महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 853, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजब इन्द्र वृत्रासुरको मारकर लौटे, उस समय देवता उन्हें आगे करके खड़े थे। महर्षिगण महेन्द्रकी स्तुति करते थे। हरित वाहनोंवाले देवराज इन्द्र रथपर बैठकर उत्तम शोभासे सम्पन्न हो रहे थे। उसी समय मातलिने हाथ जोड़कर देवराज इन्द्रसे कहा।।
मातलिरुवाच
नमस्कृतानां सर्वेषां भगवंस्त्वं पुरस्कृतः।
येषां लोके नमस्कुर्यात् तान् ब्रवीतु भवान् मम॥
**मातलि बोले—**भगवन्! जो सबके द्वारा वन्दित होते हैं, उन समस्त देवताओंके आप अगुआ हैं; परन्तु आप भी इस जगत्में जिनको मस्तक झुकाते हैं, उन महात्माओंका मुझे परिचय दीजिये।।
भीष्म उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा देवराजः शचीपतिः।
यन्तारं परिपृच्छन्तं तमिन्द्रः प्रत्युवाच ह॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! मातलिकी वह बात सुनकर शचीपति देवराज इन्द्रने उपर्युक्त प्रश्न पूछनेवाले अपने सारथिसे इस प्रकार कहा।।
इन्द्र उवाच
धर्मं चार्थं च कामं च येषां चिन्तयतां मतिः।
नाधर्मे वर्तते नित्यं तान् नमस्यामि मातले॥
**इन्द्र बोले—**मातले! धर्म, अर्थ और कामका चिन्तन करते हुए भी जिनकी बुद्धि कभी अधर्ममें नहीं लगती, मैं प्रतिदिन उन्हींको नमस्कार करता हूँ।।
ये रूपगुणसम्पन्नाः प्रमदाहृदयंगमाः।
निवृत्ताः कामभोगेषु तान् नमस्यामि मातले॥
मातले! जो रूप और गुणसे सम्पन्न हैं तथा युवतियोंके हृदय-मन्दिरमें हठात् प्रवेश कर जाते हैं—अर्थात् जिन्हें देखते ही युवतियाँ मोहित हो जाती हैं, ऐसे पुरुष यदि काम-भोगसे दूर रहते हैं तो मैं उनके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ।।
स्वेषु भोगेषु संतुष्टाः सुवाचो वचनक्षमाः।
अमानकामाश्चार्घ्यार्हास्तान् नमस्यामि मातले॥
मातले! जो अपनेको प्राप्त हुए भोगोंमें ही संतुष्ट हैं—दूसरोंसे अधिककी इच्छा नहीं रखते। जो सुन्दर वाणी बोलते हैं और प्रवचन करनेमें कुशल हैं, जिनमें अहंकार और कामनाका सर्वथा अभाव है तथा जो सबसे अर्घ्य पानेके योग्य हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।।
धनं विद्यास्तथैश्वर्यं येषां न चलयेन्मतिम्।