महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 875, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअग्निकार्याणि समिधः कुशाः सुमनसस्तथा ।
बलयश्चान्नलाजाभिर्धूपनं दीपकर्म च ॥ ७ ॥
सर्वं तस्य गृहे राज्ञः प्रावर्तत महात्मनः ।
जपयज्ञान्मनोयज्ञांस्त्रिदिवेऽपि चकार सः ॥ ८ ॥
अग्निहोत्र, समिधा, कुशा, फूल, अन्न और लावाकी बलि, धूपदान तथा दीपकर्म—ये सब-के-सब महामना राजा नहुषके घरमें प्रतिदिन होते रहते थे। वे स्वर्गमें रहकर भी जप-यज्ञ एवं मनोयज्ञ (ध्यान) करते रहते थे ॥ ७-८ ॥
देवानभ्यर्चयच्चापि विधिवत् स सुरेश्वरः ।
सर्वानैव यथान्यायं यथापूर्वमरिंदम ॥ ९ ॥
शत्रुदमन! वे देवेश्वर नहुष विधिपूर्वक सभी देवताओंका पूर्ववत् यथोचितरूपसे पूजन किया करते थे ॥ ९ ॥
अथेन्द्रोऽहमिति ज्ञात्वा अहंकारं समाविशत् ।
सर्वाश्चैव क्रियास्तस्य पर्यहीयन्त भूपतेः ॥ १० ॥
किंतु तदनन्तर 'मैं इन्द्र हूँ' ऐसा समझकर वे अहंकारके वशीभूत हो गये। इससे उन भूपालकी सारी क्रियाएँ नष्टप्राय होने लगीं ॥ १० ॥
स ऋषीन् वाहयामास वरदानमदान्वितः ।
परिहीनक्रियश्चैव दुर्बलत्वमुपेयिवान् ॥ ११ ॥
वे वरदानके मदसे मोहित हो ऋषियोंसे अपनी सवारी खिंचवाने लगे। उनका धर्म-कर्म छूट गया। अतः वे दुर्बल हो गये—उनमें धर्मबलका अभाव हो गया ॥ ११ ॥
तस्य वाहयतः कालो मुनिमुख्यांस्तपोधनान् ।
अहंकाराभिभूतस्य सुमहानभ्यवर्तत ॥ १२ ॥
वे अहंकारसे अभिभूत होकर क्रमशः सभी श्रेष्ठ तपस्वी मुनियोंको अपने रथमें जोतने लगे। ऐसा करते हुए राजाका दीर्घकाल व्यतीत हो गया ॥ १२ ॥
अथ पर्यायशः सर्वान् वाहनायोपचक्रमे ।
पर्यायश्चाप्यगस्त्यस्य समपद्यत भारत ॥ १३ ॥
नहुषने बारी-बारीसे सभी ऋषियोंको अपना वाहन बनानेका उपक्रम किया था। भारत! एक दिन महर्षि अगस्त्यकी बारी आयी ॥ १३ ॥
अथागत्य महातेजा भृगुर्ब्रह्मविदां वरः ।
अगस्त्यमाश्रमस्थं वै समुपेत्येदमब्रवीत् ॥ १४ ॥
उसी दिन ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी भृगुजी अपने आश्रमपर बैठे हुए अगस्त्यके निकट आये और इस प्रकार बोले— ॥ १४ ॥
एवं वयमसत्कारं देवेन्द्रस्यास्य दुर्मतेः ।
नहुषस्य किमर्थं वै मर्षयाम महामुने ॥ १५ ॥