भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 870, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 870

वैसा धूप देवताओं, दानवों और भूतोंके लिये भी तत्काल संतोष प्रदान करनेवाला माना गया है। इनके सिवा विहार (भोग-विलास) के उपयोगमें आनेवाले और भी अनेक प्रकारके धूप हैं, जो केवल मनुष्योंके व्यवहारमें आते हैं ॥ ४३ ॥
य एवोक्ताः सुमनसां प्रदाने गुणहेतवः ।
धूपेष्वपि परिज्ञेयास्त एव प्रीतिवर्धनाः ॥ ४४ ॥
देवताओंको पुष्पदान करनेसे जो गुण या लाभ बताये गये हैं, वे ही धूप निवेदन करनेसे भी प्राप्त होते हैं। ऐसा जानना चाहिये। धूप भी देवताओंकी प्रसन्नता बढ़ानेवाले हैं ॥ ४४ ॥
दीपदाने प्रवक्ष्यामि फलयोगमनुत्तमम् ।
यथा येन यदा चैव प्रदेया यादृशाश्च ते ॥ ४५ ॥
अब मैं दीप-दानका परम उत्तम फल बताऊँगा। कब किस प्रकार किसके द्वारा किसके दीप दिये जाने चाहिये, यह सब बताता हूँ, सुनो ॥ ४५ ॥
ज्योतिस्तेजः प्रकाशं वाप्यूर्ध्वगं चापि वर्ण्यते ।
प्रदानं तेजसां तस्मात् तेजो वर्धयते नृणाम् ॥ ४६ ॥
दीपक ऊर्ध्वगामी तेज है, वह कान्ति और कीर्तिका विस्तार करनेवाला बताया जाता है। अतः दीप या तेजका दान मनुष्योंके तेजकी वृद्धि करता है ॥ ४६ ॥
अन्धन्तमस्तमिस्रं च दक्षिणायनमेव च ।
उत्तरायणमेतस्माज्ज्योतिर्दानं प्रशस्यते ॥ ४७ ॥
अंधकार अंधतामिस्र नामक नरक है। दक्षिणायन भी अंधकारसे ही आच्छन्न रहता है। इसके विपरीत उत्तरायण प्रकाशमय है। इसलिये वह श्रेष्ठ माना गया है। अतः अन्धकारमय नरककी निवृत्तिके लिये दीपदानकी प्रशंसा की गयी है ॥ ४७ ॥
यस्मादूर्ध्वगमेतत् तु तमसश्चैव भेषजम् ।
तस्मादूर्ध्वगतेर्दाता भवेदत्रेति निश्चयः ॥ ४८ ॥
दीपककी शिखा ऊर्ध्वगामिनी होती है। वह अंधकाररूपी रोगको दूर करनेकी दवा है। इसलिये जो दीपदान करता है, उसे निश्चय ही ऊर्ध्वगतिकी प्राप्ति होती है ॥ ४८ ॥
देवास्तेजस्विनो ह्यस्मात् प्रभावन्तः प्रकाशकाः ।
तामसा राक्षसाश्चैव तस्माद् दीपः प्रदीयते ॥ ४९ ॥
देवता तेजस्वी, कांतिमान् और प्रकाश फैलानेवाले होते हैं और राक्षस अंधकारप्रिय होते हैं; इसलिये देवताओंकी प्रसन्नताके लिये दीपदान किया जाता है ॥
आलोकदानाच्चक्षुष्मान् प्रभावयुक्तो भवेन्नरः ।
तान् दत्त्वा नोपहिंसेत न हरेन्नोपनाशयेत् ॥ ५० ॥
दीपदान करनेसे मनुष्यके नेत्रोंका तेज बढ़ता है और वह स्वयं भी तेजस्वी होता है। दान करनेके पश्चात् उन दीपकोंको न तो बुझावे, न उठाकर अन्यत्र ले जाय और न नष्ट ही