महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 864, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टनवतितमोऽध्यायः
तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद—पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य
युधिष्ठिर उवाच
आलोकदानं नामैतत् कीदृशं भरतर्षभ ।
कथमेतत् समुत्पन्नं फलं वा तद् ब्रवीहि मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—भरतश्रेष्ठ! यह जो दीपदान नामक कर्म है, यह कैसे किया जाता है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? अथवा इसका फल क्या है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
मनोः प्रजापतेर्वादं सुवर्णस्य च भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा—भारत! इस विषयमें प्रजापति मनु और सुवर्णके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥
तपस्वी कश्चिदभवत् सुवर्णो नाम भारत ।
वर्णतो हेमवर्णः स सुवर्ण इति पप्रथे ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! सुवर्णनामसे प्रसिद्ध एक तपस्वी ब्राह्मण थे। उनके शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान थी। इसीलिये वे सुवर्णनामसे विख्यात हुए थे ॥ ३ ॥
कुलशीलगुणोपेतः स्वाध्याये च परंगतः ।
बहून् सुवंशप्रभवान् समतीतः स्वकैर्गुणैः ॥ ४ ॥
वे उत्तम कुल, शील और गुणसे सम्पन्न थे। स्वाध्यायमें भी उनकी बड़ी ख्याति थी। वे अपने गुणोंद्वारा उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए बहुत-से श्रेष्ठ पुरुषोंकी अपेक्षा आगे बढ़े हुए थे ॥ ४ ॥
स कदाचिन्मनुं विप्रो ददर्शोपससर्प च ।
कुशलप्रश्नमन्योन्यं तौ चोभौ तत्र चक्रतुः ॥ ५ ॥
एक दिन उन ब्राह्मणदेवताने प्रजापति मनुको देखा। देखकर वे उनके पास चले गये। फिर तो वे दोनों एक-दूसरेसे कुशल-समाचार पूछने लगे ॥ ५ ॥
ततस्तौ सत्यसंकल्पौ मेरौ काञ्चनपर्वते ।
रमणीये शिलापृष्ठे सहितौ संन्यषीदताम् ॥ ६ ॥
तदनन्तर वे दोनों सत्यसंकल्प महात्मा सुवर्णमय पर्वत मेरुके एक रमणीय शिलापृष्ठपर एक साथ बैठ गये ॥ ६ ॥