महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
इस प्रकार यह सरोवर खोदनेका उत्तम फल बताया गया है। इसके बाद वृक्ष लगानेका फल भली प्रकार बताऊँगा ।।
स्थावराणां तु भूतानां जातयः षट् प्रकीर्तिताः । वृक्षगुल्मलतावल्ल्यस्त्वक्सारतृणवीरुधः ।। एता जात्यस्तु वृक्षाणामेषां रोपगुणास्त्विमे । स्थावर भूतोंकी छः जातियाँ बतायी गयी हैं—वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली, त्वक्सार तथा तृण, वीरुध—ये वृक्षोंकी जातियाँ हैं। इनके लगानेसे ये-ये गुण बताये गये हैं ।।
पनसाम्रादयो वृक्षा गुल्मा मन्दारपूर्वकाः ।। नागिकामलियावल्ल्यो मालतीत्यादिका लताः । वेणुक्रमुकत्वक्साराः सस्यानि तृणजातयः ।। कटहल और आम आदि वृक्ष जातिके अन्तर्गत हैं। मन्दार आदि गुल्म कोटिमें माने गये हैं। नागिका, मलिया आदि वल्लीके अन्तर्गत हैं। मालती आदि लताएँ हैं। बाँस और सुपारी आदिके पेड़ त्वक्सार जातिके अन्तर्गत हैं। खेतमें जो घास और अनाज उगते हैं, वे सब तृण जातिमें अन्तर्भूत हैं ।।
कीर्तिश्च मानुषे लोके प्रेत्य चैव शुभं फलम् । लभ्यते नाकपृष्ठे च पितृभिश्च महीयते ।। देवलोकगतस्यापि नाम तस्य न नश्यति । अतीतानागतांश्चैव पितृवंशांश्च भारत ।। तारयेद् वृक्षरोपी तु तस्माद् वृक्षान् प्ररोपयेत् । भरतनन्दन! वृक्ष लगानेसे मनुष्यलोकमें कीर्ति बनी रहती है और मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें शुभ फलकी प्राप्ति होती है। वृक्ष लगानेवाला पुरुष पितरोंद्वारा भी सम्मानित होता है। देवलोकमें जानेपर भी उसका नाम नहीं नष्ट होता। वह अपने बीते हुए पूर्वजों और आनेवाली संतानोंको भी तार देता है। अतः वृक्ष अवश्य लगाने चाहिये ।।
तस्य पुत्रा भवन्त्येव पादपा नात्र संशयः ।। परलोकगतः स्वर्गे लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् । जिसके कोई पुत्र नहीं हैं, उसके भी वृक्ष ही पुत्र होते हैं; इसमें संशय नहीं है। वृक्ष लगानेवाला पुरुष परलोकमें जानेपर स्वर्गमें अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है ।।
पुष्पैः सुरगणान् वृक्षाः फलैश्चापि तथा पितॄन् ।। छायया चातिथिंस्तात पूजयन्ति महीरुहाः । तात! वृक्ष अपने फूलोंसे देवताओंका, फलोंसे पितरोंका तथा छायासे अतिथियोंका सदा पूजन करते रहते हैं ।।
किन्नरोरगरक्षांसि देवगन्धर्वमानवाः ।। तथा ऋषिगणाश्चैव संश्रयन्ते महीरुहान् ।
किन्नर, नाग, राक्षस, देव, गन्धर्व, मनुष्य तथा ऋषिगण भी वृक्षोंका आश्रय लेते हैं ।।
पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान् ।।
वृक्षदान् पुत्रवद् वृक्षाः तारयन्ति परत्र च ।
तस्मात् तटाके वृक्षा वै रोप्याः श्रेयोऽर्थिना सदा ।।
फल और फूलोंसे भरे हुए वृक्ष इस जगत्में मनुष्योंको तृप्त करते हैं। जो वृक्ष दान करते हैं, उनके वे वृक्ष परलोकमें पुत्रकी भाँति पार उतारते हैं। अतः कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सदा ही सरोवरके किनारे वृक्ष लगाना चाहिये ।।
पुत्रवत् परिरक्ष्याश्च पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः ।
तटाककृद् वृक्षरोपी इष्टयज्ञश्च यो द्विजः ।।
एते स्वर्गे महीयन्ते ये चान्ये सत्यवादिनः ।
वृक्ष लगाकर उनकी पुत्रोंकी भाँति रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि वे धर्मतः पुत्र माने गये हैं। जो तालाब बनवाता है और जो उसके किनारे वृक्ष लगाता है, जो द्विज यज्ञका अनुष्ठान करता है तथा दूसरे जो लोग सत्यभाषण करनेवाले हैं—वे सब-के-सब स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होते हैं ।।
तस्मात् तटाकं कुर्वीत आरामांश्चापि योजयेत् ।।
यजेच्च विविधैर्यज्ञैः सत्यं च विधिवद् वदेत् ।
इसलिये सरोवर खोदावे और उसके तटपर बगीचे भी लगावे। सदा नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करे और विधिपूर्वक सत्य बोले ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि छत्रोपानहदानप्रशंसा नाम षण्णवतितमोऽध्यायः ।। ९६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें छत्रदान और उपानहदानकी प्रशंसानामक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९६ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १७५ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १९७ १/२ श्लोक हैं)
गृहस्थधर्म, पञ्चयज्ञ-कर्मके विषयमें पृथ्वीदेवी और भगवान् श्रीकृष्णका संवाद
सप्तनवतितमोऽध्यायः
गृहस्थधर्म, पञ्चयज्ञ-कर्मके विषयमें पृथ्वीदेवी और भगवान् श्रीकृष्णका संवाद
युधिष्ठिर उवाच
गार्हस्थ्यं धर्ममखिलं प्रब्रूहि भरतर्षभ ।
ऋद्धिमाप्नोति किं कृत्वा मनुष्य इह पार्थिव ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— भरतश्रेष्ठ! पृथ्वीनाथ! अब आप मुझे गृहस्थ-आश्रमके सम्पूर्ण धर्मोंका उपदेश कीजिये। मनुष्य कौन-सा कर्म करके इहलोकमें समृद्धिका भागी होता है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तयिष्यामि पुरावृत्तं जनाधिप ।
