महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 849, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतथा शुभसमाचारो ह्यशुभानि विवर्जयेत् ।।
शुभान्येव समादद्याद् य इच्छेद् भूतिमात्मनः ।
अतः जो अपना कल्याण चाहता हो, वह शुभ-कर्मोंका ही आचरण करे। अशुभ कर्मोंको त्याग दे। ऐसा करनेसे वह शुभ फलोंको ही प्राप्त करेगा ।।
तस्मादागमसम्पन्नो भवेत् सुनियतेन्द्रियः ।।
शक्यते ह्यागमादेव गतिं प्राप्तुमनामयाम् ।
मनुष्यको चाहिये कि वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके शास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न हो। शास्त्रके ज्ञानसे ही मनुष्यको अनामय गतिकी प्राप्ति हो सकती है ।।
परा चैषा गतिर्दृष्टा यामन्वेषन्ति साधवः ।।
यत्रामृतत्वं लभते त्यक्त्वा दुःखमनन्तकम् ।
साधु पुरुष जिसका अन्वेषण करते हैं, वह परमगति शास्त्रोंमें देखी गयी है। जहाँ पहुँचकर मनुष्य अनन्त दुःखका परित्याग करके अमृतत्वको प्राप्त कर लेता है ।।
इमं हि धर्ममास्थाय येऽपि स्युः पापयोनयः ।।
स्त्रियो वैश्याश्च शूद्राश्च प्राप्नुयुः परमां गतिम् ।
इस धर्मका आश्रय लेकर पापयोनिमें उत्पन्न हुए पुरुष तथा स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र भी परमगतिको प्राप्त कर लेते हैं ।।
किं पुनर्ब्राह्मणो विद्वान् क्षत्रियो वा बहुश्रुतः ।।
न चाप्यक्षीणपापस्य ज्ञानं भवति देहिनः ।
ज्ञानोपलब्धिर्भवति कृतकृत्यो यदा भवेत् ।।
फिर जो विद्वान् ब्राह्मण अथवा बहुश्रुत क्षत्रिय है, उसकी सद्गतिके विषयमें क्या कहना है। जिस देहधारीके पाप क्षीण नहीं हुए हैं, उसे ज्ञान नहीं होता। जब मनुष्यको ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है, तब वह कृतकृत्य हो जाता है ।।
उपलभ्य तु विज्ञानं ज्ञानं वाप्यनसूयकः ।
तथैव वर्तेद् गुरुषु भूयांसं वा समाहितः ।।
ज्ञान या विज्ञानको प्राप्त कर लेनेपर भी दोषदृष्टिसे रहित हो गुरुजनोंके प्रति पहले ही-जैसा सद्भाव रखे। अथवा एकाग्रचित्त होकर पहलेसे भी अधिक श्रद्धाभाव रखे ।।
यथावमन्येत गुरुं तथा तेषु प्रवर्त्तते ।
व्यर्थमस्य श्रुतं भवति ज्ञानमज्ञानतां व्रजेत् ।।
शिष्य जिस तरह गुरुका अपमान करता है, उसी प्रकार गुरु भी शिष्योंके प्रति बर्ताव करता है। अर्थात् शिष्यको अपने कर्मके अनुसार फल मिलता है। गुरुका अपमान करनेवाले शिष्यका किया हुआ वेद-शास्त्रोंका अध्ययन व्यर्थ हो जाता है। उसका सारा ज्ञान अज्ञानरूपमें परिणत हो जाता है ।।
गतिं चाप्यशुभां गच्छेन्निरयाय न संशयः ।