महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 876, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘महामुने! देवराज बनकर बैठे हुए इस दुर्बुद्धि नहुषके अत्याचारको हमलोग किसलिये सह रहे हैं’ ।।
अगस्त्य उवाच
कथमेष मया शक्यः शप्तुं यस्य महामुने ।
वरदेन वरो दत्तो भवतो विदितश्च सः ॥ १६ ॥
अगस्त्यजीने कहा—महामुने! मैं इस नहुषको कैसे शाप दे सकता हूँ, जब कि वरदानी ब्रह्माजीने इसे वर दे रखा है। उसे वर मिला है, यह बात आपको भी विदित ही है ॥ १६ ॥
यो मे दृष्टिपथं गच्छेत् स मे वश्यो भवेदिति ।
इत्यनेन वरं देवो याचितो गच्छता दिवम् ॥ १७ ॥
स्वर्गलोकमें आते समय इस नहुषने ब्रह्माजीसे यह वर माँगा था कि ‘जो मेरे दृष्टिपथमें आ जाय, वह मेरे अधीन हो जाय’ ॥ १७ ॥
एवं न दग्धः स मया भवता च न संशयः ।
अन्यैनाप्यृषिमुख्येन न दग्धो न च पातितः ॥ १८ ॥
ऐसा वरदान प्राप्त होनेके कारण ही मैंने और आपने भी अबतक इसे दग्ध नहीं किया है। इसमें संशय नहीं है। दूसरे किसी श्रेष्ठ ऋषिने भी उसी वरदानके कारण न तो अबतक उसे जलाकर भस्म किया और न स्वर्गसे नीचे ही गिराया ॥ १८ ॥
अमृतं चैव पानाय दत्तमस्मै पुरा विभो ।
महात्मना तदर्थं च नास्माभिर्विनिपात्यते ॥ १९ ॥
प्रभो! पूर्वकालमें महात्मा ब्रह्माने इसे पीनेके लिये अमृत प्रदान किया था। इसीलिये हमलोग इस नहुषको स्वर्गसे नीचे नहीं गिरा रहे हैं ॥ १९ ॥
प्रायच्छत वरं देवः प्रजानां दुःखकारणम् ।
द्विजेष्वधर्मयुक्तानि स करोति नराधमः ॥ २० ॥
भगवान् ब्रह्माजीने जो इसे वर दिया था, वह प्रजाजनोंके लिये दुःखका कारण बन गया। वह नराधम ब्राह्मणोंके साथ अधर्मयुक्त बर्ताव कर रहा है ॥ २० ॥
तत्र यत्प्राप्तकालं नस्तद् ब्रूहि वदतां वर ।
भवांश्चापि यथा ब्रूयात् तत्कर्तास्मिन् संशयः ॥ २१ ॥
वक्ताओंमें श्रेष्ठ भृगुजी! इस समय हमारे लिये जो कर्तव्य प्राप्त हो, वह बताइये। आप जैसा कहेंगे वैसा ही मैं करूँगा; इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
भृगुरुवाच
पितामहन्नियोगेन भवन्तं सोऽहमागतः ।
प्रतिकर्तुं बलवति नहुषे दैवमोहिते ॥ २२ ॥