वासुदेवस्य संवादं पृथिव्याश्चैव भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— नरेश्वर! भरतनन्दन! इस विषयमें भगवान् श्रीकृष्ण और पृथ्वीका संवादरूप एक प्राचीन वृत्तान्त बता रहा हूँ ॥ २ ॥
संस्तुत्य पृथिवीं देवीं वासुदेवः प्रतापवान् ।
पप्रच्छ भरतश्रेष्ठ मां त्वं यत् पृच्छसेऽद्य वै ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! प्रतापी भगवान् श्रीकृष्णने पृथ्वी-देवीकी स्तुति करके उनसे यही बात पूछी थी, जो आज तुम मुझसे पूछते हो ॥ ३ ॥
वासुदेव उवाच
गार्हस्थ्यं धर्ममाश्रित्य मया वा मद्विधेन वा ।
किमवश्यं धरे कार्यं किं वा कृत्वा कृतं भवेत् ॥ ४ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने पूछा— वसुन्धरे! मुझको या मेरे-जैसे किसी दूसरे मनुष्यको गार्हस्थ्य-धर्मका आश्रय लेकर किस कर्मका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये? क्या करनेसे गृहस्थको सफलता मिलती है? ॥ ४ ॥
पृथिव्युवाच
ऋषयः पितरो देवा मनुष्याश्चैव माधव ।
इज्याश्चैवार्चनीयाश्च यथा चैव निबोध मे ॥ ५ ॥
पृथ्वीने कहा— माधव! गृहस्थ पुरुषको सदा ही देवताओं, पितरों, ऋषियों और अतिथियोंका पूजन एवं सत्कार करना चाहिये। यह सब कैसे करना चाहिये! सो बता रही
हूँ; सुनिये ॥ ५ ॥
सदा यज्ञेन देवाश्च सदाऽऽतिथ्येन मानुषाः ।
छन्दतश्च यथा नित्यमर्हान् भुञ्जीत नित्यशः ॥ ६ ॥
प्रतिदिन यज्ञ-होमके द्वारा देवताओंका, अतिथि-सत्कारके द्वारा मनुष्योंका (श्राद्ध-तर्पण करके पितरोंका) तथा वेदोंका नित्य स्वाध्याय करके पूजनीय ऋषि-महर्षियोंका यथाविधि पूजन और सत्कार करना चाहिये। इसके बाद नित्य भोजन करना उचित है ॥ ६ ॥
तेन ह्यृषिगणाः प्रीता भवन्ति मधुसूदन ।
नित्यमग्निं परिचरेदभुक्त्वा बलिकर्म च ॥ ७ ॥
कुर्यात् तथैव देवा वै प्रीयन्ते मधुसूदन ।
कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन च ॥ ८ ॥
पयोमूलफलैर्वापि पितॄणां प्रीतिमाहरन् ।
मधुसूदन! स्वाध्यायसे ऋषियोंको बड़ी प्रसन्नता होती है। प्रतिदिन भोजनके पहले ही अग्निहोत्र एवं बलिवैश्वदेव कर्म करे। इससे देवता संतुष्ट होते हैं। पितरोंकी प्रसन्नताके लिये प्रतिदिन अन्न, जल, दूध अथवा फल-मूलके द्वारा श्राद्ध करना उचित है ॥ ७-८ १/२ ॥
सिद्धान्नाद् वैश्वदेवं वै कुर्यादग्नौ यथाविधि ॥ ९ ॥
सिद्ध अन्न (तैयार हुई रसोई) मेंसे अन्न लेकर उसके द्वारा विधिपूर्वक बलिवैश्वदेव कर्म करना चाहिये ॥ ९ ॥
अग्नीषोमं वैश्वदेवं धान्वन्तरयमनन्तरम् ।
प्रजानां पतये चैव पृथग्घोमो विधीयते ॥ १० ॥
पहले अग्नि और सोमको, फिर विश्वेदेवोंको, तदनन्तर धन्वन्तरिको, तत्पश्चात् प्रजापतिको पृथक्-पृथक् आहुति देनेका विधान है ॥ १० ॥
तथैव चानुपूर्व्येण बलिकर्म प्रयोजयेत् ।
दक्षिणायां यमायेति प्रतीच्यां वरुणाय च ॥ ११ ॥
सोमाय चाप्युदीच्यां वै वास्तुमध्ये प्रजापतेः ।
धन्वन्तरेः प्रागुदीच्यां प्राच्यां शक्राय माधव ॥ १२ ॥
इसी प्रकार क्रमशः बलिकर्मका प्रयोग करे। माधव! दक्षिण दिशामें यमको, पश्चिममें वरुणको, उत्तर दिशामें सोमको, वास्तुके मध्यभागमें प्रजापतिको, ईशानकोणमें धन्वन्तरिको और पूर्वदिशामें इन्द्रको बलि समर्पित करे ॥ ११-१२ ॥
मनुष्येभ्य इति प्राहुर्बलिं द्वारि गृहस्य वै ।
मरुद्भ्यो दैवतेभ्यश्च बलिमन्तर्गृहे हरेत् ॥ १३ ॥
घरके दरवाजेपर सनकादि मनुष्योंके लिये बलि देनेका विधान है। मरुद्गणों तथा देवताओंको घरके भीतर बलि समर्पित करनी चाहिये ॥ १३ ॥
तथैव विश्वेदेवेभ्यो बलिमाकाशतो हरेत् । निशाचरेभ्यो भूतेभ्यो बलिं नक्तं तथा हरेत् ॥ १४ ॥ विश्वेदेवोंके लिये आकाशमें बलि अर्पित करे। निशाचरों और भूतोंके लिये रातमें बलि दे ॥ १४ ॥ एवं कृत्वा बलिं सम्यग् दद्याद् भिक्षां द्विजाय वै । अलाभे ब्राह्मणस्याग्नावग्रमुद्धृत्य निक्षिपेत् ॥ १५ ॥ इस प्रकार बलि समर्पण करके ब्राह्मणको विधिपूर्वक भिक्षा दे। यदि ब्राह्मण न मिले तो अन्नमेंसे थोड़ा-सा अग्रग्रास निकालकर उसका अग्निमें होम कर दे ॥ यदा श्राद्धं पितृभ्योऽपि दातुमिच्छेत मानवः । तदा पश्चात् प्रकुर्वीत निवृत्ते श्राद्धकर्मणि ॥ १६ ॥ पितॄन् संतर्पयित्वा तु बलिं कुर्याद् विधानतः । वैश्वदेवं ततः कुर्यात् पश्चाद् ब्राह्मणवाचनम् ॥ १७ ॥ जिस दिन पितरोंका श्राद्ध करनेकी इच्छा हो, उस दिन पहले श्राद्धकी क्रिया पूरी करे। उसके बाद पितरोंका तर्पण करके विधिपूर्वक बलिवैश्वदेव-कर्म करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको सत्कारपूर्वक भोजन करावे ॥ ततोऽन्नेन विशेषेण भोजयेदतिथीनपि । अर्चापूर्वं महाराज ततः प्रीणाति मानवान् ॥ १८ ॥ महाराज! इसके बाद विशेष अन्नके द्वारा अतिथियोंको भी सम्मानपूर्वक भोजन करावे। ऐसा करनेसे गृहस्थ पुरुष सम्पूर्ण मनुष्योंको संतुष्ट करता है ॥
