महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 852, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसवर्णतां गच्छति संनिकर्षा- न्नीलः खगो मेरुमिवाश्रयन् वै ॥
मनुष्यको सदा सत्पुरुषोंके समीप रहना चाहिये। विद्यामें बड़े-चढ़े पुरुषोंका सेवन करना चाहिये। जो जिसके निकट रहता है, उसके समान वर्णका हो जाता है। जैसे नील पक्षी मेरु पर्वतका आश्रय लेनेसे सुवर्णके समान रंगका हो जाता है ॥
भीष्म उवाच
इत्येवमाख्याय महामुनिस्तदा चतुर्षु वर्णेषु विधानमर्थवित् । शुश्रूषया वृत्तगतिं समाधिना समाधियुक्तः प्रययौ स्वमाश्रमम् ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! शास्त्रोंके तात्पर्यको जाननेवाले महामुनि पराशर इस प्रकार चारों वर्णोंके लिये कर्तव्यका विधान बताकर तथा शुश्रूषा और समाधिसे प्राप्त होनेवाली गतिका निरूपण करके एकाग्रचित्त हो अपने आश्रमको चले गये ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[सबके पूजनीय और वन्दनीय कौन हैं—इस विषयमें इन्द्र और मातलिका संवाद]
युधिष्ठिर उवाच
केषां देवा महाभागाः संनमन्ते महात्मनाम् । लोकेऽस्मिंस्तानृषीन् सर्वान् श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! इस लोकमें महाभाग देवता किन महात्माओंको मस्तक झुकाते हैं? मैं उन समस्त ऋषियोंका यथार्थ परिचय सुनना चाहता हूँ ॥
भीष्म उवाच
इतिहासमिमं विप्राः कीर्तयन्ति पुराविदः । अस्मिन्नर्थे महाप्राज्ञास्तं निबोध युधिष्ठिर ॥
भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! इस विषयमें प्राचीन बातोंको जाननेवाले महाज्ञानी ब्राह्मण इस इतिहासका वर्णन करते हैं। तुम उस इतिहासको सुनो ॥
वृत्रं हत्वाप्युपावृत्तं त्रिदशानां पुरस्कृतम् । महेन्द्रमनुसम्प्राप्तं स्तूयमानं महर्षिभिः ॥ श्रिया परमया युक्तं रथस्थं हरिवाहनम् । मातलिः प्राञ्जलिर्भूत्वा देवमिन्द्रमुवाच ह ॥