महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 848, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंऊर्ध्वं नाधो न तिर्यक् च न किंचिदभिकामयेत् ।।
वस्तुओंके स्वरूपके विषयमें विचार करके उनके तत्त्वको जाने। सदा सत्यमें अनुरक्त रहे। ऊपर, नीचे या अगल-बगलमें कहीं किसी वस्तुकी कामना न करे ।।
एवं संचरमाणस्तु यतिधर्मं यथाविधि ।
कालस्य परिणामात् तु यथा पक्वफलं तथा ।।
स विसृज्य स्वकं देहं प्रविशेद् ब्रह्म शाश्वतम् ।
इस प्रकार विधिपूर्वक यतिधर्मका पालन करनेवाला संन्यासी कालके परिणामवश अपने शरीरको पके हुए फलकी भाँति त्यागकर सनातन ब्रह्ममें प्रविष्ट हो जाता है ।।
निरामयमनाद्यन्तं गुणसौम्यमचेतनम् ।।
निरक्षरमबीजं च निरिन्द्रियमजं तथा ।
अजय्यमक्षरं यत् तदभेद्यं सूक्ष्ममेव च ।।
निर्गुणं च प्रकृतिमन्निर्विकारं च सर्वशः ।
भूतभव्यभविष्यस्य कालस्य परमेश्वरम् ।।
अव्यक्तं पुरुषं क्षेत्रमानन्त्याय प्रपद्यते ।
वह ब्रह्म निरामय, अनादि, अनन्त, सौम्यगुणसे युक्त, चेतनासे ऊपर उठा हुआ, अनिर्वचनीय, बीजहीन, इन्द्रियातीत, अजन्मा, अजेय, अविनाशी, अभेद्य, सूक्ष्म, निर्गुण, सर्वशक्तिमान्, निर्विकार, भूत, वर्तमान और भविष्य कालका स्वामी तथा परमेश्वर है। वही अव्यक्त, अन्तर्यामी पुरुष और क्षेत्र भी है। जो उसे जान लेता है, वह मोक्षको प्राप्त कर लेता है ।।
एवं स भिक्षुर्निर्वाणं प्राप्नुयाद् दग्धकिल्बिषः ।।
इहस्थो देहमुत्सृज्य नीडं शकुनिवद् यथा ।
इस प्रकार वह भिक्षु घोंसला छोड़कर उड़ जानेवाले पक्षीकी भाँति यहीं इस शरीरको त्यागकर समस्त पापोंको ज्ञानाग्निसे दग्ध कर देनेके कारण निर्वाण—मोक्ष प्राप्त कर लेता है ।।
यत् करोति यदश्नाति शुभं वा यदि वाशुभम् ।।
नाकृतं भुज्यते कर्म न कृतं नश्यते फलम् ।
मनुष्य जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसका वैसा ही फल भोगता है। बिना किये हुए कर्मका फल किसीको नहीं भोगना पड़ता है तथा किये हुए कर्मका फल भोगके बिना नष्ट नहीं होता है ।।
शुभकर्मसमाचारः शुभमेवाप्नुते फलम् ।।
तथाशुभसमाचारो ह्यशुभं समवाप्नुते ।
जो शुभ कर्मका आचरण करता है, उसे शुभ फलकी ही प्राप्ति होती है और जो अशुभ कर्म करता है, वह अशुभ फलका ही भागी होता है ।।