महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रभो! दैत्यराज! जिस-जिस देवताके उद्देश्यसे फूल दिये जाते हैं, वह उस पुष्पदानसे दातापर बहुत प्रसन्न होता और उसके मंगलके लिये सचेष्ट रहता है ।। २२ ।। ज्ञेयास्तूग्राश्च सौम्याश्च तेजस्विन्यश्च ताः पृथक् । ओषध्यो बहुवीर्या हि बहुरूपास्तथैव च ।। २३ ।। उग्रा, सौम्या, तेजस्विनी, बहुवीर्या और बहुरूपा—अनेक प्रकारकी ओषधियाँ होती हैं। उन सबको जानना चाहिये ।। २३ ।। यज्ञियानां च वृक्षाणामयज्ञीयान् निबोध मे । आसुराणि च माल्यानि दैवतेभ्यो हितानि च ।। २४ ।। अब यज्ञसम्बन्धी तथा अयज्ञोपयोगी वृक्षोंका वर्णन सुनो। असुरोंके लिये हितकर तथा देवताओंके लिये प्रिय जो पुष्पमालाएँ होती हैं, उनका परिचय सुनो ।। रक्षसामुरगाणां च यक्षाणां च तथा प्रियाः । मनुष्याणां पितॄणां च कान्तायास्त्वनुपूर्वशः ।। २५ ।। राक्षस, नाग, यक्ष, मनुष्य और पितरोंको प्रिय एवं मनोरम लगनेवाली ओषधियोंका भी वर्णन करता हूँ, सुनो ।। २५ ।। वन्या ग्राम्याश्चैह तथा कृष्टोप्ताः पर्वताश्रयाः । अकण्टकाः कण्टकिनो गन्धरूपरसान्विताः ।। २६ ।। फूलोंके बहुत-से वृक्ष गाँवोंमें होते हैं और बहुत-से जंगलोंमें। बहुतेरे वृक्ष जमीनको जोतकर क्यारियोंमें लगाये जाते हैं और बहुत-से पर्वत आदिपर अपने-आप पैदा होते हैं। इन वृक्षोंमें कुछ तो काँटेदार होते हैं और कुछ बिना काँटोंके। इन सबमें रूप, रस और गन्ध विद्यमान रहते हैं ।। २६ ।। द्विविधो हि स्मृतो गन्ध इष्टोऽनिष्टश्च पुष्पजः । इष्टगन्धानि देवानां पुष्पाणीति विभावय ।। २७ ।। फूलोंकी गन्ध दो प्रकारकी होती है—अच्छी और बुरी। अच्छी गन्धवाले फूल देवताओंको प्रिय होते हैं। इस बातको ध्यानमें रखो ।। २७ ।। अकण्टकानां वृक्षाणां श्वेतप्रायाश्च वर्णतः । तेषां पुष्पाणि देवानामिष्टानि सततं प्रभो ।। २८ ।। (पद्मं च तुलसी जातिरपि सर्वेषु पूजिता ।) प्रभो! जिन वृक्षोंमें काँटे नहीं होते हैं, उनमें जो अधिकांश श्वेतवर्णवाले हैं, उन्हींके फूल देवताओंको सदैव प्रिय हैं। कमल, तुलसी और चमेली—ये सब फूलोंमें अधिक प्रशंसित हैं ।। २८ ।। जलजानि च माल्यानि पद्मादीनि च यानि वै । गन्धर्वनागयक्षेभ्यस्तानि दद्याद् विचक्षणः ।। २९ ।।