गृहस्थ-धर्मके सम्बन्धमें श्रीकृष्णका पृथ्वीके साथ संवाद
गृहस्थ-धर्मके सम्बन्धमें श्रीकृष्णका पृथ्वीके साथ संवाद
अनित्यं हि स्थितो यस्मात् तस्मादतिथिरुच्यते ।
आचार्यस्थ पितुश्चैव सख्युपराप्तस्य चातिथेः ॥ १९ ॥
इदमस्ति गृहे मह्यमिति नित्यं निवेदयेत् ।
ते यद् वदेयुस्तत् कुर्यादिति धर्मो विधीयते ॥ २० ॥
जो नित्य अपने घरमें स्थित नहीं रहता, वह अतिथि कहलाता है। आचार्य, पिता, विश्वासपात्र मित्र और अतिथिसे सदा यह निवेदन करे कि ‘अमुक वस्तु मेरे घरमें मौजूद है, उसे आप स्वीकार करें।’ फिर वे जैसी आज्ञा दें वैसा ही करे। ऐसा करनेसे धर्मका पालन होता है ॥ १९-२० ॥
गृहस्थः पुरुषः कृष्ण शिष्टाशी च सदा भवेत् ।
राजर्त्विजं स्नातकं च गुरुं श्वशुरमेव च ॥ २१ ॥
अर्चयेन्मधुपर्केण परिसंवत्सरोषितान् ।
श्रीकृष्ण! गृहस्थ पुरुषको सदा यज्ञशिष्ट अन्नका ही भोजन करना चाहिये। राजा, ऋत्विज्, स्नातक, गुरु और श्वशुर—ये यदि एक वर्षके बाद घर आवें तो मधुपर्कसे इनकी पूजा करनी चाहिये ॥ २११/२ ॥ श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चावपेद् भुवि । वैश्वदेवं हि नामैतत् सायंप्रातर्विधीयते ॥ २२ ॥ कुत्तों, चाण्डालों और पक्षियोंके लिये भूमिपर अन्न रख देना चाहिये। यह वैश्वदेव नामक कर्म है। इसका सायंकाल और प्रातःकाल अनुष्ठान किया जाता है ॥ एतांस्तु धर्मान् गार्हस्थ्यान् यः कुर्यादनसूयकः । स इहर्षिवरान् प्राप्य प्रेत्य लोके महीयते ॥ २३ ॥ जो मनुष्य दोषदृष्टिका परित्याग करके इन गृहस्थोचित धर्मोंका पालन करता है, उसे इस लोकमें ऋषि-महर्षियोंका वरदान प्राप्त होता है और मृत्युके पश्चात् वह पुण्यलोकोंमें सम्मानित होता है ॥ २३ ॥
भीष्म उवाच
इति भूमेर्वचः श्रुत्वा वासुदेवः प्रतापवान् । तथा चकार सततं त्वमप्येवं सदाचर ॥ २४ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! पृथ्वी देवीके ये वचन सुनकर प्रतापी भगवान् श्रीकृष्णने उन्हींके अनुसार गृहस्थधर्मोंका विधिवत् पालन किया। तुम भी सदा इन धर्मोंका अनुष्ठान करते रहो ॥ २४ ॥ एतद् गृहस्थधर्मं त्वं चेष्टमानो जनाधिप । इहलोके यशः प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्स्यसि ॥ २५ ॥ जनेश्वर! इस गृहस्थ-धर्मका पालन करते रहनेपर तुम इहलोकमें सुयश और परलोकमें स्वर्ग प्राप्त कर लोगे ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि बलिदानविधिर्नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बलिदानविधि नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९७ ॥
तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य
अष्टनवतितमोऽध्यायः
तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य
युधिष्ठिर उवाच
आलोकदानं नामैतत् कीदृशं भरतर्षभ ।
कथमेतत् समुत्पन्नं फलं वा तद् ब्रवीहि मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—भरतश्रेष्ठ! यह जो दीपदान नामक कर्म है, यह कैसे किया जाता है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? अथवा इसका फल क्या है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
मनोः प्रजापतेर्वादं सुवर्णस्य च भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा—भारत! इस विषयमें प्रजापति मनु और सुवर्णके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥
तपस्वी कश्चिदभवत् सुवर्णो नाम भारत ।
वर्णतो हेमवर्णः स सुवर्ण इति पप्रथे ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! सुवर्णनामसे प्रसिद्ध एक तपस्वी ब्राह्मण थे। उनके शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान थी। इसीलिये वे सुवर्णनामसे विख्यात हुए थे ॥ ३ ॥
कुलशीलगुणोपेतः स्वाध्याये च परंगतः ।
बहून् सुवंशप्रभवान् समतीतः स्वकैर्गुणैः ॥ ४ ॥
वे उत्तम कुल, शील और गुणसे सम्पन्न थे। स्वाध्यायमें भी उनकी बड़ी ख्याति थी। वे अपने गुणोंद्वारा उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए बहुत-से श्रेष्ठ पुरुषोंकी अपेक्षा आगे बढ़े हुए थे ॥ ४ ॥
स कदाचिन्मनुं विप्रो ददर्शोपससर्प च ।
कुशलप्रश्नमन्योन्यं तौ चोभौ तत्र चक्रतुः ॥ ५ ॥
एक दिन उन ब्राह्मणदेवताने प्रजापति मनुको देखा। देखकर वे उनके पास चले गये। फिर तो वे दोनों एक-दूसरेसे कुशल-समाचार पूछने लगे ॥ ५ ॥
ततस्तौ सत्यसंकल्पौ मेरौ काञ्चनपर्वते ।
रमणीये शिलापृष्ठे सहितौ संन्यषीदताम् ॥ ६ ॥
तदनन्तर वे दोनों सत्यसंकल्प महात्मा सुवर्णमय पर्वत मेरुके एक रमणीय शिलापृष्ठपर एक साथ बैठ गये ॥ ६ ॥
तत्र तौ कथयन्तौ स्तां कथा नानाविधाश्रयाः । ब्रह्मर्षिदेवदैत्यानां पुराणानां महात्मनाम् ॥ ७ ॥ वहाँ वे दोनों ब्रह्मर्षियों, देवताओं, दैत्यों तथा प्राचीन महात्माओंके सम्बन्धमें नाना प्रकारकी कथा-वार्ता करने लगे ॥ ७ ॥
