महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 871, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरे ॥ ५० ॥ दीपहर्ता भवेदनन्धस्तमोगतिरसुप्रभः । दीपप्रदः स्वर्गलोके दीपमालेव राजते ॥ ५१ ॥ दीपक चुरानेवाला मनुष्य अंधा और श्रीहीन होता है तथा मरनेके बाद नरकमें पड़ता है, किंतु जो दीपदान करता है, वह स्वर्गलोकमें दीपमालाकी भाँति प्रकाशित होता है ॥ ५१ ॥ हविषा प्रथमः कल्पो द्वितीयश्चौषधीर सैः । वसामेदोऽस्थिनिर्यासैर्न कार्यः पुष्टिमिच्छता ॥ ५२ ॥ घीका दीपक जलाकर दान करना प्रथम श्रेणीका दीप-दान है। ओषधियोंके रस अर्थात् तिल-सरसों आदिके तेलसे जलाकर किया हुआ दीपदान दूसरी श्रेणीका है। जो अपने शरीरकी पुष्टि चाहता हो—उसे चर्बी, मेदा और हड्डियोंसे निकाले हुए तेलके द्वारा कदापि दीपक नहीं जलाना चाहिये ॥ ५२ ॥ गिरिप्रपाते गहने चैत्यस्थाने चतुष्पथे । (गोब्राह्मणालये दुर्गे दीपो भूतिप्रदः शुचिः ।) दीपदानं भवेन्नित्यं य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ ५३ ॥ जो अपने कल्याणकी इच्छा रखता हो, उसे प्रतिदिन पर्वतीय झरनेके पास, वनमें, देवमंदिरमें, चौराहोंपर, गोशालामें, ब्राह्मणके घरमें तथा दुर्गम स्थानमें प्रतिदिन दीप-दान करना चाहिये। उक्त स्थानोंमें दिया हुआ पवित्र दीप ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला होता है ॥ कुलोद्योतो विशुद्धात्मा प्रकाशत्वं च गच्छति । ज्योतिषां चैव सालोक्यं दीपदाता नरः सदा ॥ ५४ ॥ दीप-दान करनेवाला पुरुष अपने कुलको उद्दीप्त करनेवाला, शुद्धचित्त तथा श्रीसम्पन्न होता है और अंतमें वह प्रकाशमय लोकोंमें जाता है ॥ ५४ ॥ बलिकर्मसु वक्ष्यामि गुणान् कर्मफलोदयान् । देवयक्षोरगनॄणां भूतानामथ रक्षसाम् ॥ ५५ ॥ अब मैं देवताओं, यक्षों, नागों, मनुष्यों, भूतों तथा राक्षसोंको बलि समर्पण करनेसे जो लाभ होता है, जिन फलोंका उदय होता है, उनका वर्णन करूँगा ॥ ५५ ॥ येषां नाग्रभुजो विप्रा देवतातिथिबालकाः । राक्षसानेव तान् विद्धि निर्विशङ्कानमङ्गलान् ॥ ५६ ॥ जो लोग अपने भोजन करनेसे पहले देवताओं, ब्राह्मणों, अतिथियों और बालकोंको भोजन नहीं कराते, उन्हें भयरहित अमंगलकारी राक्षस ही समझो ॥ ५६ ॥ तस्मादग्रं प्रयच्छेत देवेभ्यः प्रतिपूजितम् । शिरसा प्रयतश्चापि हरेद् बलिमतन्द्रितः ॥ ५७ ॥