भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 865, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 865

तत्र तौ कथयन्तौ स्तां कथा नानाविधाश्रयाः । ब्रह्मर्षिदेवदैत्यानां पुराणानां महात्मनाम् ॥ ७ ॥ वहाँ वे दोनों ब्रह्मर्षियों, देवताओं, दैत्यों तथा प्राचीन महात्माओंके सम्बन्धमें नाना प्रकारकी कथा-वार्ता करने लगे ॥ ७ ॥

सुवर्णस्त्वब्रवीद् वाक्यं मनुं स्वायम्भुवं प्रति । हितार्थं सर्वभूतानां प्रश्नं मे वक्तुमर्हसि ॥ ८ ॥ सुमनोभिर्यदिज्यन्ते दैवतानि प्रजेश्वर । किमेतत् कथमुत्पन्नं फलं योगं च शंस मे ॥ ९ ॥ उस समय सुवर्णने स्वायम्भुव मनुसे कहा—'प्रजापते! मैं एक प्रश्न करता हूँ, आप समस्त प्राणियोंके हितके लिये मुझे उसका उत्तर दीजिये। फूलोंसे जो देवताओंकी पूजा की जाती है, यह क्या है? इसका प्रचलन कैसे हुआ? इसका फल क्या है और इसका उपयोग क्या है? यह सब मुझे बताइये' ॥ ८-९ ॥

मनुरुवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । शुक्रस्य च बलेश्चैव संवादं वै महात्मनोः ॥ १० ॥ **मनुजीने कहा—**मुने! इस विषयमें विज्ञजन शुक्राचार्य और बलि—इन दोनों महात्माओंके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १० ॥

बलेर्वैरोचनस्येह त्रैलोक्यमनुशासतः । समीपमाजगामाशु शुक्रो भृगुकुलोद्वहः ॥ ११ ॥ पहलेकी बात है, विरोचनकुमार बलि तीनों लोकोंका शासन करते थे। उन दिनों भृगुकुलभूषण शुक्र शीघ्रतापूर्वक उनके पास आये ॥ ११ ॥

तमर्घ्यादिभिरभ्यर्च्य भार्गवं सोऽसुराधिपः । निषसादासने पश्चाद् विधिवद् भूरिदक्षिणः ॥ १२ ॥ पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले असुरराज बलिने भृगुपुत्र शुक्राचार्यको अर्घ्य आदि देकर उनकी विधिवत् पूजा की और जब वे आसनपर बैठ गये, तब बलि भी अपने सिंहासनपर आसीन हुए ॥ १२ ॥

कथेयमभवत् तत्र त्वया या परिकीर्तिता । सुमनोधूपदीपानां सम्प्रदाने फलं प्रति ॥ १३ ॥ ततः पप्रच्छ दैत्येन्द्रः कवीन्द्रं प्रश्नमुत्तमम् ॥ १४ ॥ वहाँ उन दोनोंमें यही बातचीत हुई, जिसे तुमने प्रस्तुत किया है। देवताओंको फूल, धूप और दीप देनेसे क्या फल मिलता है, यही उनकी वार्ताका विषय था। उस समय दैत्यराज बलिने कविवर शुक्रके सामने यह उत्तम प्रश्न उपस्थित किया ॥ १३-१४ ॥