सुवर्णस्त्वब्रवीद् वाक्यं मनुं स्वायम्भुवं प्रति । हितार्थं सर्वभूतानां प्रश्नं मे वक्तुमर्हसि ॥ ८ ॥ सुमनोभिर्यदिज्यन्ते दैवतानि प्रजेश्वर । किमेतत् कथमुत्पन्नं फलं योगं च शंस मे ॥ ९ ॥ उस समय सुवर्णने स्वायम्भुव मनुसे कहा—'प्रजापते! मैं एक प्रश्न करता हूँ, आप समस्त प्राणियोंके हितके लिये मुझे उसका उत्तर दीजिये। फूलोंसे जो देवताओंकी पूजा की जाती है, यह क्या है? इसका प्रचलन कैसे हुआ? इसका फल क्या है और इसका उपयोग क्या है? यह सब मुझे बताइये' ॥ ८-९ ॥
मनुरुवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । शुक्रस्य च बलेश्चैव संवादं वै महात्मनोः ॥ १० ॥ **मनुजीने कहा—**मुने! इस विषयमें विज्ञजन शुक्राचार्य और बलि—इन दोनों महात्माओंके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १० ॥
बलेर्वैरोचनस्येह त्रैलोक्यमनुशासतः । समीपमाजगामाशु शुक्रो भृगुकुलोद्वहः ॥ ११ ॥ पहलेकी बात है, विरोचनकुमार बलि तीनों लोकोंका शासन करते थे। उन दिनों भृगुकुलभूषण शुक्र शीघ्रतापूर्वक उनके पास आये ॥ ११ ॥
तमर्घ्यादिभिरभ्यर्च्य भार्गवं सोऽसुराधिपः । निषसादासने पश्चाद् विधिवद् भूरिदक्षिणः ॥ १२ ॥ पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले असुरराज बलिने भृगुपुत्र शुक्राचार्यको अर्घ्य आदि देकर उनकी विधिवत् पूजा की और जब वे आसनपर बैठ गये, तब बलि भी अपने सिंहासनपर आसीन हुए ॥ १२ ॥
कथेयमभवत् तत्र त्वया या परिकीर्तिता । सुमनोधूपदीपानां सम्प्रदाने फलं प्रति ॥ १३ ॥ ततः पप्रच्छ दैत्येन्द्रः कवीन्द्रं प्रश्नमुत्तमम् ॥ १४ ॥ वहाँ उन दोनोंमें यही बातचीत हुई, जिसे तुमने प्रस्तुत किया है। देवताओंको फूल, धूप और दीप देनेसे क्या फल मिलता है, यही उनकी वार्ताका विषय था। उस समय दैत्यराज बलिने कविवर शुक्रके सामने यह उत्तम प्रश्न उपस्थित किया ॥ १३-१४ ॥
बलिरुवाच सुमनोधूपदीपानां किं फलं ब्रह्मवित्तम । प्रदानस्य द्विजश्रेष्ठ तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १५ ॥ **बलिने पूछा—**ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! द्विजशिरोमणे! फूल, धूप और दीपदान करनेका क्या फल है? यह बतानेकी कृपा करें ॥ १५ ॥
शुक्र उवाच तपः पूर्वं समुत्पन्नं धर्मस्तस्मादनन्तरम् । एतस्मिन्नन्तरे चैव वीरुदोषध्य एव च ॥ १६ ॥ **शुक्राचार्यने कहा—**राजन्! पहले तपस्याकी उत्पत्ति हुई है, तदनन्तर धर्मकी। इसी बीचमें लता और ओषधियोंका प्रादुर्भाव हुआ है ॥ १६ ॥
सोमस्यात्मा च बहुधा सम्भूतः पृथिवीतले । अमृतं च विषं चैव ये चान्ये तृणजातयः ॥ १७ ॥ इस भूतलपर अनेक प्रकारकी सोमलता प्रकट हुई। अमृत, विष तथा दूसरी-दूसरी जातिके तृणोंका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १७ ॥
अमृतं मनसः प्रीतिं सद्यस्तृप्तिं ददाति च । मनो ग्लपयते तीव्रं विषं गन्धेन सर्वशः ॥ १८ ॥ अमृत वह है, जिसे देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है। जो तत्काल तृप्ति प्रदान करता है और विष वह है जो अपनी गन्धसे चित्तमें सर्वथा तीव्र ग्लानि पैदा करता है ॥ १८ ॥
अमृतं मंगलं विद्धि महद्विषममंगलम् । ओषध्यो ह्यमृतं सर्वा विषं तेजोऽग्निसम्भवम् ॥ १९ ॥ अमृतको मंगलकारी जानो और विष महान् अमंगल करनेवाला है। जितनी ओषधियाँ हैं, वे सब-की-सब अमृत मानी गयी हैं और विष अग्निजनित तेज है ॥ १९ ॥
मनो ह्लादयते यस्माच्छ्रियं चापि दधाति च । तस्मात् सुमनसः प्रोक्ता नरैः सुकृतकर्मभिः ॥ २० ॥ फूल मनको आह्लाद प्रदान करता है और शोभा एवं सम्पत्तिका आधान करता है, इसलिये पुण्यात्मा मनुष्योंने उसे सुमन कहा है ॥ २० ॥
देवताभ्यः सुमनसो यो ददाति नरः शुचिः । तस्य तुष्यन्ति वै देवास्तुष्टाः पुष्टिं ददत्यपि ॥ २१ ॥ जो मनुष्य पवित्र होकर देवताओंको फूल चढ़ाता है, उसके ऊपर सब देवता संतुष्ट होते और उसके लिये पुष्टि प्रदान करते हैं ॥ २१ ॥
यं यमुद्दिश्य दीयेरन् देवं सुमनसः प्रभो । मंगलार्थं स तेनास्य प्रीतो भवति दैत्यप ॥ २२ ॥
प्रभो! दैत्यराज! जिस-जिस देवताके उद्देश्यसे फूल दिये जाते हैं, वह उस पुष्पदानसे दातापर बहुत प्रसन्न होता और उसके मंगलके लिये सचेष्ट रहता है ।। २२ ।। ज्ञेयास्तूग्राश्च सौम्याश्च तेजस्विन्यश्च ताः पृथक् । ओषध्यो बहुवीर्या हि बहुरूपास्तथैव च ।। २३ ।। उग्रा, सौम्या, तेजस्विनी, बहुवीर्या और बहुरूपा—अनेक प्रकारकी ओषधियाँ होती हैं। उन सबको जानना चाहिये ।। २३ ।। यज्ञियानां च वृक्षाणामयज्ञीयान् निबोध मे । आसुराणि च माल्यानि दैवतेभ्यो हितानि च ।। २४ ।। अब यज्ञसम्बन्धी तथा अयज्ञोपयोगी वृक्षोंका वर्णन सुनो। असुरोंके लिये हितकर तथा देवताओंके लिये प्रिय जो पुष्पमालाएँ होती हैं, उनका परिचय सुनो ।। रक्षसामुरगाणां च यक्षाणां च तथा प्रियाः । मनुष्याणां पितॄणां च कान्तायास्त्वनुपूर्वशः ।। २५ ।। राक्षस, नाग, यक्ष, मनुष्य और पितरोंको प्रिय एवं मनोरम लगनेवाली ओषधियोंका भी