भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 857, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 857

इस प्रकार यह सरोवर खोदनेका उत्तम फल बताया गया है। इसके बाद वृक्ष लगानेका फल भली प्रकार बताऊँगा ।।

स्थावराणां तु भूतानां जातयः षट् प्रकीर्तिताः । वृक्षगुल्मलतावल्ल्यस्त्वक्सारतृणवीरुधः ।। एता जात्यस्तु वृक्षाणामेषां रोपगुणास्त्विमे । स्थावर भूतोंकी छः जातियाँ बतायी गयी हैं—वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली, त्वक्सार तथा तृण, वीरुध—ये वृक्षोंकी जातियाँ हैं। इनके लगानेसे ये-ये गुण बताये गये हैं ।।

पनसाम्रादयो वृक्षा गुल्मा मन्दारपूर्वकाः ।। नागिकामलियावल्ल्यो मालतीत्यादिका लताः । वेणुक्रमुकत्वक्साराः सस्यानि तृणजातयः ।। कटहल और आम आदि वृक्ष जातिके अन्तर्गत हैं। मन्दार आदि गुल्म कोटिमें माने गये हैं। नागिका, मलिया आदि वल्लीके अन्तर्गत हैं। मालती आदि लताएँ हैं। बाँस और सुपारी आदिके पेड़ त्वक्सार जातिके अन्तर्गत हैं। खेतमें जो घास और अनाज उगते हैं, वे सब तृण जातिमें अन्तर्भूत हैं ।।

कीर्तिश्च मानुषे लोके प्रेत्य चैव शुभं फलम् । लभ्यते नाकपृष्ठे च पितृभिश्च महीयते ।। देवलोकगतस्यापि नाम तस्य न नश्यति । अतीतानागतांश्चैव पितृवंशांश्च भारत ।। तारयेद् वृक्षरोपी तु तस्माद् वृक्षान् प्ररोपयेत् । भरतनन्दन! वृक्ष लगानेसे मनुष्यलोकमें कीर्ति बनी रहती है और मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें शुभ फलकी प्राप्ति होती है। वृक्ष लगानेवाला पुरुष पितरोंद्वारा भी सम्मानित होता है। देवलोकमें जानेपर भी उसका नाम नहीं नष्ट होता। वह अपने बीते हुए पूर्वजों और आनेवाली संतानोंको भी तार देता है। अतः वृक्ष अवश्य लगाने चाहिये ।।

तस्य पुत्रा भवन्त्येव पादपा नात्र संशयः ।। परलोकगतः स्वर्गे लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् । जिसके कोई पुत्र नहीं हैं, उसके भी वृक्ष ही पुत्र होते हैं; इसमें संशय नहीं है। वृक्ष लगानेवाला पुरुष परलोकमें जानेपर स्वर्गमें अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है ।।

पुष्पैः सुरगणान् वृक्षाः फलैश्चापि तथा पितॄन् ।। छायया चातिथिंस्तात पूजयन्ति महीरुहाः । तात! वृक्ष अपने फूलोंसे देवताओंका, फलोंसे पितरोंका तथा छायासे अतिथियोंका सदा पूजन करते रहते हैं ।।

किन्नरोरगरक्षांसि देवगन्धर्वमानवाः ।। तथा ऋषिगणाश्चैव संश्रयन्ते महीरुहान् ।