महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 851, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंन चायुक्तेन शक्योऽयं द्रष्टुं देहे महेश्वरः ॥
युक्तस्तु पश्यते बुद्ध्या संनिवेश्य मनो हृदि ।
जो योगयुक्त नहीं है ऐसा पुरुष अपने हृदयमें विराजमान उस महेश्वरका साक्षात्कार नहीं कर सकता। योगयुक्त पुरुष ही मनको हृदयमें स्थापित करके बुद्धिके द्वारा उस अन्तर्यामी परमात्माका दर्शन करता है ।।
अथ त्वेवं न शक्नोति कर्तुं हृदयधारणम् ॥
यथासांख्यमुपासीत यथावद् योगमास्थितः ।
यदि इस प्रकार हृदयदेशमें ध्यान-धारणा न कर सके तो यथावत्रूपसे योगका आश्रय ले सांख्यशास्त्रके अनुसार उपासना करे ।।
पञ्च बुद्धीन्द्रियाणीह पञ्च कर्मेन्द्रियाण्यपि ॥
पञ्च भूतविशेषाश्च मनश्चैव तु षोडश ।
इस शरीरमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत और सोलहवाँ मन—ये सोलह विकार हैं ।।
तन्मात्राण्यपि पञ्चैव मनोऽहंकार एव च ॥
अष्टमं चाप्यथाव्यक्तमेताः प्रकृतिसंज्ञिताः ।
पाँच तन्मात्राएँ, मन, अहंकार और अव्यक्त—ये आठ प्रकृतियाँ हैं ।।
एताः प्रकृतयश्चाष्टौ विकाराश्चापि षोडश ॥
एवमेतदिहस्थेन विज्ञेयं तत्त्वबुद्धिना ।
एवं वर्ष्म समुत्तीर्य तीर्णो भवति नान्यथा ॥
ये आठ प्रकृतियाँ और पूर्वोक्त सोलह विकार—इन चौबीस तत्त्वोंको यहाँ रहनेवाले तत्त्वज्ञ पुरुषको जानना चाहिये। इस प्रकार प्रकृति-पुरुषका विवेक हो जानेसे मनुष्य शरीरके बन्धनसे ऊपर उठकर भवसागरसे पार हो जाता है, अन्यथा नहीं ।।
परिसंख्यानमेवैतन्मन्तव्यं ज्ञानबुद्धिना ।
अहन्यहनि शान्तात्मा पावनाय हिताय च ॥
एवमेव प्रसंख्याय तत्त्वबुद्धिर्विमुच्यते ।
ज्ञानयुक्त बुद्धिवाले पुरुषको यही सांख्ययोग मानना चाहिये। प्रतिदिन शान्तचित्त हो अपने अन्तःकरणको पवित्र बनाने और अपना हित-साधन करनेके लिये इसी प्रकार उपर्युक्त तत्त्वोंका विचार करनेसे मनुष्यको यथार्थ तत्त्वका बोध हो जाता है और वह बन्धनसे छूट जाता है ।।
निष्कलं केवलं भवति शुद्धतत्त्वार्थतत्त्ववित् ॥
शुद्ध तत्त्वार्थको तत्त्वसे जाननेवाला पुरुष अवयवरहित अद्वितीय ब्रह्म हो जाता है ।।
सत्संनिकर्षे परिवर्तितव्यं
विद्याधिकाश्चापि निषेवितव्याः ।