे युक्त हैं, पवित्र आचार-विचारसे रहते हैं, नित्य अग्निहोत्र करते हैं और जिनके कुटुम्बमें चौपायों (गौ आदि पशुओं) का भी पालन होता है, उनको मैं नमस्कार करता हूँ ।। येषामर्थस्तथा कामो धर्ममूलविवर्धितः । धर्मार्थौ यस्य नियतौ तान् नमस्यामि मातले ।। मातले! जिनका अर्थ और काम धर्ममूलक होकर वृद्धिको प्राप्त हुआ है तथा जिसके धर्म और अर्थ नियत हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ ।। धर्ममूलार्थकामानां ब्राह्मणानां गवामपि । पतिव्रतानां नारीणां प्रणामं प्रकरोम्यहम् ।। धर्ममूलक धनकी कामना रखनेवाले ब्राह्मणोंको तथा गौओं और पतिव्रता नारियोंको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ।। ये भुक्त्वा मानुषान् भोगान् पूर्वे वयसि मातले । तपसा स्वर्गमायान्ति शश्वत् तान् पूजयाम्यहम् ।। मातले! जो जीवनकी पूर्व अवस्थामें मानवभोगोंका उपभोग करके तपस्याद्वारा स्वर्गमें आते हैं, उनका मैं सदा ही पूजन करता हूँ ।। असम्भोगान्न चासक्तान् धर्मनित्याञ्जितेन्द्रियान् । संन्यस्तानचलप्रख्यान् मनसा पूजयामि तान् ।। जो भोगोंसे दूर रहते हैं, जिनकी कहीं भी आसक्ति नहीं है, जो सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं, इन्द्रियोंको काबूमें रखते हैं, जो सच्चे संन्यासी हैं और पर्वतोंके समान कभी विचलित नहीं होते हैं, उन श्रेष्ठ पुरुषोंकी मैं मनसे पूजा करता हूँ ।। ज्ञानप्रसन्नविद्यानां निरूढं धर्ममिच्छताम् । परैः कीर्तितशौचानां मातले तान् नमाम्यहम् ।। मातले! जिनकी विद्या ज्ञानके कारण स्वच्छ है, जो सुप्रसिद्ध धर्मके पालनकी इच्छा रखते हैं तथा जिनके शौचाचारकी प्रशंसा दूसरे लोग करते हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)