भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 863, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 863

श्रीकृष्ण! गृहस्थ पुरुषको सदा यज्ञशिष्ट अन्नका ही भोजन करना चाहिये। राजा, ऋत्विज्, स्नातक, गुरु और श्वशुर—ये यदि एक वर्षके बाद घर आवें तो मधुपर्कसे इनकी पूजा करनी चाहिये ॥ २११/२ ॥ श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चावपेद् भुवि । वैश्वदेवं हि नामैतत् सायंप्रातर्विधीयते ॥ २२ ॥ कुत्तों, चाण्डालों और पक्षियोंके लिये भूमिपर अन्न रख देना चाहिये। यह वैश्वदेव नामक कर्म है। इसका सायंकाल और प्रातःकाल अनुष्ठान किया जाता है ॥ एतांस्तु धर्मान् गार्हस्थ्यान् यः कुर्यादनसूयकः । स इहर्षिवरान् प्राप्य प्रेत्य लोके महीयते ॥ २३ ॥ जो मनुष्य दोषदृष्टिका परित्याग करके इन गृहस्थोचित धर्मोंका पालन करता है, उसे इस लोकमें ऋषि-महर्षियोंका वरदान प्राप्त होता है और मृत्युके पश्चात् वह पुण्यलोकोंमें सम्मानित होता है ॥ २३ ॥

भीष्म उवाच

इति भूमेर्वचः श्रुत्वा वासुदेवः प्रतापवान् । तथा चकार सततं त्वमप्येवं सदाचर ॥ २४ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! पृथ्वी देवीके ये वचन सुनकर प्रतापी भगवान् श्रीकृष्णने उन्हींके अनुसार गृहस्थधर्मोंका विधिवत् पालन किया। तुम भी सदा इन धर्मोंका अनुष्ठान करते रहो ॥ २४ ॥ एतद् गृहस्थधर्मं त्वं चेष्टमानो जनाधिप । इहलोके यशः प्राप्य प्रेत्य स्वर्गमवाप्स्यसि ॥ २५ ॥ जनेश्वर! इस गृहस्थ-धर्मका पालन करते रहनेपर तुम इहलोकमें सुयश और परलोकमें स्वर्ग प्राप्त कर लोगे ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि बलिदानविधिर्नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बलिदानविधि नामक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९७ ॥