वर्णन करता हूँ, सुनो ।। २५ ।। वन्या ग्राम्याश्चैह तथा कृष्टोप्ताः पर्वताश्रयाः । अकण्टकाः कण्टकिनो गन्धरूपरसान्विताः ।। २६ ।। फूलोंके बहुत-से वृक्ष गाँवोंमें होते हैं और बहुत-से जंगलोंमें। बहुतेरे वृक्ष जमीनको जोतकर क्यारियोंमें लगाये जाते हैं और बहुत-से पर्वत आदिपर अपने-आप पैदा होते हैं। इन वृक्षोंमें कुछ तो काँटेदार होते हैं और कुछ बिना काँटोंके। इन सबमें रूप, रस और गन्ध विद्यमान रहते हैं ।। २६ ।। द्विविधो हि स्मृतो गन्ध इष्टोऽनिष्टश्च पुष्पजः । इष्टगन्धानि देवानां पुष्पाणीति विभावय ।। २७ ।। फूलोंकी गन्ध दो प्रकारकी होती है—अच्छी और बुरी। अच्छी गन्धवाले फूल देवताओंको प्रिय होते हैं। इस बातको ध्यानमें रखो ।। २७ ।। अकण्टकानां वृक्षाणां श्वेतप्रायाश्च वर्णतः । तेषां पुष्पाणि देवानामिष्टानि सततं प्रभो ।। २८ ।। (पद्मं च तुलसी जातिरपि सर्वेषु पूजिता ।) प्रभो! जिन वृक्षोंमें काँटे नहीं होते हैं, उनमें जो अधिकांश श्वेतवर्णवाले हैं, उन्हींके फूल देवताओंको सदैव प्रिय हैं। कमल, तुलसी और चमेली—ये सब फूलोंमें अधिक प्रशंसित हैं ।। २८ ।। जलजानि च माल्यानि पद्मादीनि च यानि वै । गन्धर्वनागयक्षेभ्यस्तानि दद्याद् विचक्षणः ।। २९ ।।
जलसे उत्पन्न होनेवाले जो कमल-उत्पल आदि पुष्प हैं, उन्हें विद्वान् पुरुष गन्धर्वों, नागों और यक्षोंको समर्पित करे ॥ २९ ॥
ओषध्यो रक्तपुष्पाश्च कटुकाः कण्टकान्विताः ।
शत्रूणामभिचारार्थमाथर्वेषु निदर्शिताः ॥ ३० ॥
अथर्ववेदमें बतलाया गया है कि शत्रुओंका अनिष्ट करनेके लिये किये जानेवाले अभिचार कर्ममें लाल फूलोंवाली कड़वी और कण्टकाकीर्ण ओषधियोंका उपयोग करना चाहिये ॥ ३० ॥
तीक्ष्णवीर्यास्तु भूतानां दुरालम्भाः सकण्टकाः ।
रक्तभूयिष्ठवर्णाश्च कृष्णाश्चैवोपहारयेत् ॥ ३१ ॥
जिन फूलोंमें काँटे अधिक हों, जिनका हाथसे स्पर्श करना कठिन जान पड़े, जिनका रंग अधिकतर लाल या काला हो तथा जिनकी गन्धका प्रभाव तीव्र हो, ऐसे फूल भूत-प्रेतोंके काम आते हैं। अतः उनको वैसे ही फूल भेंट करने चाहिये ॥ ३१ ॥
मनोहृदयनन्दिन्यो विशेषमधुराश्च याः ।
चारुरूपाः सुमनसो मानुषाणां स्मृता विभो ॥ ३२ ॥
प्रभो! मनुष्योंको तो वे ही फूल प्रिय लगते हैं, जिनका रूप-रंग सुन्दर और रस विशेष मधुर हो, तथा जो देखनेपर हृदयको आनन्ददायी जान पड़ें ॥ ३२ ॥
न तु श्मशानसम्भूता देवतायतननोद्भवाः ।
संनयेत् पुष्टियुक्तेषु विवाहेषु रहःसु च ॥ ३३ ॥
श्मशान तथा जीर्ण-शीर्ण देवालयोंमें पैदा हुए फूलोंका पौष्टिक कर्म, विवाह तथा एकान्त विहारमें उपयोग नहीं करना चाहिये ॥ ३३ ॥
गिरिसानुरुहाः सौम्या देवानामुपपादयेत् ।
प्रोक्षिताऽभ्युक्षिताः सौम्या यथायोग्यं यथास्मृति ॥ ३४ ॥
पर्वतोंके शिखरपर उत्पन्न हुए सुन्दर और सुगन्धित पुष्पोंको धोकर अथवा उनपर जलके छींटे देकर धर्मशास्त्रोंमें बताये अनुसार उन्हें यथायोग्य देवताओंपर चढ़ाना चाहिये ॥ ३४ ॥
गन्धेन देवास्तुष्यन्ति दर्शनाद् यक्षराक्षसाः ।
नागाः समुपभोगेन त्रिभिरेतैस्तु मानुषाः ॥ ३५ ॥
देवता फूलोंकी सुगन्धसे, यक्ष और राक्षस उनके दर्शनसे, नागगण उनका भलीभाँति उपभोग करनेसे और मनुष्य उनके दर्शन, गन्ध एवं उपभोग तीनोंसे ही संतुष्ट होते हैं ॥ ३५ ॥
सद्यः प्रीणाति देवान् वै ते प्रीता भावयन्त्युत ।
संकल्पसिद्धा मर्त्यानामीप्सितैश्च मनोरमैः ॥ ३६ ॥
फूल चढ़ानेसे मनुष्य देवताओंको तत्काल संतुष्ट करता है और संतुष्ट होकर वे सिद्धसंकल्प देवता मनुष्योंको मनोवांछित एवं मनोरम भोग देकर उनकी भलाई करते हैं ॥ ३६ ॥
प्रीताः प्रीणन्ति सततं मानिता मानयन्ति च ।
अवज्ञातावधूताश्च निर्दहन्त्यधमान् नरान् ॥ ३७ ॥
देवताओंको यदि सदा संतुष्ट और सम्मानित किया जाता है तो वे भी मनुष्योंको संतोष एवं सम्मान देते हैं तथा यदि उनकी अवज्ञा एवं अवहेलना की गयी तो वे अवज्ञा करनेवाले नीच मनुष्यको अपनी क्रोधाग्निसे भस्म कर डालते हैं ॥ ३७ ॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि धूपदानविधेः फलम् ।
धूपांश्च विविधान् साधूनसाधूंश्च निबोध मे ॥ ३८ ॥
इसके बाद अब मैं धूपदानकी विधिका फल बताऊँगा। धूप भी अच्छे और बुरे कई तरहके होते हैं। उनका वर्णन मुझसे सुनो ॥ ३८ ॥
निर्यासाः सारिणश्चैव कृत्रिमाश्चैव ते त्रयः ।
इष्टोऽनिष्टो भवेद् गंधस्तन्मे विस्तरशः शृणु ॥ ३९ ॥
धूपके मुख्यतः तीन भेद हैं—निर्यास, सारी और कृत्रिम। इन धूपोंकी गंध भी अच्छी और बुरी दो प्रकारकी होती है। ये सब बातें मुझसे विस्तारपूर्वक सुनो ॥ ३९ ॥
निर्यासाः सल्लकीवर्ज्या देवानां दयिताऽस्तु ते ।
गुग्गुलुः प्रवरस्तेषां सर्वेषामिति निश्चयः ॥ ४० ॥
वृक्षोंके रस (गोंद) को निर्यास कहते हैं, सल्लकीनामक वृक्षके सिवा अन्य वृक्षोंसे प्रकट हुए निर्यासमय धूप देवताओंको बहुत प्रिय होते हैं। उनमें भी गुग्गुल सबसे श्रेष्ठ है। ऐसा मनीषी पुरुषोंका निश्चय है ॥ ४० ॥
