महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 850, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रक्षीयते तस्य पुण्यं ज्ञानमस्य विरुध्यते ॥
वह नरकमें जानेके लिये अशुभ मार्गको ही प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। उसका पुण्य नष्ट हो जाता है और ज्ञान अज्ञान हो जाता है ॥
अदृष्टपूर्वकल्याणो यथादृष्टविधिर्नरः ॥
उत्सेकान्मोहमापद्य तत्त्वज्ञानं न चाप्नुयात् ।
जिसने पहले कभी कल्याणका दर्शन नहीं किया है ऐसा मनुष्य शास्त्रोक्त विधिको न देखनेके कारण अभिमानवश मोहको प्राप्त हो जाता है। अतः उसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती ॥
एवमेव हि नोत्सेकः कर्तव्यो ज्ञानसम्भवः ॥
फलं ज्ञानस्य हि शमः प्रशमाय यतेत् सदा ।
अतः किसीको भी ज्ञानका अभिमान नहीं करना चाहिये। ज्ञानका फल है शान्ति, इसलिये सदा शान्तिके लिये ही प्रयत्न करे ॥
उपशान्तेन दान्तेन क्षमायुक्तेन सर्वदा ॥
शुश्रूषा प्रतिपत्तव्या नित्यमेवानसूयता ।
मनका निग्रह और इन्द्रियोंका संयम करके सदा क्षमाशील तथा अदोषदर्शी होकर गुरुजनोंकी सेवा करनी चाहिये ॥
धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत् पाणिपादं च चक्षुषा ॥
इन्द्रियार्थांश्च मनसा मनो बुद्धौ समादधेत् ।
धैर्यके द्वारा उपस्थ और उदरकी रक्षा करे। नेत्रोंके द्वारा हाथ और पैरोंकी रक्षा करे। मनसे इन्द्रियोंके विषयोंको बचावे और मनको बुद्धिमें स्थापित करे ॥
धृत्याऽऽसीत ततो गत्वा शुद्धदेशं सुसंवृतम् ॥
लब्ध्वाऽऽसनं यथादृष्टं विधिपूर्वं समाचरेत्।
पहले शुद्ध एवं घिरे हुए स्थानमें जाकर आसन ले, उसके ऊपर धैर्यपूर्वक बैठे और शास्त्रोक्त विधिके अनुसार ध्यानके लिये प्रयत्न करे ॥
ज्ञानयुक्तस्तथा देवं हृदिस्थमुपलक्षयेत् ॥
आदीप्यमानं वपुषा विधूममनलं यथा ।
रश्मिमन्तमिवादित्यं वैद्युताग्निमिवाम्बरे ॥
संस्थितं हृदये पश्येदीशं शाश्वतमव्ययम् ।
विवेकयुक्त साधक अपने हृदयमें विराजमान परमात्मदेवका साक्षात्कार करे। जैसे आकाशमें विद्युत्का प्रकाश देखा जाता है तथा जिस प्रकार किरणोंवाले सूर्य प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार उस परमात्मदेवको धूमरहित अग्निकी भाँति तेजस्वी स्वरूपसे प्रकाशित देखे। हृदयदेशमें विराजमान उन अविनाशी सनातन परमेश्वरका बुद्धिरूपी नेत्रोंके द्वारा दर्शन करे ॥