महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 866, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंबलिरुवाच सुमनोधूपदीपानां किं फलं ब्रह्मवित्तम । प्रदानस्य द्विजश्रेष्ठ तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १५ ॥ **बलिने पूछा—**ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! द्विजशिरोमणे! फूल, धूप और दीपदान करनेका क्या फल है? यह बतानेकी कृपा करें ॥ १५ ॥
शुक्र उवाच तपः पूर्वं समुत्पन्नं धर्मस्तस्मादनन्तरम् । एतस्मिन्नन्तरे चैव वीरुदोषध्य एव च ॥ १६ ॥ **शुक्राचार्यने कहा—**राजन्! पहले तपस्याकी उत्पत्ति हुई है, तदनन्तर धर्मकी। इसी बीचमें लता और ओषधियोंका प्रादुर्भाव हुआ है ॥ १६ ॥
सोमस्यात्मा च बहुधा सम्भूतः पृथिवीतले । अमृतं च विषं चैव ये चान्ये तृणजातयः ॥ १७ ॥ इस भूतलपर अनेक प्रकारकी सोमलता प्रकट हुई। अमृत, विष तथा दूसरी-दूसरी जातिके तृणोंका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १७ ॥
अमृतं मनसः प्रीतिं सद्यस्तृप्तिं ददाति च । मनो ग्लपयते तीव्रं विषं गन्धेन सर्वशः ॥ १८ ॥ अमृत वह है, जिसे देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है। जो तत्काल तृप्ति प्रदान करता है और विष वह है जो अपनी गन्धसे चित्तमें सर्वथा तीव्र ग्लानि पैदा करता है ॥ १८ ॥
अमृतं मंगलं विद्धि महद्विषममंगलम् । ओषध्यो ह्यमृतं सर्वा विषं तेजोऽग्निसम्भवम् ॥ १९ ॥ अमृतको मंगलकारी जानो और विष महान् अमंगल करनेवाला है। जितनी ओषधियाँ हैं, वे सब-की-सब अमृत मानी गयी हैं और विष अग्निजनित तेज है ॥ १९ ॥
मनो ह्लादयते यस्माच्छ्रियं चापि दधाति च । तस्मात् सुमनसः प्रोक्ता नरैः सुकृतकर्मभिः ॥ २० ॥ फूल मनको आह्लाद प्रदान करता है और शोभा एवं सम्पत्तिका आधान करता है, इसलिये पुण्यात्मा मनुष्योंने उसे सुमन कहा है ॥ २० ॥
देवताभ्यः सुमनसो यो ददाति नरः शुचिः । तस्य तुष्यन्ति वै देवास्तुष्टाः पुष्टिं ददत्यपि ॥ २१ ॥ जो मनुष्य पवित्र होकर देवताओंको फूल चढ़ाता है, उसके ऊपर सब देवता संतुष्ट होते और उसके लिये पुष्टि प्रदान करते हैं ॥ २१ ॥
यं यमुद्दिश्य दीयेरन् देवं सुमनसः प्रभो । मंगलार्थं स तेनास्य प्रीतो भवति दैत्यप ॥ २२ ॥