अगुरुः सारिणां श्रेष्ठो यक्षराक्षसभोगिनाम् ।
दैत्यानां सल्लकीयश्च काङ्क्षतो यश्च तद्विधः ॥ ४१ ॥
जिन काष्ठोंको आगमें जलानेपर सुगंध प्रकट होती है, उन्हें सारी धूप कहते हैं। इनमें अगुरुकी प्रधानता है। सारी धूप विशेषतः यक्ष, राक्षस और नागोंको प्रिय होते हैं। दैत्य लोग सल्लकी तथा उसी तरह अन्य वृक्षोंकी गोंदका बना हुआ धूप पसंद करते हैं ॥ ४१ ॥
अथ सर्जरसादीनां गंधैः पार्थिव दारवैः ।
फाणितासवसंयुक्तैर्मनुष्याणां विधीयते ॥ ४२ ॥
पृथ्वीनाथ! राल आदिके सुगन्धित चूर्ण तथा सुगन्धित काष्ठौषधियोंके चूर्णको घी और शक्करसे मिश्रित करके जो अष्टगंध आदि धूप तैयार किया जाता है, वही कृत्रिम है। विशेषतः वही मनुष्योंके उपयोगमें आता है ॥ ४२ ॥
देवदानवभूतानां सद्यस्तुष्टिकरः स्मृतः ।
येऽन्ये वैहारिकास्तत्र मानुषाणामिति स्मृताः ॥ ४३ ॥
वैसा धूप देवताओं, दानवों और भूतोंके लिये भी तत्काल संतोष प्रदान करनेवाला माना गया है। इनके सिवा विहार (भोग-विलास) के उपयोगमें आनेवाले और भी अनेक प्रकारके धूप हैं, जो केवल मनुष्योंके व्यवहारमें आते हैं ॥ ४३ ॥
य एवोक्ताः सुमनसां प्रदाने गुणहेतवः ।
धूपेष्वपि परिज्ञेयास्त एव प्रीतिवर्धनाः ॥ ४४ ॥
देवताओंको पुष्पदान करनेसे जो गुण या लाभ बताये गये हैं, वे ही धूप निवेदन करनेसे भी प्राप्त होते हैं। ऐसा जानना चाहिये। धूप भी देवताओंकी प्रसन्नता बढ़ानेवाले हैं ॥ ४४ ॥
दीपदाने प्रवक्ष्यामि फलयोगमनुत्तमम् ।
यथा येन यदा चैव प्रदेया यादृशाश्च ते ॥ ४५ ॥
अब मैं दीप-दानका परम उत्तम फल बताऊँगा। कब किस प्रकार किसके द्वारा किसके दीप दिये जाने चाहिये, यह सब बताता हूँ, सुनो ॥ ४५ ॥
ज्योतिस्तेजः प्रकाशं वाप्यूर्ध्वगं चापि वर्ण्यते ।
प्रदानं तेजसां तस्मात् तेजो वर्धयते नृणाम् ॥ ४६ ॥
दीपक ऊर्ध्वगामी तेज है, वह कान्ति और कीर्तिका विस्तार करनेवाला बताया जाता है। अतः दीप या तेजका दान मनुष्योंके तेजकी वृद्धि करता है ॥ ४६ ॥
अन्धन्तमस्तमिस्रं च दक्षिणायनमेव च ।
उत्तरायणमेतस्माज्ज्योतिर्दानं प्रशस्यते ॥ ४७ ॥
अंधकार अंधतामिस्र नामक नरक है। दक्षिणायन भी अंधकारसे ही आच्छन्न रहता है। इसके विपरीत उत्तरायण प्रकाशमय है। इसलिये वह श्रेष्ठ माना गया है। अतः अन्धकारमय नरककी निवृत्तिके लिये दीपदानकी प्रशंसा की गयी है ॥ ४७ ॥
यस्मादूर्ध्वगमेतत् तु तमसश्चैव भेषजम् ।
तस्मादूर्ध्वगतेर्दाता भवेदत्रेति निश्चयः ॥ ४८ ॥
दीपककी शिखा ऊर्ध्वगामिनी होती है। वह अंधकाररूपी रोगको दूर करनेकी दवा है। इसलिये जो दीपदान करता है, उसे निश्चय ही ऊर्ध्वगतिकी प्राप्ति होती है ॥ ४८ ॥
देवास्तेजस्विनो ह्यस्मात् प्रभावन्तः प्रकाशकाः ।
तामसा राक्षसाश्चैव तस्माद् दीपः प्रदीयते ॥ ४९ ॥
देवता तेजस्वी, कांतिमान् और प्रकाश फैलानेवाले होते हैं और राक्षस अंधकारप्रिय होते हैं; इसलिये देवताओंकी प्रसन्नताके लिये दीपदान किया जाता है ॥
आलोकदानाच्चक्षुष्मान् प्रभावयुक्तो भवेन्नरः ।
तान् दत्त्वा नोपहिंसेत न हरेन्नोपनाशयेत् ॥ ५० ॥
दीपदान करनेसे मनुष्यके नेत्रोंका तेज बढ़ता है और वह स्वयं भी तेजस्वी होता है। दान करनेके पश्चात् उन दीपकोंको न तो बुझावे, न उठाकर अन्यत्र ले जाय और न नष्ट ही
करे ॥ ५० ॥ दीपहर्ता भवेदनन्धस्तमोगतिरसुप्रभः । दीपप्रदः स्वर्गलोके दीपमालेव राजते ॥ ५१ ॥ दीपक चुरानेवाला मनुष्य अंधा और श्रीहीन होता है तथा मरनेके बाद नरकमें पड़ता है, किंतु जो दीपदान करता है, वह स्वर्गलोकमें दीपमालाकी भाँति प्रकाशित होता है ॥ ५१ ॥ हविषा प्रथमः कल्पो द्वितीयश्चौषधीर सैः । वसामेदोऽस्थिनिर्यासैर्न कार्यः पुष्टिमिच्छता ॥ ५२ ॥ घीका दीपक जलाकर दान करना प्रथम श्रेणीका दीप-दान है। ओषधियोंके रस अर्थात् तिल-सरसों आदिके तेलसे जलाकर किया हुआ दीपदान दूसरी श्रेणीका है। जो अपने शरीरकी पुष्टि चाहता हो—उसे चर्बी, मेदा और हड्डियोंसे निकाले हुए तेलके द्वारा कदापि दीपक नहीं जलाना चाहिये ॥ ५२ ॥ गिरिप्रपाते गहने चैत्यस्थाने चतुष्पथे । (गोब्राह्मणालये दुर्गे दीपो भूतिप्रदः शुचिः ।) दीपदानं भवेन्नित्यं य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ ५३ ॥ जो अपने कल्याणकी इच्छा रखता हो, उसे प्रतिदिन पर्वतीय झरनेके पास, वनमें, देवमंदिरमें, चौराहोंपर, गोशालामें, ब्राह्मणके घरमें तथा दुर्गम स्थानमें प्रतिदिन दीप-दान करना चाहिये। उक्त स्थानोंमें दिया हुआ पवित्र दीप ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला होता है ॥ कुलोद्योतो विशुद्धात्मा प्रकाशत्वं च गच्छति । ज्योतिषां चैव सालोक्यं दीपदाता नरः सदा ॥ ५४ ॥ दीप-दान करनेवाला पुरुष अपने कुलको उद्दीप्त करनेवाला, शुद्धचित्त तथा श्रीसम्पन्न होता है और अंतमें वह प्रकाशमय लोकोंमें जाता है ॥ ५४ ॥ बलिकर्मसु वक्ष्यामि गुणान् कर्मफलोदयान् । देवयक्षोरगनॄणां भूतानामथ रक्षसाम् ॥ ५५ ॥ अब मैं देवताओं, यक्षों, नागों, मनुष्यों, भूतों तथा राक्षसोंको बलि समर्पण करनेसे जो लाभ होता है, जिन फलोंका उदय होता है, उनका वर्णन करूँगा ॥ ५५ ॥ येषां नाग्रभुजो विप्रा देवतातिथिबालकाः । राक्षसानेव तान् विद्धि निर्विशङ्कानमङ्गलान् ॥ ५६ ॥ जो लोग अपने भोजन करनेसे पहले देवताओं, ब्राह्मणों, अतिथियों और बालकोंको भोजन नहीं कराते, उन्हें भयरहित अमंगलकारी राक्षस ही समझो ॥ ५६ ॥ तस्मादग्रं प्रयच्छेत देवेभ्यः प्रतिपूजितम् । शिरसा प्रयतश्चापि हरेद् बलिमतन्द्रितः ॥ ५७ ॥
अतः गृहस्थ मनुष्यका यह कर्तव्य है कि वह आलस्य छोड़कर देवताओंकी पूजा करके उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम करे और शुद्धचित्त हो सर्वप्रथम उन्हींको आदरपूर्वक अन्नका भाग अर्पण करे ॥ ५७ ॥ गृह्णन्ति देवता नित्यमाशंसन्ति सदा गृहान् । बाह्याश्चागन्तवो येऽन्ये यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ ५८ ॥ इतो दत्तेन जीवन्ति देवताः पितरस्तथा । ते प्रीताः प्रीणयन्तेनमायुषा यशसा धनैः ॥ ५९ ॥ क्योंकि देवतालोग सदा गृहस्थ मनुष्योंकी दी हुई बलिको स्वीकार करते और उन्हें आशीर्वाद देते हैं। देवता, पितर, यक्ष, राक्षस, सर्प तथा बाहरसे आये हुए अन्य अतिथि आदि गृहस्थके दिये हुए अन्नसे ही जीविका चलाते हैं और प्रसन्न होकर उस गृहस्थको आयु, यश तथा धनके द्वारा संतुष्ट करते हैं ॥ ५८-५९ ॥ बलयः सह पुष्पैस्तु देवानामुपहारयेत् । दधिदुग्धमयाः पुण्याः सुगंधाः प्रियदर्शनाः ॥ ६० ॥ देवताओंको जो बलि दी जाय, वह दही-दूधकी बनी हुई, परम पवित्र, सुगंधित, दर्शनीय और फूलोंसे सुशोभित होनी चाहिये ॥ ६० ॥ कार्या रुधिरमांसाढ्या बलयो यक्षरक्षसाम् । सुरासवपुरस्कारा लाजोल्लापिकभूषिताः ॥ ६१ ॥ आसुर स्वभावके लोग यक्ष और राक्षसोंको रुधिर और मांससे युक्त बलि अर्पित करते हैं। जिसके साथ सुरा और आसव भी रहता है तथा ऊपरसे धानका लावा छींटकर उस बलिको विभूषित किया जाता है ॥ ६१ ॥ नागानां दयिता नित्यं पद्मोत्पलविमिश्रिताः । तिलान् गुडसुसम्पन्नान् भूतानामुपहारयेत् ॥ ६२ ॥ नागोंको पद्म और उत्पलयुक्त बलि प्रिय होती है। गुड़मिश्रित तिल भूतोंको भेंट करे ॥ ६२ ॥ अग्रदाताग्रभोगी स्याद् बलवीर्यसमन्वितः । तस्मादग्रं प्रयच्छेत देवेभ्यः प्रतिपूजितम् ॥ ६३ ॥ जो मनुष्य देवता आदिको पहले बलि प्रदान करके भोजन करता है, वह उत्तम भोगसे सम्पन्न, बलवान् और वीर्यवान् होता है। इसलिये देवताओंको सम्मानपूर्वक अन्न पहले अर्पण करना चाहिये ॥ ६३ ॥ ज्वलन्त्यहरहो वेश्म याश्चास्य गृहदेवताः । ताः पूज्या भूतिकामेन प्रसृताग्रप्रदायिना ॥ ६४ ॥ गृहस्थके घरकी अधिष्ठातृ देवियाँ उसके घरको सदा प्रकाशित किये रहती हैं, अतः कल्याणकामी मनुष्यको चाहिये कि भोजनका प्रथम भाग देकर सदा ही उनकी पूजा किया
करे ।। ६४ ।। इत्येतदसुरेन्द्राय काव्यः प्रोवाच भार्गवः । सुवर्णाय मनुः प्राह सुवर्णो नारदाय च ।। ६५ ।। नारदोऽपि मयि प्राह गुणानेतान् महाद्युते । त्वमप्येतद् विदित्वेह सर्वमाचर पुत्रक ।। ६६ ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार शुक्राचार्यने असुरराज बलिको यह प्रसंग सुनाया और मनुने तपस्वी सुवर्णको इसका उपदेश किया। तत्पश्चात् तपस्वी सुवर्णने नारदजीको और नारदजीने मुझे धूप, दीप आदिके दानके गुण बताये। महातेजस्वी पुत्र! तुम भी इस विधिको जानकर इसीके अनुसार सब काम करो ।। ६५-६६ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुवर्णमनुसंवादो नामाष्टनवतितमोऽध्यायः ।। ९८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें सुवर्ण और मनुका संवादविषयक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९८ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६७ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 874)
नवनवतितमोऽध्यायः
नहुषका ऋषियोंपर अत्याचार तथा उसके प्रतीकारके लिये महर्षि भृगु और अगस्त्यकी बातचीत
युधिष्ठिर उवाच
श्रुतं मे भरतश्रेष्ठ पुष्पधूपप्रदायिनाम् ।
फलं बलिविधाने च तद् भूयो वक्तुमर्हसि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! फूल और धूप देनेवालोंको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह मैंने सुन लिया। अब बलि समर्पित करनेका जो फल है, उसे पुनः बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
धूपप्रदानस्य फलं प्रदीपस्य तथैव च ।
बलयश्च किमर्थं वै क्षिप्यन्ते गृहमेधिभिः ॥ २ ॥
धूपदान और दीपदानका फल तो ज्ञात हो गया! अब यह बताइये कि गृहस्थ पुरुष बलि किसलिये समर्पित करते हैं? ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
नहुषस्य च संवादमगस्त्यस्य भृगोस्तथा ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! इस विषयमें भी जानकार मनुष्य राजा नहुष और अगस्त्य एवं भृगुके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥
नहुषो हि महाराज राजर्षिः सुमहातपाः ।
देवराज्यमनुप्राप्तः सुकृतेनेह कर्मणा ॥ ४ ॥
महाराज! राजर्षि नहुष बड़े भारी तपस्वी थे। उन्होंने अपने पुण्यकर्मके प्रभावसे देवराज इन्द्रका पद प्राप्त कर लिया था ॥ ४ ॥
तत्रापि प्रयतो राजन् नहुषस्त्रिदिवे वसन् ।
मानुषीश्चैव दिव्याश्च कुर्वाणो विविधाः क्रियाः ॥ ५ ॥
राजन्! वहाँ स्वर्गमें रहते हुए भी शुद्धचित्त राजा नहुष नाना प्रकारके दिव्य और मानुष कर्मोंका अनुष्ठान किया करते थे ॥ ५ ॥
मानुष्यस्तत्र सर्वाः स्म क्रियास्तस्य महात्मनः ।
प्रवृत्तास्त्रिदिवे राजन् दिव्याश्चैव सनातनाः ॥ ६ ॥
नरेश्वर! स्वर्गमें भी महामना राजा नहुषकी सम्पूर्ण मानुषी क्रियाएँ तथा दिव्य सनातन क्रियाएँ भी सदा चलती रहती थीं ॥ ६ ॥
अग्निकार्याणि समिधः कुशाः सुमनसस्तथा ।
बलयश्चान्नलाजाभिर्धूपनं दीपकर्म च ॥ ७ ॥
सर्वं तस्य गृहे राज्ञः प्रावर्तत महात्मनः ।
जपयज्ञान्मनोयज्ञांस्त्रिदिवेऽपि चकार सः ॥ ८ ॥
अग्निहोत्र, समिधा, कुशा, फूल, अन्न और लावाकी बलि, धूपदान तथा दीपकर्म—ये सब-के-सब महामना राजा नहुषके घरमें प्रतिदिन होते रहते थे। वे स्वर्गमें रहकर भी जप-यज्ञ एवं मनोयज्ञ (ध्यान) करते रहते थे ॥ ७-८ ॥
देवानभ्यर्चयच्चापि विधिवत् स सुरेश्वरः ।
सर्वानैव यथान्यायं यथापूर्वमरिंदम ॥ ९ ॥
शत्रुदमन! वे देवेश्वर नहुष विधिपूर्वक सभी देवताओंका पूर्ववत् यथोचितरूपसे पूजन किया करते थे ॥ ९ ॥
अथेन्द्रोऽहमिति ज्ञात्वा अहंकारं समाविशत् ।
सर्वाश्चैव क्रियास्तस्य पर्यहीयन्त भूपतेः ॥ १० ॥
किंतु तदनन्तर 'मैं इन्द्र हूँ' ऐसा समझकर वे अहंकारके वशीभूत हो गये। इससे उन भूपालकी सारी क्रियाएँ नष्टप्राय होने लगीं ॥ १० ॥
स ऋषीन् वाहयामास वरदानमदान्वितः ।
परिहीनक्रियश्चैव दुर्बलत्वमुपेयिवान् ॥ ११ ॥
वे वरदानके मदसे मोहित हो ऋषियोंसे अपनी सवारी खिंचवाने लगे। उनका धर्म-कर्म छूट गया। अतः वे दुर्बल हो गये—उनमें धर्मबलका अभाव हो गया ॥ ११ ॥
तस्य वाहयतः कालो मुनिमुख्यांस्तपोधनान् ।
अहंकाराभिभूतस्य सुमहानभ्यवर्तत ॥ १२ ॥
वे अहंकारसे अभिभूत होकर क्रमशः सभी श्रेष्ठ तपस्वी मुनियोंको अपने रथमें जोतने लगे। ऐसा करते हुए राजाका दीर्घकाल व्यतीत हो गया ॥ १२ ॥
अथ पर्यायशः सर्वान् वाहनायोपचक्रमे ।
पर्यायश्चाप्यगस्त्यस्य समपद्यत भारत ॥ १३ ॥
नहुषने बारी-बारीसे सभी ऋषियोंको अपना वाहन बनानेका उपक्रम किया था। भारत! एक दिन महर्षि अगस्त्यकी बारी आयी ॥ १३ ॥
अथागत्य महातेजा भृगुर्ब्रह्मविदां वरः ।
अगस्त्यमाश्रमस्थं वै समुपेत्येदमब्रवीत् ॥ १४ ॥
उसी दिन ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी भृगुजी अपने आश्रमपर बैठे हुए अगस्त्यके निकट आये और इस प्रकार बोले— ॥ १४ ॥
एवं वयमसत्कारं देवेन्द्रस्यास्य दुर्मतेः ।
नहुषस्य किमर्थं वै मर्षयाम महामुने ॥ १५ ॥
‘महामुने! देवराज बनकर बैठे हुए इस दुर्बुद्धि नहुषके अत्याचारको हमलोग किसलिये सह रहे हैं’ ।।
अगस्त्य उवाच
कथमेष मया शक्यः शप्तुं यस्य महामुने ।
वरदेन वरो दत्तो भवतो विदितश्च सः ॥ १६ ॥
अगस्त्यजीने कहा—महामुने! मैं इस नहुषको कैसे शाप दे सकता हूँ, जब कि वरदानी ब्रह्माजीने इसे वर दे रखा है। उसे वर मिला है, यह बात आपको भी विदित ही है ॥ १६ ॥
यो मे दृष्टिपथं गच्छेत् स मे वश्यो भवेदिति ।
इत्यनेन वरं देवो याचितो गच्छता दिवम् ॥ १७ ॥
स्वर्गलोकमें आते समय इस नहुषने ब्रह्माजीसे यह वर माँगा था कि ‘जो मेरे दृष्टिपथमें आ जाय, वह मेरे अधीन हो जाय’ ॥ १७ ॥
एवं न दग्धः स मया भवता च न संशयः ।
अन्यैनाप्यृषिमुख्येन न दग्धो न च पातितः ॥ १८ ॥
ऐसा वरदान प्राप्त होनेके कारण ही मैंने और आपने भी अबतक इसे दग्ध नहीं किया है। इसमें संशय नहीं है। दूसरे किसी श्रेष्ठ ऋषिने भी उसी वरदानके कारण न तो अबतक उसे जलाकर भस्म किया और न स्वर्गसे नीचे ही गिराया ॥ १८ ॥
अमृतं चैव पानाय दत्तमस्मै पुरा विभो ।
महात्मना तदर्थं च नास्माभिर्विनिपात्यते ॥ १९ ॥
प्रभो! पूर्वकालमें महात्मा ब्रह्माने इसे पीनेके लिये अमृत प्रदान किया था। इसीलिये हमलोग इस नहुषको स्वर्गसे नीचे नहीं गिरा रहे हैं ॥ १९ ॥
प्रायच्छत वरं देवः प्रजानां दुःखकारणम् ।
द्विजेष्वधर्मयुक्तानि स करोति नराधमः ॥ २० ॥
भगवान् ब्रह्माजीने जो इसे वर दिया था, वह प्रजाजनोंके लिये दुःखका कारण बन गया। वह नराधम ब्राह्मणोंके साथ अधर्मयुक्त बर्ताव कर रहा है ॥ २० ॥
तत्र यत्प्राप्तकालं नस्तद् ब्रूहि वदतां वर ।
भवांश्चापि यथा ब्रूयात् तत्कर्तास्मिन् संशयः ॥ २१ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ भृगुजी! इस समय हमारे लिये जो कर्तव्य प्राप्त हो, वह बताइये। आप जैसा कहेंगे वैसा ही मैं करूँगा; इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
भृगुरुवाच
पितामहन्नियोगेन भवन्तं सोऽहमागतः ।
प्रतिकर्तुं बलवति नहुषे दैवमोहिते ॥ २२ ॥